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Kailash Satyarthi Column | Need For Moral Compass In Artificial Intelligence


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8 मिनट पहले

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कैलाश सत्यार्थी नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता - Dainik Bhaskar

कैलाश सत्यार्थी नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता

हमारे समय का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अब यह नहीं रह गया है कि क्या एआई हमारी दुनिया को बदल देगा। वैसा तो वह पहले ही कर चुका है। लेकिन अब दुनिया को इस तकनीक के लिए एक ‘मोरल-कम्पास’ (नैतिक दिशानिर्देश) की जरूरत है। इसी सोच के साथ मैंने जिनेवा में आयोजित एआई फॉर गुड ग्लोबल समिट में 170 देशों से आए 12,000 से अधिक प्रतिनिधियों के समक्ष ‘कम्पैशनेट एआई’ की बात रखी थी।

यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि एआई केवल लाभ और शक्ति का माध्यम न बनकर व्यापक जनहित में योगदान दे, तो हमें एआई इंजीनियरों और डेवलपर्स को एक महीने के लिए उनकी प्रयोगशालाओं से बाहर भेजना चाहिए।

उन्हें खदानों और कारखानों में काम करने वाले बच्चों से मिलना चाहिए, संघर्षों के कारण विस्थापित हुए परिवारों से भेंट करनी चाहिए और गरीबी, भेदभाव तथा सामाजिक बहिष्कार झेल रहे कमजोर समुदायों के बीच समय बिताना चाहिए।

उन्हें उन लोगों के साथ चलना चाहिए, जिनका जीवन टेक्नोलॉजी से ज्यादा अन्याय से प्रभावित होता है। केवल एक महीने का ऐसा अनुभव भी किसी व्यक्ति की सोच बदल सकता है और वही इस बात को प्रभावित करेगा कि डेवलपर इस तकनीक को किस दिशा में ले जाते हैं।

एआई पहले ही शिक्षा, हेल्थकेयर, बिजनेस, शासन और रिसर्च को नए रूप में ढाल रहा है। लेकिन हर तकनीकी क्रांति एक नैतिक परीक्षा भी होती है और एआई अपवाद नहीं है। आज हमारे सामने सबसे बड़ा खतरा यह है कि हम सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न को ही भूल रहे हैं।

और वो यह है कि आखिर यह बुद्धिमत्ता किसकी सेवा के लिए है? यह सही है कि वैश्विक मंचों पर होने वाली अधिकांश चर्चाएं पहले ही नैतिक एआई और जिम्मेदार एआई जैसी अवधारणाओं पर केंद्रित हैं, लेकिन हमें बेहतर शासन-व्यवस्था, सार्थक जवाबदेही और प्रभावी रेगुलेशन की जरूरत है।

नैतिकता ही हमें बता सकती है कि क्या सही है। कानून सीमाएं तय कर सकते हैं, लेकिन वे उन लोगों की सोच नहीं बदल सकते, जो अरबों लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाली तकनीकों का निर्माण कर रहे हैं। इसके लिए और गहरी वस्तु की आवश्यकता है, और वह है- करुणा।

करुणा को अकसर सहानुभूति, दयालुता या परोपकार का पर्याय समझ लिया जाता है। लेकिन यह इनमें से किसी की भी समानार्थी नहीं है और न ही यह केवल एक भावना या कोई अमूर्त नैतिक आदर्श है। करुणा की शुरुआत तब होती है, जब हम किसी दूसरे व्यक्ति के दु:ख को अपना मानते हैं। यही भावना हमें उसकी पीड़ा को कम करने के लिए कदम उठाने को प्रेरित करती है। इसमें कार्रवाई करने का साहस भी शामिल होता है। करुणा हमें केवल व्यवस्थाओं को अधिक सक्षम बनाने नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा की रक्षा करने की दिशा में भी ले जाती है।

कम्पैशनेट एआई दूसरे फ्रैमवर्क्स से इसलिए अलग है, क्योंकि इसकी शुरुआत तकनीक नहीं, मानवता से होती है। यह पूछने से पहले कि कोई प्रणाली क्या कर सकती है, कम्पैशनेट एआई यह पूछता है कि वह किसके लिए काम करता है। अधिक दक्षता हासिल करने से पहले यह उसके मानवीय परिणामों पर विचार करता है। इनोवेशन का उत्सव मनाने से पहले यह पूछता है कि कहीं कोई पीछे तो नहीं छूट जाएगा।

आज एआई की अनेक विफलताओं, जैसे पूर्वग्रह, भेदभाव, बहिष्कार, भ्रामक सूचना, पर्यावरणीय क्षति और बच्चों के कल्याण के लिए खतरे को अकसर प्रगति के दुर्भाग्यपूर्ण दुष्प्रभावों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन ये केवल दुष्प्रभाव नहीं हैं।

ये इस बात के प्रमाण भी हैं कि जब इन प्रणालियों को विकसित किया गया, तब मनुष्यता के हित की बात करने वाला कोई न कोई व्यक्ति अनुपस्थित था, उसकी अनदेखी की गई थी या उसे नजरअंदाज कर दिया गया था।

आज बड़े हो रहे बच्चे संभवतः अपने माता-पिता, शिक्षकों या पड़ोसियों की तुलना में इंटेलिजेंट मशीनों के साथ अधिक समय बिताएंगे। सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों को तो हम पहले ही समझ चुके हैं। इसलिए हमें यह पूछने के बजाय कि एआई अर्थव्यवस्था को किस तरह बदल सकता है, यह पूछना चाहिए कि जब एल्गोरिदम किसी दूसरे व्यक्ति की पीड़ा को महसूस करने की मानवीय क्षमता की जगह ले लें, तो उसके क्या नतीजे होंगे।

यदि उन्हें पीड़ा को पहचानने के लिए कभी तैयार ही नहीं किया गया, तो क्या वे न्याय की रक्षा कर पाएंगे? यदि उनका लक्ष्य केवल मुनाफे को बढ़ाना हो, तो क्या वे शांति पर जोर दे सकेंगे? ये नैतिक प्रश्न तकनीकी प्रश्नों से पहले पूछे जाने चाहिए, क्योंकि यही मानवता के भविष्य को आकार दे सकते हैं।

एआई डेवलपरों को अपनी-अपनी प्रयोगशालाओं से निकलकर खदानों और कारखानों में काम करने वाले बच्चों से मिलना चाहिए, विस्थापित परिवारों से भेंट करनी चाहिए और गरीबी, भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार झेल रहे कमजोर समुदायों के बीच समय बिताना चाहिए। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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