Nanda Devi Nuclear Device Mystery


दैनिक भास्कर की सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आप पढ़ रहे हैं- ‘ऑपरेशन हैट’। पार्ट-1 में आपने पढ़ा- 1965 में भारत और अमेरिका ने चीन की जासूसी के लिए एक परमाणु उपकरण तैयार किया था। योजना थी इसे 25 हजार फीट ऊंचे नंदा देवी पर्वत पर लगाने की। जैसे ही टीम 23 हज

.

वे परमाणु उपकरण को वहीं एक चट्टान से बांधकर नीचे आ गए। तय हुआ कि गर्मियों में दोबारा आकर इसे इंस्टॉल करेंगे।

जब वे दोबारा पहुंचे, तो कुछ ऐसा हुआ, जिससे दुनिया में खलबली मच गई। आज भी लाखों लोगों के लिए उपकरण खतरा बना हुआ है। पूरी कहानी पार्ट-2 में…

बात है 1 मई 1966 की। दिल्ली में भारत की खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो का एक सेफ हाउस। बाहर एक बस आकर रुकी। उसमें राशन भरा हुआ था। जल्दी से 11 लोग सवार हुए और बस चल पड़ी।

सुबह सूरज निकलने से पहले बस ऋषिकेश पहुंच चुकी थी। आगे का रास्ता पहाड़ी, संकरा और खतरों से भरा था। बस में बैठे लोग परेशान थे। तभी एक मिलिट्री ट्रक आकर रुका। चार-पांच जवान उतरे और फुर्ती से बस का सामान ट्रक पर लाद दिया।

अब बस और ट्रक, दोनों ने रफ्तार पकड़ ली। 2 मई की शाम तक काफिला श्रीनगर पहुंच गया। थोड़ी देर सुस्ताने के बाद, आगे का सफर शुरू हुआ। 3 मई की सुबह होते-होते टीम जोशीमठ पहुंच गई।

ये वही टीम थी, जो नंदा देवी की चोटी पर फिर से जासूसी उपकरण लगाने जा रही थी।

अगला पड़ाव था- 14 हजार फीट ऊंचा नंदा देवी बेस कैंप। जोशीमठ से 90 किलोमीटर का सफर। यहां से पैदल ही पहाड़ चढ़कर जाना था। बर्फीली हवाओं को चीरते हुए टीम धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगी।

सांसें उखड़ रही थीं, दम घुटने लगा था। ठंड इतनी कि बर्फ में हाथ-पैर सुन्न पड़ने लगे। थककर बैठना, फिर हिम्मत जुटाकर उठना और आगे बढ़ना…यही सिलसिला चलता रहा।

साल 1966, नंदा देवी बेस कैंप की तरफ चढ़ाई करते पर्वतारोही।

साल 1966, नंदा देवी बेस कैंप की तरफ चढ़ाई करते पर्वतारोही।

इसी दौरान, चीन ने फिर से झटका दिया। 14 मई को उसने दूसरा परमाणु परीक्षण कर डाला। खबर मिलते ही प्रधानमंत्री दफ्तर से लेकर खुफिया विंग तक हलचल मच गई। अफसरों के चेहरों पर झुंझलाहट साफ झलक रही थी।

जैसे-तैसे 15 मई को टीम नंदा देवी बेस कैंप पहुंच गई। अगले 10 दिन मीटिंग और रणनीतियां बनाने में गुजर गए। फैसला हुआ- कैंप-4 पर सिर्फ 4 भारतीय पर्वतारोही जाएंगे, साथ में कुछ शेरपा और कुली होंगे। कोई अमेरिकी ऊपर नहीं जाएगा।

कैंप-4 पर ही पिछले साल टीम उपकरण छोड़ आई थी। बेस कैंप से वह जगह करीब 10 हजार फीट ऊंची थी।

25 मई की सुबह टीम कैंप-4 के लिए चल पड़ी। बर्फीली हवाएं टीम का रास्ता रोक रही थीं। हर दिन टीम कुछ ऊपर चढ़ती, आराम करती और फिर आगे बढ़ती। इस तरह 6 दिन गुजर गए।

1 जून को टीम जैसे ही कैंप-4 पहुंची, बर्फीला तूफान आ गया। जबरदस्त धुंध छा गई। कुछ भी दिखना बंद हो गया। एक गलत कदम और सीधे 2 हजार फीट नीचे गहरी खाई। सब कुछ ठप पड़ गया।

कुछ घंटे बाद तूफान हल्का पड़ा। टीम आगे बढ़ी। मलबे के बीच ढहा हुआ तंबू मिला। पास में ही गैस स्टोव, कुछ बर्तन और सूखा राशन बिखरा पड़ा था। एक अफसर मुड़ा और उस चट्टान की तरफ देखा, जहां उन्होंने जासूसी उपकरण छुपाया था।

अफसर की सांसें गले में ही अटक गईं, वह उपकरण गायब था। ऐसा लग रहा था जैसे, किसी ने बर्फ की चट्टान को कुल्हाड़ी से काटकर उपकरण को निकाल लिया हो।

तभी दूसरा अफसर वहां पहुंच गया। उसे रिसीवर वाला गत्ते का एक टूटा-फूटा डिब्बा मिला। बाकी बक्से और जनरेटर गायब थे। अफसरों ने किनारे से नीचे झांका। सौ फीट नीचे, मुड़े हुए तारों का एक गुच्छा दिखा।

एक अफसर बोला- ‘लगता है परमाणु उपकरण नीचे चट्टान की तरफ फिसल गया है, चलो चलकर देखते हैं।’

नंदा देवी पर्वत पर जासूसी उपकरण की तलाश करते अफसर। AI इमेज

नंदा देवी पर्वत पर जासूसी उपकरण की तलाश करते अफसर। AI इमेज

अफसर ने एक चोटी से रस्सी बांधी और ढलान के किनारे से नीचे उतरने लगा। आधे रास्ते पहुंचते ही वह ठिठक गया। उसका पैर अंदर धंसने लगा।

साथी अफसर चिल्लाया- ‘जल्दी निकलो वहां से, वर्ना हिमस्खलन शुरू हो जाएगा। हम सब बह जाएंगे।’

अफसर ने तेजी से अपना पैर खींचा। फिर रास्ता बदलकर नीचे पहुंचा। मलबे पर धीरे से कुल्हाड़ी मारी। परत के बीच से प्लास्टिक और धातु के टुकड़े बाहर निकले।

‘लगता है इसी में उपकरण दबा है…’ अफसर ने बड़ी उम्मीद से केबल पकड़ा और उसे झटका दिया। वह तुरंत अलग खींच आया। उसका सिरा कट चुका था। तार के तीन टुकड़े और मिले, लेकिन कोई भी 4 फीट से लंबा नहीं था।

हताश अफसर फिर से ऊपर चढ़कर कैंप-4 तक पहुंचा। उसने दोबारा मलबे को कुल्हाड़ी से कुरेदा। उसे एक रेडियो सेट मिला। उस पर एक भी खरोंच नहीं थी।

अफसरों के माथे की नसें तन गईं। सिर पर हाथ रखकर बैठ गए।

‘आखिर उपकरण गायब कहां हुआ… कहीं वह नीचे बहकर ग्लेशियर की तरफ तो नहीं चला गया…बेस कैंप में मौजूद अफसरों को इसकी जानकारी कैसे दें, अमेरिका वाले क्या सोचेंगे…’ ये सारी बातें उनके दिमाग में घूम रही थीं।

भारी मन से उन्होंने बेस कैंप तक यह खबर पहुंचाई। वहां से यह खबर दिल्ली पहुंची। खुफिया अफसर आरएन काव और आईबी चीफ बीएन मलिक का चेहरा उतर गया। फौरन इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई।

अमेरिकी दूतावास में दोनों देशों के खुफिया अफसर जुटे। तमाम सवालों, जवाबों और अटकलों के बीच तय हुआ कि एक बार फिर से टीम कैंप-4 की तरफ जाएगी।

अमेरिकी दूतावास में मीटिंग के दौरान दोनों देशों के खुफिया अफसर। AI इमेज

अमेरिकी दूतावास में मीटिंग के दौरान दोनों देशों के खुफिया अफसर। AI इमेज

3 जून को टीम फिर से उपकरण की खोज में ऊपर चढ़ने लगी। आखिरकार तीन पर्वतारोही कैंप-4 तक पहुंचे। फिर से खोजबीन शुरू हुई। हर दर्रे और मलबे को छान मारा, लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा।

उन्होंने कैमरे निकाले और दर्जनों तस्वीरें खींच लीं। नीचे लौटकर सारा हाल बेस कैंप में मौजूद अफसरों से बयां कर दिया।

तब तक अमेरिका से दो खास वैज्ञानिक आ चुके थे। शक की सुइयां भारत की तरफ भी घूम रही थीं। वे एक बार ऊपर जाकर अपनी आंखों से देखना चाहते थे। कुछ दिन बाद दोनों अफसर बड़ी मुश्किल से ऊपर पहुंच ही गए। हर जगह छान मारा, लेकिन हताशा के सिवा हाथ कुछ नहीं लगा।

तभी अमेरिकी अफसरों को पांच हजार फीट नीचे बर्फीला और समतल मैदान दिखा। उन्होंने कहा- ‘उपकरण उसी तरफ गया होगा। चलो चलकर देखते हैं।’

भारतीय अफसर मुस्कुराया- ‘चलो तुम्हारा दिल रखने के लिए ये भी कर ही लेते हैं।’

अमेरिकी वैज्ञानिक नीचे पहुंचकर एक खास डिवाइस से चट्टान के टुकड़ों की जांच करने लगा।

यह देखकर भारतीय अफसर बोल पड़ा- ‘ये क्या कर रहे हो?’

उसने जवाब दिया- ‘रेडियोएक्टिविटी जांच रहा हूं।’

‘अगर रीडिंग नॉर्मल नहीं आई तो?’ भारतीय अफसर ने पूछा।

अमेरिकी अफसर ने झुंझलाकर कहा- ‘कलकत्ता तक का पानी जहरीला हो चुका होगा। तुम्हारी पवित्र गंगा में डुबकी लगाने वाले बीमार पड़ जाएंगे।’

भारतीय अफसरों की सांसें अटक गईं… ‘जासूसी के चक्कर में हमने ये कौन सी मुसीबत ले ली। मिशन अमेरिका का और तबाही हमारी…’

लेकिन रीडिंग नॉर्मल आई… तब जाकर भारतीय अफसरों ने गहरी सांस ली।

खोए हुए जासूसी उपकरण की तलाश के लिए रेडियोएक्टिविटी की जांच करते अमेरिकी वैज्ञानिक। AI इमेज

खोए हुए जासूसी उपकरण की तलाश के लिए रेडियोएक्टिविटी की जांच करते अमेरिकी वैज्ञानिक। AI इमेज

तब तक 11 जून आ चुका था। तय हुआ- अगले साल फिर से गर्मियों में आकर उपकरण की तलाश करेंगे। टीम नीचे तो लौट आई, लेकिन नया बखेड़ा खड़ा हो गया। चीन की जासूसी करने चले अमेरिका-भारत के अफसर अब एक दूसरे पर ही शक करने लगे।

CIA के कुछ अफसर कहने लगे कि भारतीय टीम ने उपकरण गायब कर दिया है। वह जून में इसीलिए अकेले ऊपर गए थे। भारत अपने परमाणु कार्यक्रम में इसका इस्तेमाल करना चाहता है।

ये बात भारत के प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दफ्तर से लेकर अमेरिकी हुकूमत तक पहुंची, पर राज की बात थी तो इसे राज ही रखने का फैसला लिया गया। आरोप-प्रत्यारोप लगते तो मिशन का भेद खुल जाता।

भारत और अमेरिका के खुफिया अफसर फिर से मिले। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से बात हुई। तय हुआ कि फिर से एक नया जासूसी उपकरण लगाया जाएगा। इस बार नंदा देवी की टॉप चोटी के बजाय अब नंदा देवी कोट पर। यह करीब 22 हजार 510 फीट ऊंचा था।

15 मार्च 1967 को इस मिशन की मंजूरी मिल गई। एक बार फिर, कोहली को टीम लीडर चुना गया। सारी तैयारियों के साथ चुपचाप 24 अप्रैल को टीम नंदा देवी कोट के लिए निकल पड़ी। तमाम मुश्किलों के बाद मई अंत तक जासूसी उपकरण को नंदा देवी कोट पर इंस्टॉल कर दिया गया।

दोनों देशों के लिए यह बहुत बड़ी कामयाबी थी। कैप्टन कोहली को बधाइयां मिलने लगीं। जल्द ही उपकरण अपने मिशन को अंजाम भी देने लगा।

नंदा देवी कोट पर दूसरी बार उपकरण सेट करते हुए पर्वतारोही।

नंदा देवी कोट पर दूसरी बार उपकरण सेट करते हुए पर्वतारोही।

भारत और अमेरिका के खुफिया विंग को चीन की हरकतों का पता चलने लगा। मालूम पड़ा कि वह बैलिस्टिक मिसाइलें लॉन्च करने की योजना बना रहा था। चीन की उस हरकत से भी पर्दा उठा कि वह तिब्बत के पहाड़ों पर बड़ी संख्या में अपने सैनिकों को तैनात कर रहा था।

लेकिन 1968 की सर्दियों में उपकरण ने काम करना बंद कर दिया। एक बार फिर से CIA और IB टीम को धक्का लगा। फौरन अमेरिकी अफसरों ने भारत फोन घुमाया। गुहार लगाई कि नंदा देवी कोट पर एक टीम भेजी जाए। इंदिरा गांधी की सहमति मिल गई।

1968 की गर्मियों में एक छोटी टीम नंदा कोट भेजी गई। जब टीम चोटी पर पहुंची, तो पहले की तरह, उपकरण का कोई निशान नहीं था। उन्होंने कुछ फीट खुदाई की। फिर जो उन्होंने देखा वह हैरान करने वाला था- एक अर्ध-गोलाकार गुफा के बीच जनरेटर फंसा हुआ था।

अब यह ठीक होने या दोबारा काम करने की हालत में नहीं था। बड़ी मुश्किल से नीचे उतारा गया और एक खास विमान से ओडिशा के चारबतिया एयरपोर्ट पर ले जाया गया। वहां उसे एक खास विमान में छुपा दिया गया।

चारबतिया वहीं एयरबेस था, जिसे अमेरिका ने 1964 में चीन की जासूसी के लिए तैयार किया था, लेकिन 4 दिन बाद ही प्रधानमंत्री नेहरू का निधन हो गया और आगे चलकर अभियान ठंडा पड़ गया।

साल बीते, दिन बीते। अमेरिका और भारत की सरकारें इस पर पर्दा डाले रखीं। फिर आई 12 अप्रैल 1978 की तारीख। अमेरिकी मैगजीन ‘आउटसाइड’ ने इसकी रिपोर्ट छाप दी। हंगामा होना ही था। अमेरिका से ज्यादा हंगामा भारत में हुआ।

हंगामा इसलिए भी ज्यादा हुआ, क्योंकि तब देश में पहली बार गैर-कांग्रसी सरकार बनी थी। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे।

सवाल उठने लगे कि नंदा देवी टॉप पर लगाने वाला उपकरण गायब कहां हुआ? सवाल के साथ चिंता भी थी। ऐसे समझिए कि नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम में जितना प्लूटोनियम इस्तेमाल हुआ था, उसका लगभग एक तिहाई हिस्सा उपकरण में मौजूद था।

अमेरिकी मैगजीन आउटसाइड, जिसने सबसे पहले इस मिशन की रिपोर्ट छापी।

अमेरिकी मैगजीन आउटसाइड, जिसने सबसे पहले इस मिशन की रिपोर्ट छापी।

मोरारजी ने संसद में ना तो CIA का जिक्र किया ना ही अमेरिका का, लेकिन सारा दोष पिछली सरकार यानी कांग्रेस पर मढ़ दिया।

8 मई 1978 को अमेरिकी राष्ट्रपति कार्टर ने एक सीक्रेट लेटर भारत भेजा। उसमें पीएम मोरारजी देसाई के लिए लिखा था- ‘इस मुद्दे को आपने जिस तरह संभाला, उसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करना चाहता हूं।

कुछ दिनों बाद मोरारजी देसाई वाइट हाउस अमेरिका पहुंचे। नीले रंग की शेरवानी जैकेट और सफेद टोपी पहने। ओवल ऑफिस में मुस्कुराते हुए राष्ट्रपति कार्टर के सामने बैठे हुए थे। उनकी ये तस्वीर काफी चर्चा में रही।

आज उस घटना को दशकों बीत गए। नेता, पर्यावरण कार्यकर्ता और नंदा देवी के आसपास रहने वाले आज भी मांग कर रहे हैं कि उस डिवाइस को ढूंढकर बाहर निकाला जाए। क्योंकि, नंदा देवी की चोटी पर मौजूद ग्लेशियर से ऋषि गंगा और धौलीगंगा नदी तक पानी पहुंचता है।

यह नदी आगे चलकर अलकनंदा और भागीरथी से मिलती है और फिर गंगा नदी बनती है, जो करोड़ों लोगों की लाइफ लाइन है। उत्तराखंड में जब भी कोई बड़ी बाढ़, एवलॉन्च या पहाड़ खिसकने जैसी घटना होती है, तो यह उपकरण खतरनाक साबित हो सकता है।

साल 1978, अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के साथ भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई।

साल 1978, अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के साथ भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई।

ऑपरेशन हैट का पार्ट-1 भी पढ़िए :

परमाणु उपकरण लगाकर चीन की जासूसी कर रहे थे भारत-अमेरिका:बर्फीले तूफान में दिखा हिम मानव, खतरनाक डिवाइस पहाड़ पर छोड़कर भाग आए; पार्ट-1

रफेरेंस :

1. Nanda Devi: A Journey to the Last Sanctuary : By Hugh Thomson.

2. Spies in the Himalayas: By M.S. Kohli and Kenneth J. Conboy.

3. Nuclear Bomb in Ganga : By RK Yadav



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *