दैनिक भास्कर की सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आप पढ़ रहे हैं दुनिया के सबसे खतरनाक जासूस एली कोहेन की कहानी। पार्ट-1 में आपने पढ़ा कि नौकरी गंवाने के बाद एली, पत्नी नादिया से झूठ बोलकर जासूसी की दुनिया में उतर गया था।
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इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने उसे नया नाम दिया था- ‘कामेल अमीन ताबेथ।’ परिवार- सीरियाई और काम- अर्जेंटीना में कपड़े का व्यापार।
पार्ट-2 में आगे की कहानी…
फरवरी 1961 का महीना था। कामेल अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स पहुंचा। एक महंगे इलाके में आलीशान अपार्टमेंट लिया और वहीं बस गया। जल्द ही शहर में अपनी पैठ बना ली। फिर एक रोज वह सीरियाई दूतावास तक पहुंच गया।
वहां उसकी मुलाकात सीरिया के मिलिट्री अटैशे जनरल अमीन हाफिज से हुई। अमीन सीरिया की मुख्य विपक्षी बाथ पार्टी से जुड़ा था। कामेल ने ताड़ लिया कि अमीन आने वाले वक्त में सीरियाई हुकूमत में बहुत ऊंचे ओहदे पर पहुंचेगा।
उसने अमीन से नजदीकी बढ़ानी शुरू की। दोनों का रिश्ता इतना गहरा हुआ कि कामेल खुद बाथ पार्टी में शामिल हो गया। सीरिया में पार्टी को मजबूत करने के लिए अपना खजाना खोल दिया। भारी-भरकम फंड दिया।
फिर आया साल 1962, कामेल सीरिया की राजधानी दमिश्क पहुंचा। अमीन ने शहर के सबसे सुरक्षित इलाके में कामेल के लिए फ्लैट का इंतजाम करवा दिया। इसी इलाके में सेना के जनरल रहते थे।
कामेल ने अपनी पहचान का दायरा फैलाना शुरू किया। इसी सिलसिले में उसकी मुलाकात रेडियो दमिश्क के डायरेक्टर सालेम से हुई।
कामेल का सालेम के स्टूडियो आना-जाना शुरू हो गया। उसे प्रवासी सीरियाई लोगों के लिए एक शो होस्ट करने की जिम्मेदारी मिल गई। शो के दौरान वह ऐसी बातें बोल जाता, जो बाहर से भले ही आम लगती थीं, लेकिन असल में वे इजराइल के लिए गुप्त कोड वर्ड होती थीं।
एक शाम सालेम ने घर पर एक पार्टी रखी। कामेल जैसे ही दरवाजे पर पहुंचा, एक महिला उसके सामने आई। लाल बाल, चेहरे पर मोटा मेकअप और धारीदार गाउन। उसने कामेल की तरफ हाथ बढ़ाया, ‘गुड इवनिंग, कामेल।’
कामेल ने भी हल्की मुस्कान के साथ हाथ मिलाया, ‘आपका परिचय?’
‘मैं सालेम की भाभी हूं।’
‘मैं जल्दी आ गया?’
‘नहीं-नहीं, काफी मेहमान आ चुके हैं,’ कहते हुए वह कामेल का हाथ थामकर मुख्य हॉल की तरफ ले गई। वहां ज्यादातर लोग फौजी वर्दी में थे।
महिला ने एक अफसर की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘कामेल इनसे मिलिए… कर्नल सलीम खातूम।’
कर्नल सलीम आगे बढ़ा और कामेल को गले से लगा लिया, ‘पूरे सीरिया में आपके बिजनेस और आपके दान के किस्से सुने हैं।’
‘शुक्रिया, कर्नल,’ कामेल ने कहा।
दोनों एक तरफ बैठकर बातों में मशगूल हो गए। इसी दौरान कामेल ने सीरिया के सियासी हालात का जिक्र छेड़ दिया। कर्नल के तेवर बताते थे कि वह मौजूदा हुकूमत से नाराज है। वह बाथ पार्टी का हमदर्द था और तख्तापलट के लिए किसी भी हद तक जा सकता था।
पार्टी खत्म हुई तो कामेल ने उससे कहा, ‘परसों मेरे घर पर दावत है। बहुत सी खूबसूरत लड़कियां होंगी। कर्नल, आपको आना ही होगा।’
कर्नल के चेहरे पर मुस्कान तैर गई, ‘कोशिश करूंगा।’

साल 1960-61, सीरिया की राजधानी दमिश्क में एली कोहेन।
दो दिन बाद कामेल के घर महफिल सजी। सीरियाई रक्षा मंत्रालय की खूबसूरत लड़कियों को दावत में बुलाया गया। जैसे-जैसे मेहमान आते गए, माहौल रंगीन होता चला गया।
रात के दस बज रहे थे, जब कर्नल सलीम वहां पहुंचा। कामेल ने उसे गले लगाया और कहा- बहुत थके हुए लग रहे हो कर्नल। अलमारी में ढीले-ढाले कपड़े रखे हैं, सूट-बूट उतारकर वही पहन लो।’
सलीम ने वर्दी उतारी, हल्के कपड़े पहने और आराम से सोफे पर टिक गया।
‘बताओ कामेल, आज की इस शाम हमारे लिए क्या खास इंतजाम है?’ सलीम ने पूछा।
तभी मिनी स्कर्ट पहने एक लड़की कमरे में दाखिल हुई और मेहमानों के गिलासों में शराब डालने लगी। सलीम ने लड़की को इशारे से पास बुलाया और अपना ग्लास आगे बढ़ा दिया।
ग्लास भरते देख सलीम के मुंह से निकला, ‘आज तो मैं पूरी बाल्टी गटक सकता हूं।’
कामेल ने चुटकी ली, ‘चाहे ड्रिंक मैं ही क्यों न डालूं?’
सलीम हंसा, ‘पूरे दमिश्क में तुम्हारे जैसा मेजबान नहीं मिलेगा कामेल। आज मैं बहुत खुश हूं। बड़े दिनों बाद बंकरों की घुटन से दूर सांस लेने का मौका मिला है, यहां कम से कम इजराइली हमलों का डर तो नहीं है।’
कामेल के होठों पर मुस्कान तैर गई।
अब कर्नल सलीम थोड़ा सीधा होकर बैठा। एक ही सांस में पूरा ग्लास खाली करते हुए बोला, ‘तुम्हें पता है, कामेल, सरहद पर जमीन के नीचे हमारे दर्जनों बंकर बने हुए हैं।’
कामेल ने भौहें सिकोड़ीं, ‘सच में?’
‘हां कामेल, बिल्कुल सच! हमारी चौकियों से तो इजराइल साफ नजर आता है… और क्या कमाल की लड़कियां होती हैं वहां की!’
कामेल हंस पड़ा। सलीम ने दोस्ताना अंदाज में उसके कंधे पर हाथ रखा और फुसफुसाया, ‘मैं खुद तुम्हें उस जगह की सैर कराऊंगा।’
‘क्या आम आदमी वहां जा सकता है?’ कामेल ने पूछा।
सलीम ने मूंछें ऐंठते हुए कहा- ‘क्यों नहीं? मैं वहां का रीजनल कमांडर हूं।’
कामेल अपनी जगह से उठा और बात संभालते हुए बोला, ‘छोड़ो भी, फौज और सियासत की बातें फिर कभी करेंगे। अभी तो शराब और शबाब का लुत्फ उठाओ।’
कामेल ने ड्रिंक परोस रही लड़की की तरफ इशारा कर दिया। वह फौरन कर्नल के पास पहुंची और थोड़ा झुककर बोली, ‘गुड इवनिंग, कर्नल।’
सलीम की आंखों में चमक आ गई, ‘गुड इवनिंग, सुंदरी… जरा यहां पास बैठो।’

पार्टी में कर्नल सलीम के साथ एली कोहेन यानी कामेल। AI इमेज
लड़की ने धीमे से कहा, ‘कामेल ने मुझे आपको सहज महसूस कराने को कहा था, पर वैसा नहीं जैसा आप समझ रहे हैं।’
सलीम ठहाका मारकर हंसा, ‘ठीक है मासूमियत की देवी, पर मेहमाननवाजी के लिए एक किस तो बनता है।’
‘सिर्फ एक,’ उसने दबी आवाज में कहा और सलीम के गाल पर किस कर दिया।
‘मेरा मतलब होठों पर था।’ कर्नल सलीम ने उसे अपनी तरफ खींच लिया।
लड़की रुकी, फिर आगे बढ़कर उसने सलीम को किस किया।
सलीम ने लंबी सांस ली और पूछा, ‘कामेल ने तुम्हें तुम्हारा काम नहीं समझाया था क्या?’
लड़की ने आंखें नीची कर लीं। धीरे से बोली, ‘मैं वैसी लड़की नहीं हूं कर्नल, जैसा आप समझ रहे हैं। मैं रक्षा मंत्रालय में टाइपिस्ट हूं।’
सलीम चौंक गया, ‘रक्षा मंत्रालय में तुम्हारे जैसी लड़की? आजकल इस देश में क्या-क्या हो रहा है?’
‘मेरे जैसी लड़की वहां नौकरी नहीं कर सकती क्या?’
‘क्यों नहीं? लगता है हमारे अफसरों ने यह सब पश्चिम से सीखा है- सुरक्षा विभाग में सुंदर लड़कियां रखना।’
लड़की अपना हाथ छुड़ाकर बाहर निकल गई।
पार्टी खत्म होने के बाद अगली सुबह जब कामेल की नींद खुली, तो दरवाजे पर एक फौजी डाकिया खड़ा था। उसके हाथ में कमांडर मआजी जहीर का भेजा टेलीग्राम था।
उसमें लिखा था- ‘कर्नल सलीम के कहने पर हम आपको अपना मिलिट्री बेस दिखाना चाहते हैं। आप आएंगे तो हमें अच्छा लगेगा।’
उसी शाम सेना की गाड़ी कामेल को लेकर सीरिया-इजराइल सीमा पर पहुंच गई। कमांडर जहीर उसे लेकर एक पहाड़ी पर चढ़ा।
‘यहां से देखने पर इजराइल कालीन जैसा दिखता है। यह जगह हमारे पास होती, तो हमारी पहुंच सीधे समंदर तक होती,’ कमांडर ने कहा।
कामेल ने कहा, ‘हम उन्हें खदेड़कर समंदर में क्यों नहीं फेंक देते?’
‘अगर यह सिर्फ हमारे वश में होता, तो इजराइली कब के खत्म हो चुके होते। बड़ी ताकतें इस छोटे से देश को बचा रही हैं।’
‘इजराइली सेना के बारे में क्या ख्याल है?’ कामेल ने पूछा।
कमांडर जहीर का मुंह बन गया, ‘उनकी फौज मजबूत है, पर हमें उसकी चिंता नहीं है।’
‘फिर किस बात की है?’
‘हमारे पास उनसे बेहतर हथियार हैं। सैनिक भी उनसे कई गुना ज्यादा हैं, लेकिन उनके जैसा जनसमर्थन हमारे पास नहीं है।’
कामेल ने कमांडर के हाथ से दूरबीन ली और देखने लगा। उसे इजराइल के कुछ गांव दिखाई दिए, जहां कम कपड़ों में लड़कियां काम कर रही थीं।
कमांडर ने पूछा, ‘इजराइली लड़कियों के बारे में क्या सोचते हो?’
कामेल ने गुस्से में जमीन पर थूका और बोला, ‘मुझे औरतों का यह खुलापन पसंद नहीं।’

सीरियाई बंकर से इजराइली इलाकों को दूरबीन से देखता हुआ कामेल। AI इमेज
बॉर्डर से लौटकर कामेल ने फौरन कोडवर्ड में मैसेज तैयार किया और पूरा ब्योरा इजराइल की खुफिया एजेंसी को भेज दिया।
अगले 5-6 महीने के दौरान कामेल कई बार सीरियाई सैनिकों के बंकरों में गया। सेना की सुरक्षा योजनाएं, हथियारों का जमावड़ा, किलाबंदी, हमले के प्लान और सेना की ताकत से जुड़े सभी आंकड़े कामेल को मुंहजबानी याद हो गए थे।
एक शाम कामेल को इजराइल से मैसेज मिला- ‘सामान पैक करो। वापस आओ।’
अगले हफ्ते वह इजराइल के तेल अवीव में था। वहां उसकी मुलाकात मोसाद के अफसर यित्जाक से हुई। बातचीत के दौरान अफसर ने पूछा- ‘तुम्हारा दोस्त सीरियाई राष्ट्रपति की जगह लेने वाला है?’
‘मुझे भविष्यवाणी पसंद नहीं है, लेकिन ऐसा हो सकता है।’ कामेल ने जवाब दिया।
यित्जाक मुस्कुराया- ‘ठीक है… अब घर जाओ, नादिया तुम्हारा इंतजार कर रही है।’
कामेल ने कुछ दिन पत्नी और बेटी के साथ गुजारे। फिर वह दमिश्क चला गया। तब तक उसका खास दोस्त जनरल अमीन भी सीरिया लौट चुका था। सियासी गलियारों में खलबली मची हुई थी। तख्तापलट कभी भी हो सकता था। कामेल इसकी कवायद रच रहा था।
फिर तारीख आई 8 मार्च 1963, आखिरकार सीरिया में क्रांति हो गई। दमिश्क में कर्फ्यू लग गया। सड़कें टैंक और फौजियों से भर गईं।
जल्द ही ‘बाथ पार्टी’ सीरिया की सत्ता पर काबिज हो गई। कामेल के लिए यह बड़ा दिन था, क्योंकि उसका खास दोस्त जनरल अमीन राष्ट्रपति बन गया था।
कई दोस्त सरकार में मंत्री और बड़े पदों पर पहुंच गए थे। अब कामेल की राह गुलाबों से सज गई थी। सरकार से लेकर फौज तक, हर जगह उसका जलवा था।
इसकी एक झलक संयुक्त अरब कमांड के पहले चीफ जनरल अली आमेर की सीरिया यात्रा के दौरान देखने को मिली। कामेल इकलौता सिविलियन था, जो इजराइल-सीरिया बॉर्डर पर कर्नलों और जनरलों के साथ गया। हर जगह आमेर के साथ कंधे से कंधे मिलाकर खड़ा रहा।
इजराइल के खिलाफ अरब देशों की जो भी रणनीति बनी, उसमें कामेल की भूमिका अहम रही, लेकिन अगले ही रोज तमाम खुफिया जानकारियां इजराइली मीडिया में छप गईं।
जब यह बात सीरियाई राष्ट्रपति को पता चली, तो वह बेहद गुस्सा हुआ। उसने अपनी खुफिया एजेंसियों को खूब डांटा। जांच का आदेश दे दिया।
अगले दिन राष्ट्रपति ने सीक्रेट मीटिंग की। इसके बाद दोपहर में उन्होंने ‘वॉइस ऑफ इजराइल’ के अरबी स्टेशन को घुमाया। उस पर जो आवाज गूंजी, उसे सुनकर उसका माथा घूम गया। ‘अल्लाह के नाम पर यह क्या है… हर खबर इजराइल कैसे पहुंच जा रही…’
उन्होंने एक खुफिया अफसर को बुलाकर पूछा- ‘क्या तुम्हें आज की सीक्रेट मीटिंग के बारे में पता है?’
अफसर ने कहा- ‘नहीं,’
राष्ट्रपति ने कहा- ‘लेकिन मैंने कुछ मिनट पहले इजरायली रेडियो पर इसके बारे में सुना। उस बैठक में 30 अफसर थे। उसकी पूरी जानकारी इतनी जल्द इजराइल को कैसे मिली। जरूर किसी ने टेलीग्राम का इस्तेमाल किया है।’
अफसर खामोश रहा।
राष्ट्रपति ने उसे डांटते हुए कहा- ‘दिन-रात एक कर दो। हर जगह छान मारो। वो आदमी जल्द से जल्द गिरफ्तार होना चाहिए।’
सीरिया के जासूसों और इंटेलिजेंस अफसरों ने उस आदमी का पता लगाने के लिए हर जगह छान मारी। तमाम तरीके अपनाए, लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा।
इसी दौरान कामेल अपने कर्नल दोस्त सलीम के साथ गोलान हाइट्स पहुंचा। लंबी और ऊंची पहाड़ी। जहां सीरियाई सेना के बंकर बने हुए थे। कर्नल सलीम, कामेल को लेकर हर बंकर में गया। वहां के सैनिकों से मिलवाया। खुफिया चीजें दिखाईं।
उस रोज धूप बहुत तेज थी। तोपों के पास खड़े सीरियाई सैनिक पसीने से लथपथ थे।

गोलान हाइट्स की पहाड़ियों पर कामेल (बीच में) अपने दोस्तों के साथ।
कामेल ने सीरियाई कर्नल के कंधे पर हाथ रखा और बोला- ‘कर्नल साहब! आपकी किलाबंदी वाकई शानदार है… लेकिन उन बेचारे सैनिकों को देखिए। इस गर्मी में बिना किसी छाया के वे तोप पर मुस्तैद हैं। दुश्मन अचानक हमला कर दे, तो वे धूप से ही आधे निढाल हो चुके होंगे।’
कर्नल ने सिर हिलाया, ‘बात तो सही है कामेल, लेकिन इस बंजर पहाड़ी पर छाया कहां से लाएं?’
‘हम यहां चारों ओर तेजी से बढ़ने वाले यूकेलिप्टस के पेड़ क्यों नहीं लगा देते? इससे दो फायदे होंगे- सैनिकों को छाया मिलेगी, और दूर से इजराइली विमानों को लगेगा कि यह सिर्फ पेड़ों का एक झुंड है।’
कर्नल ने उसकी पीठ थपथपाई, ‘लाजवाब कामेल… तुम सिर्फ व्यापारी नहीं, डिफेंस के भी उस्ताद हो।’
कुछ ही हफ्तों में सीरियाई सेना ने गोलान हाइट्स के अहम ठिकानों के किनारे-किनारे यूकेलिप्टस के पौधे रोप दिए।
अब तक 1964 का नवंबर आ चुका था। एक रोज राष्ट्रपति ने कामेल को बुलाया और अपनी सरकार में ‘डिप्टी डिफेंस मिनिस्टर बनने का ऑफर दिया।’
कामेल ने बहुत खुश होने का नाटक किया। राष्ट्रपति के गले लग गया। फिर कहा- ‘शुक्रिया जनाब… मैं आपकी दोस्ती को कभी भूल नहीं पाऊंगा।’
राष्ट्रपति हंसने लगा।…
कामेल ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘कुछ दिनों के लिए मैं अर्जेंटीना जाने वाला हूं। परिवार में कुछ दिक्कत आ गई है। लौटकर आता हूं तो आपके ऑफर पर विचार करता हूं।’
इसी बीच 13 नवंबर को सीरिया ने बॉर्डर से सटे इजराइली इलाकों में गोलाबारी कर दी। कई लोग मारे गए। फिर इजराइल ने जवाब देना शुरू किया। उसके टैंक और भारी तोपखाने आग उगलने लगे। सीरिया को काफी नुकसान हुआ। उसके कई सैनिक मारे गए।
इजराइल ने उसके लड़ाकू विमानों को तबाह कर दिया था। उसके हमले इतने सटीक थे कि सीरिया के सैनिकों को संभलने तक का मौका नहीं मिला।
इन हमलों का असली उस्ताद कामेल तब अपने बेडरूम में नादिया के साथ था। वह दूसरी बार पेट से थी। कामेल ने उसका पेट सहलाते हुए पूछा- ‘वह कैसा महसूस कर रहा है?’
‘वह? तुम्हें क्यों लगता है कि लड़का ही है?’
‘पहली संतान लड़की है, तो इस बार लड़का ही होगा।’

एली कोहेन और उसकी पत्नी नादिया। AI इमेज
नादिया हंसने लगी।
दो दिन बाद… नादिया ने एक बेटे को जन्म दिया। कामेल खुशी के मारे पागल हो गया। तभी शाम को उसका फोन बजा- ‘मोह-माया छोड़ो, मिशन पर निकलो।’
कुछ रोज बाद कामेल फिर से दमिश्क पहुंच गया, लेकिन वह अब सरकार में कुछ नेताओं और अफसरों को खटकने लगा था। लोग उसके बढ़ते कद से परेशान थे। इन्हीं में से एक अफसर कामेल पर कड़ी नजर रखने लगा।
जनवरी 1965 की बात है। सीरिया के खुफिया अफसर दरवाजा तोड़कर कामेल के घर के भीतर घुस गए। बिस्तर पर ट्रांसमीटर, खुफिया मशीन और कोड वर्ड में लिखे मैसेज पड़े थे। कामेल रंगे हाथ पकड़ा गया।
फिर खौफनाक यातनाओं का दौर शुरू हुआ। सीरिया को पता चला कि कामेल का असली नाम एली है और वह इजराइल का जासूस है। सीरिया की अदालत ने उसे मौत की सजा सुनाई।
18 मई 1965 की रात, एली ने एक खत लिखा, ‘नादिया, मेरी प्यारी पत्नी, मैं तुमसे गुजारिश करता हूं कि तुम बीते हुए वक्त पर रोना मत। खुद को नया जीवन देना, बच्चों का ख्याल रखना… मेरी आत्मा हमेशा तुम्हारे साथ रहेगी।’
सुबह-सुबह एली को हजारों की भीड़ के सामने बीच चौराहे पर ले जाया गया। फांसी का फंदा तैयार था। सीरियाई रेडियो पर लाइव प्रसारण किया जा रहा था।
इजराइल के तेल अवीव में बैठी नादिया रेडियो से कान लगाए बैठी थी। जैसे ही जल्लाद ने फांसी का लीवर खींचा, नादिया ने रेडियो उठाकर फेंक दिया। वह जोर-जोर से चीखने लगी। एली को फांसी दे दी गई थी।
दो साल बाद… जून 1967 में इजराइल और अरब देशों के बीच जंग छिड़ गई। इजराइल के सामने 6 देश थे। मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, इराक, सऊदी अरब और कुवैत। इजराइल को पता था कि गोलान हाइट्स में जो यूकेलिप्टस के पेड़ लगे हैं, वो असल में सीरियाई फौज के अहम ठिकाने हैं।
इजराइल ने चुन-चुनकर उन ठिकानों पर बम बरसाए और महज 6 दिनों के भीतर जंग जीत ली। गोलान हाइट्स के बड़े हिस्से पर उसका कब्जा हो गया।

18 मई 1965 को एली कोहेन को सीरिया में फांसी दी गई।
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रेफरेंस :
- Our Man In Damascus : By Eli Ben-Hanan
- ELI COHEN: A Life of Espionage and Sacrifice : By Starlight History
