7 घंटे पहले
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आज (17 जुलाई) सुबह करीब 6.25 बजे तक आषाढ़ शुक्ल तृतीया तिथि है, 6.25 बजे के बाद चतुर्थी तिथि है। इस तिथि पर विनायकी चतुर्थी व्रत किया जाता है। अभी आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि भी चल रही है। गुप्त नवरात्रि, शुक्रवार और विनायकी चतुर्थी का योग होने से इस व्रत का महत्व और अधिक बढ़ गया है।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनाए रखने की कामना से चतुर्थी व्रत किया जाता है। चतुर्थी तिथि पर ही भगवान गणेश प्रकट हुए थे, इसलिए कई भक्त सालभर की सभी चतुर्थियों पर व्रत करते हैं। एक महीने में दो चतुर्थी आती हैं, इस तरह एक साल में कुल 24 चतुर्थियां रहती हैं, जिस वर्ष अधिकमास रहता है, तब सालभर में इस तिथि की संख्या 26 हो जाती हैं।
शुक्र के दोषों को शांत करने के लिए करें दूध का दान
ज्योतिष में शुक्रवार का कारक ग्रह शुक्र को माना जाता है, जिन लोगों की कुंडली में शुक्र ग्रह से संबंधित दोष हैं, उन्हें वैवाहिक जीवन में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। शुक्र पक्ष का न हो, तो व्यक्ति को पर्याप्त सुख-सुविधाएं भी नहीं मिलती है। इस ग्रह के दोषों को शांत करने के लिए हर सप्ताह शुक्रवार को शुक्रदेव की पूजा करनी चाहिए। इस ग्रह की पूजा शिवलिंग रूप में की जाती है, इसलिए ऊँ शुक्राय नम: मंत्र का जप करते हुए शिवलिंग पर जल-दूध चढ़ाना चाहिए। शुक्र के दोषों को शांत करने के लिए दूध का दान भी करना चाहिए।
ऐसे कर सकते हैं गणेश जी की पूजा
सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद घर के मंदिर में गणेश पूजा की व्यवस्था करें। गणेश जी को जल-दूध, पंचामृत चढ़ाएं। सिंदूर, दूर्वा, फूल, चावल, मौसमी फल चढ़ाएं। धूप-दीप जलाएं। लड्डू, मोदक का भोग लगाएं। श्री गणेशाय नम: मंत्र का जप करते हुए आरती करें। पूजा में चतुर्थी व्रत करने का संकल्प लें। गणेश पूजा के बाद प्रसाद वितरित करें और जरूरतमंद लोगों को धन-अनाज का दान करें।
गणेश जी को दूर्वा खास तरीके से चढ़ाई जाती है। दूर्वा का जोड़ा बनाकर अर्पित किया जाता है। 22 दूर्वा को एक साथ जोड़ने पर 11 जोड़े तैयार हो जाते हैं। इन 11 जोड़ों को गणेश जी को चढ़ाएं। इसके लिए किसी मंदिर के बगीचे में उगी हुई या किसी साफ जगह पर उगी हुई दूर्वा ले सकते हैं। दूर्वा चढ़ाने से पहले साफ पानी से इसे धो लेना चाहिए।
भगवान विष्णु के साथ महालक्ष्मी का अभिषेक
शुक्रवार को देवी लक्ष्मी और विष्णु जी की पूजा करने की भी परंपरा है। गणेश पूजन के बाद महालक्ष्मी और विष्णु जी की प्रतिमा स्थापित करें। भगवान को जल, दूध और पंचामृत चढ़ाएं, शुद्ध जल फिर से चढ़ाएं। कुमकुम, चंदन, अबीर, गुलाल, हार-फूल, नए वस्त्र आदि पूजन सामग्री से भगवान का श्रृंगार करें। महालक्ष्मी को लाल चुनरी चढ़ाएं। भगवान विष्णु को पीले वस्त्र अर्पित करना चाहिए। मौसमी फल और तुलसी के साथ मिठाई का भोग लगाएं। ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें। धूप-दीप जलाकर आरती करें। अंत भगवान से जानी-अनजानी गलतियों के लिए क्षमायाचना करें। पूजा के बाद प्रसाद वितरित करें और खुद भी लें।

