Headlines

Highly Sensitive Child Signs; Parenting Mistakes To Avoid & Tips


  • Hindi News
  • Lifestyle
  • Highly Sensitive Child Signs; Parenting Mistakes To Avoid & Tips | HSP Impact

5 दिन पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल

  • कॉपी लिंक

सवाल- मैं कानपुर से हूं। मेरी 8 साल की बेटी बहुत संवेदनशील है। छोटी-छोटी बातों पर रोने लगती है, जैसे किसी ने कुछ कह दिया या गेम में हार गई। कोई थोड़ा–सा चिढ़ा भी दे तो वो जवाब देने या मुकाबला करने की बजाय रोने लगती है। स्कूल में भी बहुत जल्दी आहत हो जाती है। सब कहते हैं कि वह ‘बहुत कमजोर दिल की’ है। मेरी फिक्र ये है कि उसे स्ट्रॉन्ग कैसे बनाऊं। क्या इतना सेंसिटिव होना सही है? मैं इससे कैसे डील करूं। प्लीज गाइड मी।

एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर

जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आपकी चिंता वाजिब है। लेकिन सबसे पहले मैं आपको यह बताना चाहूंगी कि संवेदनशील होना कोई कमजोरी नहीं है।

दरअसल, कुछ बच्चे जन्म से ही भावनाओं को गहराई से महसूस करते हैं। अगर कोई उन्हें कुछ कह दे, दोस्त बात न करे, गेम में हार जाएं या टीचर कोई कमेंट कर दे, तो वे उसे लंबे समय तक याद रखते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि वे जिंदगी में कमजोर साबित होंगे। कई बार यही संवेदनशीलता आगे चलकर उन्हें दयालु, सहानुभूतिपूर्ण और समझदार इंसान बनाती है।

ऐसे में सबसे जरूरी है कि बच्ची को अपनी भावनाओं को मैनेज करना सिखाया जाए। आइए आपके सवाल पर विस्तार से बात करते हैं।

बच्चे ओवर सेंसिटिव क्यों होते हैं?

हर बच्चे का स्वभाव अलग होता है। कुछ बच्चे मिलनसार होते हैं, तो कुछ शांत रहते हैं। इसी तरह कुछ बच्चे भावनाओं को बहुत गहराई से महसूस करते हैं। 8 साल की उम्र में बच्चे अभी भावनाओं को समझना और रेगुलेट करना सीख रहे होते हैं। ऐसे में अगर कोई बात उन्हें बुरी लग जाए, तो उनके लिए उसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होता है।

संवेदनशील बच्चे अक्सर-

  • दूसरों की बातों को दिल पर लेते हैं।
  • किसी की नाराजगी जल्दी महसूस करते हैं।
  • हार या असफलता से ज्यादा प्रभावित होते हैं।
  • दूसरों की तकलीफ देखकर भी परेशान होते हैं।
  • अपने बारे में ज्यादा सोचते हैं।

बच्चे की इस सेंसिटिविटी के पीछे कई मनोवैज्ञानिक कारण भी हो सकते हैं, ग्राफिक में देखिए-

संवेदनशीलता कोई कमजोरी नहीं

बहुत से माता-पिता यह मान लेते हैं कि जो बच्चा जल्दी रोता है या बातों को दिल पर ले लेता है, वह दिल का कमजोर है। जबकि ये सच नहीं है। संवेदनशील बच्चे अक्सर दूसरों की भावनाओं को बेहतर समझते हैं, उनमें सहानुभूति ज्यादा होती है और वे रिश्तों को गहराई से महसूस करते हैं।

  • समस्या संवेदनशील होने में नहीं, बल्कि भावनाओं को मैनेज न कर पाने में है।
  • अगर बच्चे को अपनी भावनाओं को समझना, व्यक्त करना और उनसे निपटना सिखाया जाए तो यही संवेदनशीलता आगे चलकर उसकी ताकत बन सकती है।
  • इसलिए बच्चे को ‘कमजोर दिल का’ या ‘बहुत इमोशनल’ कहने की बजाय उसकी भावनाओं को स्वीकार करें और उसे धीरे-धीरे इमोशंस को रेगुलेट करना सिखाएं।
  • आपका लक्ष्य संवेदनशीलता खत्म करना नहीं है। आपका लक्ष्य है कि बच्चा अपने इमोशंस को कैसे देखे, समझे और रेगुलेट करे।

दूसरों की बातों का प्रभाव

बच्चे अक्सर दूसरों की राय, प्रतिक्रिया और व्यवहार को खुद से जोड़कर देखने लगते हैं। किसी की आलोचना, मजाक या नाराजगी उन्हें वयस्कों की तुलना में ज्यादा प्रभावित कर सकती है।

संवेदनशील बच्चे दूसरों के शब्दों और भावनाओं को अधिक गहराई से महसूस करते हैं। वे सबको खुश रखने की कोशिश करते हैं। छोटी-सी नकारात्मक टिप्पणी भी उन्हें आहत कर सकती है। ओवर सेंसिटिविटी बच्चे पर कुछ नेगेटिव प्रभाव भी डालती है। इसे ग्राफिक में देखिए-

इसलिए बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि हर किसी की राय उनकी पहचान तय नहीं करती। धीरे-धीरे उनमें नकारात्मक बातों का हेल्दी तरीके से सामना करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।

बच्चा रोए तो कैसे डील करें?

ऐसी स्थिति में अक्सर माता-पिता की पहली प्रतिक्रिया होती है, “बस करो, अब रोना बंद करो।” लेकिन रोते समय बच्चा सीखने की स्थिति में नहीं होता। उस समय उसका ब्रेन कई सारी भावनाओं से भरा होता है। इसलिए सबसे पहले उसकी भावनाओं को स्वीकार करें।

उदाहरण के लिए, उससे कहें-

  • “मुझे दिख रहा है कि तुम्हें बुरा लगा है।”
  • “तुम इस बात से दुखी हो, मैं समझ सकती हूं।”
  • “हारने के बाद उदास महसूस करना स्वाभाविक है।”

जब बच्ची महसूस करेगी कि उसे समझा जा रहा है, तो उसका मन धीरे-धीरे शांत होगा। ध्यान रखें, भावनाओं को स्वीकारना और गलत व्यवहार को स्वीकारना, दोनाें अलग बातें हैं। आप उसकी उदासी को समझ सकते हैं। साथ ही उसे यह भी सिखा सकते हैं कि हर निराशा के बाद संभलना जरूरी है।

समस्या से बचाना समाधान नहीं

कई पेरेंट्स यह गलती करते हैं कि जब बच्चा किसी कारण से दुखी होता है ताे तुरंत उसकी समस्या हल करने लगते हैं। उदाहरण के लिए- अगर दोस्त ने कुछ कह दिया तो कहते हैं- “चलो मैं टीचर से बात करती हूं।”

लेकिन बच्चे को जीवन में हमेशा हर समस्या, हर बुरी बात से बचाना संभव नहीं है। इसलिए बच्चे की हर छोटी–मोटी प्रॉब्लम सॉल्व करने की बजाय उसे कठिन भावनाओं को मैनेज करना सिखाएं। जैसेकि आप पूछ सकती हैं-

  • “तुम्हें सबसे ज्यादा दुख किस बात का हुआ?”
  • “मैं तुम्हारी कैसे मदद कर सकती हूं?”
  • इससे बच्चे में समस्या सुलझाने की क्षमता विकसित होगी।

इमोशंस को पहचानना सिखाएं

बच्चे सिर्फ रोना जानते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि वे वास्तव में क्या महसूस कर रहे हैं। इसलिए उसे अपनी भावनाओं को पहचानना और उसे नाम देना सिखाएं। जैसेकि-

  • दुख
  • निराशा
  • शर्मिंदगी
  • गुस्सा
  • डर
  • मजाक
  • अकेलापन

जब बच्चा अपनी भावना को शब्दों में व्यक्त करना सीखता है, तो रोना धीरे-धीरे कम होने लगता है। उदाहरण के लिए वह कह पाएगा कि-

  • “मुझे दुख हुआ।”
  • “मुझे लगा कि सब मेरा मजाक उड़ा रहे हैं।”
  • “मुझे स्कूल में बहुत अकेला लगता है।”

यह भावनात्मक विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संवदेनशील बच्चे को सपोर्ट करने के लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें। ग्राफिक में देखिए-

आत्मविश्वास बढ़ाना जरूरी

संवेदनशील बच्चे को इमोशनल सपोर्ट के साथ मजबूत आत्मविश्वास की भी जरूरत होती है। इसके लिए बच्चे की पसंदीदा हॉबीज को सपोर्ट करें, जहां उसे सफलता का अनुभव हो। जैसे-

  • ड्राइंग
  • डांस
  • म्यूजिक
  • स्पोर्ट्स
  • स्टोरी टेलिंग
  • पब्लिक स्पीकिंग

जब बच्चा किसी क्षेत्र में सफल महसूस करता है, तो धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। उसे यह महसूस होना चाहिए कि उसकी पहचान सिर्फ उसकी भावनाओं से नहीं, बल्कि उसकी खूबियों से भी है।

पेरेंट्स कौन-सी गलतियां न करें?

संवेदनशील बच्चे के साथ पेरेंट्स जाने-अनजाने में कुछ गलतियां करते हैं, जो स्थिति को और मुश्किल बना सकती हैं। सभी गलतियां ग्राफिक में देखिए-

एक्सपर्ट की मदद कब लें?

संवेदनशील होना सामान्य है। लेकिन अगर आपको लगे कि यह संवेदनशीलता धीरे-धीरे बच्चे की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगी है, तो काउंसलर की सलाह लेना मददगार हो सकता है। इन स्थितियों में किसी चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट या काउंसलर से बात करें।

अगर बच्चा-

  • स्कूल जाने से बचने लगे।
  • दोस्तों से दूरी बनाने लगे।
  • लगातार उदास रहने लगे।
  • हर समय खुद को दोष देने लगे।
  • छोटी बातों पर बहुत ज्यादा परेशान हो।

अंत में यही कहूंगी कि आपकी बेटी संवेदनशील है। अभी उसे बदलने की नहीं, बल्कि समझने की जरूरत है। जब बच्ची यह महसूस करेगी कि उसकी भावनाएं गलत नहीं हैं तो वह धीरे-धीरे उसे मैनेज करना सीख जाएगी।

याद रखिए, लक्ष्य उसे कम संवेदनशील बनाना नहीं है। लक्ष्य यह है कि वह अपनी संवेदनशीलता के साथ मजबूत बनना सीखे। पेरेंट्स का धैर्य, स्वीकार्यता और प्यार इस सफर में उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं।

……………… ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- 13 साल की बेटी हकलाती है: बच्चे मजाक उड़ाते हैं, क्लास में कुछ बोलती नहीं, हमेशा चुप रहती है, हम उसे कैसे हेल्प करें?

‘द स्टटरिंग फाउंडेशन’ के मुताबिक, दुनियाभर में लगभग 1% यानी 8 करोड़ से ज्यादा लोग हकलाते हैं। महिलाओं की तुलना में पुरुषों में यह समस्या लगभग चार गुना ज्यादा होती है। करीब 5% बच्चे उम्र के किसी-न-किसी दौर में हकलाहट का सामना करते हैं। इनमें से लगभग 75% बच्चे बड़े होते-होते ठीक हो जाते हैं, जबकि करीब 1% में यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है। आगे पढ़िए…

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *