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55 मिनट पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
किसी बड़े कॉर्पोरेट में आप अपने केबिन में बैठे हुए हैं और एक सेक्रेटरी आपकी मीटिंग्स तय कर रहा है। अचानक एचआर हेड आपको मैदान में बुलाकर गुजारिश करता है कि जूते-मोजे उतारें और आलू की एक बोरी में पैर डालकर दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लें।
प्रतियोगिता में आपको रिपोर्ट करने वाले, और दूसरे विभागों के ऐसे युवा कर्मचारी भी हैं, जिन्हें लंच में आपके साथ कैंटीन में बैठने का मौका भी नहीं मिलता है। ऐसे में आप कितना सहज महसूस करेंगे? या फिर, काम के बीच आपको एक अस्थायी किचन में बुलाकर बड़ी-सी कढ़ाही में पटेटो-रोस्ट बनाने को कहा जाए।
क्या आप तुरंत शेफ की कैप और एप्रन पहनकर यह करने लगेंगे या पलटकर पूछेंगे कि इस एक्टिविटी से कंपनी की प्रोडक्टिविटी में फायदा कैसे होगा? अगर आप इनमें से कोई भी काम करने में हिचकिचाते हैं या आदेश माने बिना उनसे सवाल पूछते हैं तो मैनेजमेंट मान सकता है कि आपकी टीम-बिल्डिंग एबिलिटी अभी संतोषजनक स्तर तक नहीं पहुंची है। वह पूरे स्टाफ के लिए टीम-बिल्डिंग प्रोग्राम कराने की सोच सकता है, ताकि सहकर्मियों की आपसे संपर्क करने की एंग्जायटी खत्म की जा सके।
मुझे इस टीम-बिल्डिंग की अहमियत तब समझ में आई, जब मैंने एक ऐसे ग्रुप के सदस्यों की रिपीटेड पोस्ट पर ध्यान देना शुरू किया, जिसमें मैं जुड़ा हुआ हूं। ‘गेम-स्टॉर्म फैन क्लब’ में यह पोस्ट थी कि ‘मैंने आज एक बड़े कॉर्पोरेट के साथ टीम-बिल्डिंग एक्सरसाइज की।’
इस ग्रुप में देश के विभिन्न राज्यों से 981 सदस्य हैं और इसे आसिफ इब्राहिम हेड करते हैं। वह एचआर प्रोफेशनल्स और ट्रेनर्स को टीम-बिल्डिंग के लिए कई तरह के गेम्स और एक्टिविटी सिखाते हैं। मैं अकसर सोचता था कि टीम-बिल्डिंग एक्सरसाइज में ये लोग पटेटो-सैक रनिंग और रोस्ट पटेटो प्रतियोगिता के अलावा आखिर करते क्या हैं।
फिर इस रविवार को मैंने गैलप का एक नया सर्वे देखा, जिसमें कहा गया था कि हर उम्र के कर्मचारी वर्कप्लेस पर अकेलापन महसूस करने लगे हैं। सर्वे में पाया गया कि बड़े कारोबारों और दूसरी संस्थाओं पर उनका भरोसा अब तक के सबसे निचले स्तर पर है।
1935 में स्थापित गैलप एक वैश्विक एनालिटिक्स और कंसल्टिंग कंपनी है, जो पब्लिक ओपिनियन को ट्रैक करने और वर्कप्लेस-बिहेवियर का अध्ययन करने के लिए मशहूर है। तब जाकर मुझे समझ आया कि ये ट्रेनर्स पूरे साल टीम-बिल्डिंग एक्सरसाइज कराने में इतने व्यस्त क्यों रहते हैं। कभी-कभी तो वे एक ही कंपनी के लिए बार-बार प्रोग्राम करते हैं। शायद आजकल के वर्कप्लेस में साथ खेलना एक तरीका बनता जा रहा है, जिससे लोग साथ में काम करना सीख पाएं।
दिलचस्प यह है कि ये एक्टिविटीज कंपनी के बोर्ड रूम में नहीं, बल्कि प्राकृतिक स्थलों, बच्चों के पार्क, म्यूजियम और किड जोन्स में हो रही हैं। कई कंपनियां रिट्रीट में ऐसे ट्रिप प्लान कर रही हैं। यहां होने वाले गेम्स देखकर लगता है जैसे किसी 10 साल के बच्चे ने डिजाइन किए हों। और बड़े लोगों से ऐसी मजाकिया चीजें करने की उम्मीद की जाती है, जो हममें से कई लोगों ने उस उम्र में की थीं, जब दोस्त बनाना आसान लगता था।
कल्पना कीजिए कि एक पिरामिड बनाया जा रहा है, जिसमें 75 किलो वजनी बॉस नीचे खड़ा है जबकि दो महीने पहले ही आया 48 किलो से कम वजन का नया कर्मचारी उनकी पीठ पर चढ़कर एक ड्रिंक लेने की कोशिश कर रहा है। यह अजीब लग सकता है, लेकिन इस खेल का नतीजा नए कर्मचारी और 25 साल से वहां काम कर रहे बॉस के बीच मजबूत बॉन्डिंग के रूप में सामने आता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उम्रदराज कर्मचारी की तुलना में कम वजन वाले युवा कर्मचारी में एम्प्लॉयर के मूल्यों के प्रति परवाह करने की प्रवृत्ति अधिक होती है।
एम्प्लॉयर्स ने युवा पीढ़ी को वर्कप्लेस से जोड़ने का एक तरीका समझ लिया है। पांच साल पहले की तुलना में कंपनियों ने अब कर्मचारियों की मंशा को अधिक प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। गोल्फ और क्रिकेट जैसे खेल वो नजदीकी नहीं ला पाते, जो बच्चों के खेल ला सकते हैं। सच में तो ऐसी जगहें, जिनके मुख्य ग्राहक बच्चे होते हैं, वे अपनी मार्केटिंग अब कॉर्पोरेट ऑफ-साइट विकल्पों के तौर पर करने लगी हैं। यह एम्प्लॉयर्स की बदलती सोच का संकेत है।
फंडा यह है कि अगर आप कर्मचारियों के भीतर के बच्चे को मेंटरिंग या गेमिंग के जरिए वर्क-टेबल पर ले जाएं तो वे अधिक प्रोडक्टिव बन सकते हैं।

