दवाइयों से मन की उदासी कम हो गई, लेकिन फिर भी खालीपन महसूस होता है। किसी से बात करने का मन नहीं करता। लोगों के बीच रहकर अकेलापन महसूस होता है। पीजीआई चंडीगढ़ के मनोचिकित्सा डिपार्टमेंट के एक अध्ययन में सामने आया है कि डिप्रेशन से राहत मिलने के बाद भी मरीज का अकेलापन दूर हो, यह जरूरी नहीं है। तीन महीने तक 110 मरीजों पर की गई रिसर्च में डिप्रेशन से पूरी तरह उबर चुके 35 मरीजों में से 16 यानी 45.7% ने तब भी अकेलापन महसूस किया। रिसर्चर्स डॉ. निष्ठा चौरसिया, प्रोफेसर देबाशीष बसु और डॉ. स्वप्नजीत साहू की इस स्टडी का शीर्षक रहा डज ऐलिवेटिंग डिप्रेशन रिड्यूज लोनलीनेस? ए लोंगिट्यूशनल स्टडी। यह स्टडी इस साल इंडियन जर्नल ऑफ साइकेट्री में पब्लिश हुई है। इसके निष्कर्ष बताते हैं कि डिप्रेशन और अकेलापन एक-दूसरे से जुड़े होने के बावजूद अलग-अलग समस्याएं हैं। इस पर ध्यान देना चाहिए? डिप्रेशन के इलाज के साथ मरीज के सामाजिक और भावनात्मक जुड़ाव पर ध्यान जरूरी है। परिवार को मरीज से बातचीत करने, उसकी बात सुनने और उसे गतिविधियों में शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए। अकेलापन रहने पर विशेषज्ञ से बात करनी चाहिए। अकेलेपन के साथ नींद और क्वालिटी ऑफ लाइफ भी प्रभावित… स्टडी में अकेलेपन का सामना कर रहे मरीजों में सामाजिक सहयोग की कमी, लोगों से जुड़ाव का कमजोर होना और नींद की खराब क्वालिटी भी सामने आई। ऐसे मरीजों में आत्महत्या से जुड़े विचार भी अधिक पाए गए। हालांकि, स्टडी इन समस्याओं के बीच संबंध दिखाता है, यह साबित नहीं करता कि अकेलापन ही इनका एकमात्र कारण है। स्टडी की सीमा भी समझें… स्टडी 110 मरीजों और 3 महीने की अवधि में हुई। आंकड़ों को सभी मरीजों या पूरी आबादी पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी इसके निष्कर्ष बताते हैं कि अवसाद के इलाज में सुधार के साथ-साथ अकेलेपन और सामाजिक जुड़ाव का आकलन करना अहम हो सकता है। स्टडी के अनुसार, डिप्रेशन के लक्षणों की गंभीरता अकेलेपन का इंडिपेंडेंट अनुमान लगाने वाला कारण नहीं थी। इसके बजाय लोगों से जुड़ाव, सामाजिक सहयोग और रिश्तों की क्वालिटी अधिक महत्वपूर्ण रहे। यानी किसी व्यक्ति के आसपास लोगों का होना और उसका भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ा महसूस करना दो अलग बातें हैं। अकेलेपन की वजह सिर्फ बीमारी नहीं… तीन महीने के इलाज के बाद क्या बदला?
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डिप्रेशन से उबरे 46% मरीज, फिर भी जूझे अकेलेपन से
