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N. Raghuraman Column | Real Success Lessons Beyond Quick Delivery Apps


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4 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

डिक पोर्टिलो एक गरीब परिवार से थे। तीन बच्चों में सबसे छोटे डिक का जन्म शिकागो में मेक्सिको और ग्रीस से आए प्रवासियों के घर हुआ। उनकी परवरिश शहर की सबसे बदनाम हाउसिंग कॉलोनियों में से एक में हुई। 1963 में उन्होंने हॉट-डॉग का एक स्टैंड लगाया, जबकि उन्हें यह तक नहीं पता था कि हॉट-डॉग बनाया कैसे जाता है। 2014 तक, यानी 50 साल बाद उन्होंने 4 हजार कर्मचारियों वाली निजी स्वामित्व की सबसे बड़ी रेस्तरां कंपनी खड़ी कर ली थी। इसकी न कोई फ्रेंचाइजी थी और न कोई बाहरी निवेशक।

उनका एक आउटलेट साल में 9 मिलियन डॉलर तक की कमाई कर सकता था, जो एक सामान्य मैकडॉनल्ड्स आउटलेट की कमाई से करीब तीन गुना है। उनका कारोबार निजी ही रहा। वे मीडिया में भी कम ही दिखते थे, क्योंकि वे हॉट डॉग बेचते थे, कोई शाइनिंग टेक्नोलॉजी नहीं। उनकी सफलता दशकों तक चुपचाप बढ़ती रही। आधी सदी बाद उन्होंने कंपनी को 1 बिलियन डॉलर में बेच दिया।

इस रकम से उन्होंने समुद्र किनारे 12 हजार वर्ग फुट का घर, एक मेन्शन, 130 फुट की यॉट और एक प्राइवेट जेट खरीदा। बाकी जीवन के लिए पर्याप्त पैसा सुरक्षित भी रख लिया। हाल ही में आई जीवनी में उन्होंने लिखा कि ‘एक समय मैं सोचता था कि इस दुनिया को देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है।’

किसी छोटे इंडस्ट्रीयल इलाके पर नजर डालिए, जहां एयरक्राफ्ट डोर के कास्केट से लेकर सॉफ्ट ड्रिंक में डलने वाले कैरेमल तक सब कुछ बनता है तो आपको ऐसे लाखों आंत्रप्रेन्योर मिल जाएंगे। सामूहिक रूप से उनकी संपत्ति खरबों डॉलर की है। उन्होंने चुपचाप अपने मिनी एंपायर खड़े किए हैं। वे शायद ही कभी मीडिया में आए, न कभी सोशल मीडिया सेलिब्रिटी ही बने। फिर भी उनमें से कई मिलियनेयर बन गए।

सफल आंत्रप्रेन्योर बनने के लिए आपका जीनियस होना जरूरी नहीं। स्कूल में मिले नंबर और कोई बिजनेस शुरू करना, इन दोनों चीजों का नाता कमजोर ही है। हाई स्कूल टेस्ट में सर्वाधिक स्कोर करने वाले 10% छात्रों में से सिर्फ 1.3% ही आगे चलकर बिजनेस फाउंडर बने। जो अधिक मायने रखता है, वह है रियल-लाइफ एक्सपीरियंस और फैमिली बिजनेस से कम उम्र में जुड़ाव।

मसलन, पोर्टिलो ने 1957 में ग्रेजुएशन के सात दिन बाद ही मरीन कोर जॉइन कर ली थी। वहां बिताए दो सालों को वे जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष मानते हैं, क्योंकि वहां उन्होंने टीमवर्क, ऑर्गेनाइजेशनल प्लानिंग और सही ट्रेनिंग की अहमियत सीखी। अपना बिजनेस खड़ा करते हुए उन्होंने इन तीनों को ही लागू किया।

युवाओं को इन कहानियों से जो सीखना चाहिए, वो सरल है- अगर आप दशकों तक अपने सपने जिंदा रखते हैं तो अंतत: सफलता मिल सकती है, लेकिन इसका कोई शॉर्टकट नहीं है। आज यह कहानियां इसलिए मायने रखती हैं, क्योंकि हम 10 मिनट वाली दुनिया में जी रहे हैं।

10 मिनट में ग्रॉसरी पहुंच जाती है, युवा प्रोफेशनल्स 10 हफ्तों में लीडरशिप पोजिशन और 10 महीनों में मैनेजमेंट में प्रमोशन की उम्मीद करते हैं। मैं इसे ‘स्विगी-जोमेटो माइंडसेट’ कहता हूं- यानी, पाने लायक हर चीज के जल्दी से मिल जाने की धारणा।

लेकिन सफलता ऐसे काम नहीं करती। यदि हम किसी पौधे की डालियों को खींचते रहें तो वो पेड़ नहीं बन जाता। वह इसलिए बढ़ता है क्योंकि उसकी जड़ें जमीन के नीचे मजबूत हो रही होती हैं। मैं अकसर अपनी स्पीच में हमारी आर्म्ड फोर्सेज का संदर्भ देता हूं, क्योंकि वे इस सिद्धांत को हमसे बेहतर समझती हैं।

सैनिक किसी ऑपरेशन की तैयारी में 10 साल लगा सकते हैं, जबकि वह ऑपरेशन सिर्फ 10 मिनट में समाप्त हो सकता है। और जब वो 10 मिनट आते हैं तो वे पूरी सटीकता से काम करते हैं, क्योंकि उसी पल के लिए उन्होंने हजारों घंटे तैयारी की होती है।

कॅरिअर कोई फूड-डिलीवरी ऑर्डर नहीं है। आप ऑर्डर देकर 10 मिनट में सफलता मिलने की उम्मीद नहीं कर सकते। मजबूत कॅरिअर, बिजनेस और जिंदगी धीरे-धीरे बनते हैं- एक स्किल, एक गलती, एक सीख और एक अनुशासित दिन के साथ।

स्पीड की दीवानी दुनिया में धैर्य ही शायद सबसे अंडररेटेड कॉम्पीटिटिव एडवांटेज बन सकता है। जब दूसरे लोग तुरंत परिणाम चाहते हों तो तैयारी में वर्षों खपाने को तैयार लोग ही तब तक टिके रह सकते हैं, जब तालियां बजने की शुरुआत होगी।

फंडा यह है कि अपनी प्रोग्रेस को इस आधार पर मत मापिए कि दुनिया आपको कितनी जल्दी नोटिस करती है। इस आधार पर मापिए कि आप खुद को कितनी शिद्दत से तैयार कर रहे हैं।

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