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दो साल इंतजार के बाद आया फोन, मिला लिवर और लौट आई जिंदगी…




दो साल से हिमाचल पुलिस के जवान राकेश कुमार की जिंदगी एक फोन कॉल के इंतजार में थी। कब पीजीआई से खबर आए और लिवर डोनर मिल जाए। 9 सितंबर 2026 को आखिर वह कॉल आई। डोनर उपलब्ध था। उसी दिन पीजीआई चंडीगढ़ में 40 वर्षीय राकेश का लिवर ट्रांसप्लांट हुआ। राकेश अब घर लौट चुके हैं और फिर वर्दी पहनकर देश-समाज की सेवा करने की तैयारी में हैं। मंडी के रहने वाले राकेश को 2024 के आखिर में बीमारी का पता चला था। जांच में एडवांस्ड लिवर सिरोसिस सामने आया। डॉक्टरों ने बताया कि बीमारी काफी बढ़ चुकी है और अब लिवर ट्रांसप्लांट ही जिंदगी बचाने का रास्ता है। नाम वेटिंग लिस्ट में दर्ज हुआ और शुरू हुआ करीब दो साल का इंतजार। 9 सितंबर को एक ब्रेन-डेड मरीज के परिवार ने अंगदान की सहमति दी। इसके बाद पीजीआई की ट्रांसप्लांट टीम ने प्रक्रिया शुरू की। प्रो. एल. कामान, डॉ. सुनील तनेजा और डॉ. स्वप्नेश साहू की टीम ने कई घंटे चले ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा किया। यह डीडीएलटी यानी डिसीज्ड डोनर लिवर ट्रांसप्लांट था। मरीज की जुबानी: ‘ऐसा लग रहा है जैसे नया जन्म हुआ हो’ राकेश कुमार, 40 वर्ष, हिमाचल पुलिस ‘मैं मंडी का रहने वाला हूं। 2024 के आखिर में पहली बार इस गंभीर बीमारी का पता चला। पीजीआई पहुंचने पर डॉक्टरों ने बताया कि मुझे लिवर सिरोसिस है। प्रो. एल. कामान और उनकी टीम ने समझाया कि बीमारी बहुत बढ़ चुकी है और लिवर ट्रांसप्लांट ही आखिरी रास्ता है। डॉक्टरों ने ट्रांसप्लांट के जोखिम भी बताए। मैंने हिम्मत जुटाई और वेटिंग लिस्ट में नाम दर्ज कराया। इसके बाद के दो साल कैसे बीते, यह सिर्फ मेरा दिल जानता है। हर दिन डर और अनिश्चितता बनी रहती थी। आखिर 9 सितंबर को पीजीआई से फोन आया कि डोनर उपलब्ध है। उसी दिन मेरा लिवर ट्रांसप्लांट हुआ। अब शरीर और सेहत में दिन-रात का अंतर महसूस हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे नया जन्म हुआ हो। मैं उस डोनर परिवार का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूं। अपने किसी प्रियजन को खोने के गम के बीच भी उन्होंने इतना बड़ा फैसला लिया। उनके एक फैसले ने मेरी ही नहीं, कई और लोगों की जिंदगी बचाई। मैं ताउम्र उनका एहसान नहीं भूलूंगा। उन्होंने अपने बच्चे को खोकर दूसरे घरों के चिराग बुझने से बचा लिए।’ जरूरत 50 हजार की, ट्रांसप्लांट करीब 3-4 हजार भारत में हर साल करीब 3 से 4 हजार लिवर ट्रांसप्लांट होते हैं, जबकि करीब 25,000-50,000 मरीजों को सालाना इसकी जरूरत पड़ती है। इनमें 80% से ज्यादा ट्रांसप्लांट लिविंग डोनर से होते हैं। मृत डोनर अंगों की कमी के कारण डीडीएलटी के लिए मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। वेटिंग में मेडिकल स्थिति और एमईएलडी स्कोर जैसे मानकों के आधार पर प्राथमिकता तय होती है। राकेश के लिए अब जिंदगी फिर पटरी पर लौट रही है। इलाज के लिए अस्पताल की ओर बढ़ते कदमों की जगह जल्द ही वह फिर खाकी पहनकर लोगों की सुरक्षा और देश की सेवा के लिए खड़े होना चाहते हैं। इस नई जिंदगी के पीछे एक अनजान परिवार का वह फैसला हमेशा उनके साथ रहेगा। प्रो. एल. कामान ने कहा कि राकेश की सफल रिकवरी और सुरक्षित डिस्चार्ज पूरी टीम के लिए संतोष की बात है। उन्होंने कहा कि मृत-डोनर ट्रांसप्लांट के पीछे एक ऐसा परिवार होता है, जो अपने सबसे बड़े दुख के समय अंगदान का फैसला करता है। डॉ. स्वप्नेश साहू ने कहा कि राकेश की लंबी वेटिंग से सफल ट्रांसप्लांट तक की यात्रा समय पर अंगदान की अहमियत बताती है।



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