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- N. Raghuraman’s Column – Why Teach Children To Read Before Showing Them Things?
8 मिनट पहले
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एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु
आमतौर पर जब परिवार की युवा पीढ़ी के लोग ओटीटी चैनलों की किसी फिल्म के बारे में मेरी राय पूछते हैं तो मैं उन्हें सलाह देता हूं कि पहले किताब पढ़ें और बाद में फिल्म देखें। ऐसी आखिरी सलाह मैंने नेटफ्लिक्स की 2025 में रिलीज हुई ‘द वुमन इन केबिन 10’ को लेकर दी थी, जो 2016 में इसी नाम से आए रूथ वेयर के साइकोलॉजिकल थ्रिलर उपन्यास पर आधारित है। इससे पहले ऐसी ही फिल्में ‘द थर्सडे मर्डर क्लब’ रिचर्ड ओस्मान के उपन्यास पर और ‘द हाउसमेड’ फ्रिडा मैकफैडन की किताब पर बनी थीं।
फैमिली वॉट्सएप ग्रुप पर एक यंगस्टर ने यह लिखकर मुझे चुप करा दिया कि ‘…लेकिन किताब फिल्म का मजा खराब कर देगी और रघु अंकल से मत पूछना, वे बहुत पुराने ख्यालों के हैं।’ मैं एक ऐसे कठोर नियमों वाले माहौल में बड़ा हुआ, जहां सुख पाने से पहले खुद पर सख्त नियंत्रण रखना सामान्य नियम था। इसलिए कॉलेज के दिनों में मुझे देव आनंद की ‘गाइड’ देखने से पहले आर. के. नारायण की ‘द गाइड’ पढ़ने को कहा गया।
हालांकि जब मैं ग्रेजुएशन कर रहा था, तब तक यह फिल्म दस साल पुरानी हो चुकी थी। 1965 में रिलीज हुई यह फिल्म आगे चलकर हिंदी सिनेमा की सबसे लंबे समय तक याद की जाने वाली क्लासिक फिल्म बनी। तब मुझे इस किताब और फिल्म के बीच का अंतर साफ दिखाई दिया। नारायण के शब्दों की खूबसूरती अटूट रूप से मालगुडी से जुड़ी हुई है- एक शांत, धूल भरा, धीमी रफ्तार वाला दक्षिण भारतीय कस्बा, जो आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है। वे समृद्ध सामाजिक वास्तविकता के साथ रेलवे स्टेशन, कस्बे के नाई का स्थानीय हास्य और रोजमर्रा की धीमी-सी जिंदगी का वर्णन करते हैं।
1960 के दशक के सिनेमा के बड़े पर्दे की भव्यता के मुताबिक फिल्म को राजस्थान की जीवंत और कलरफुल जगहों पर फिल्माया गया। फिल्म में शहर के दृश्य और राजू के टूर-गाइड वाले सिक्वेंस उदयपुर के सिटी पैलेस, पिछोला झील, फतेह सागर झील, सूरज पोल और हाथी पोल के आसपास शूट किए गए। देखने में ये जगहें बेहद खूबसूरत थीं लेकिन इन बदलावों ने छोटे कस्बे की उस खास इंटिमेसी को खत्म कर दिया, जो नारायण की दुनिया को प्रामाणिक बनाती है।
1950 के दशक के दक्षिण भारतीय कस्बे में हो रहे सामाजिक-राजनीतिक बदलावों की जगह एक अधिक सामान्य सिनेमाई ग्रामीण भारत ने ले ली थी। नारायण के लेखन की खूबसूरती उसकी हल्के व्यंग्य, संयमित यथार्थवाद और इंसानी कमजोरियों की गहरी समझ में है। अपनी किताब में उन्होंने असाधारण हीरो नहीं बनाए। उन्होंने ऐसे आम लोगों के बारे में लिखा, जो अपनी ही छोटी सोच, लालच और किस्मत के अजीब खेलों में फंसे हुए हैं।
इस सिनेमैटिक मास्टरपीस को जहां शानदार अभिनय, सदाबहार संगीत और बेबाक स्टोरीटेलिंग के लिए सराहा गया, वहीं यह फिल्म बिल्कुल अलग तरह की एस्थेटिक फिलॉसफी पर आधारित है। यह नारायण की शांत, मनोवैज्ञानिक बारीकियों की जगह व्यावसायिक भारतीय सिनेमा के लिए जरूरी अति-नाटकीयता और हाई-स्टेक्स मोरेलिटी को अपनाती है। पहले किताब पढ़ने और फिर फिल्म देखने के बाद मैंने अपने भीतर शब्दों की शुचिता बनाए रखने के लिए किए गए पिताजी के इस फैसले की सराहना की। बाद में जिंदगी में जहां भी संभव हुआ, मैंने पहले किताब पढ़ी और फिर फिल्म देखी। आखिरी बार ऐसा 2023 की फिल्म ‘द जोन ऑफ इंटरेस्ट’ के साथ हुआ।
मैंने 2014 में मार्टिन एमिस की इसी शीर्षक की किताब पढ़ी थी। इससे पहले क्वेंटिन टैरेंटिनो की 1997 की फिल्म ‘जैकी ब्राउन’ देखने से पहले मैंने एलमोर लियोनार्ड की 1992 की क्राइम थ्रिलर ‘रम पंच’ भी पढ़ी थी। इस प्रक्रिया ने मुझे भीतर से मैच्योर बनाया। मैंने समझा कि जब कोई चीज किताब से फिल्म में जाती है, तो वह कभी भी उसका हूबहू रूपांतरण नहीं हो सकती।
इसके बजाय, यह दोस्तों के बीच कैंपफायर जैसा मौका बन जाता है, जहां कहानी हर स्टोरीटेलर के अनुसार आगे बढ़ती और बदलती है। शायद यही वजह है कि आज भी मैं पहले किताब पढ़ना पसंद करता हूं। किताब कहानी को लेखक की आवाज में बताती है, जबकि फिल्म में आपको इसकी किसी और के द्वारा की गई व्याख्या मिलती है। पहले पढ़ लेने से मजा कम नहीं होता, बल्कि आप देख पाते हैं कि क्या बदला, क्या बचा रहा और कभी-कभी क्या खो ही गया।
फंडा यह है कि फिल्म देखने से पहले किताब पढ़िए। यह तय करने के लिए नहीं कि कौन-सी बेहतर है, बल्कि यह जानने के लिए कि कैसे एक ही कहानी दो अलग-अलग जिंदगियां जी सकती है।

