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- Palki Sharma’s Column – Will The ‘Muslim NATO’—strong On Paper—prove Effective In Reality Too?
5 घंटे पहले
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पलकी शर्मा इंडिया ग्लोबल रिव्यू की संस्थापक
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने सोमवार (5 अक्टूबर) को अपने “मक्का गठजोड़’ (या कथित “मुस्लिम-नाटो’) को एक्टिवेट करने की दिशा में कदम उठाए। जब पहली बार हूती मिसाइलें सऊदी अरब पर गिरी थीं, तभी सवाल उठा था कि क्या पाकिस्तान सऊदी अरब की रक्षा के लिए आगे आएगा? लेकिन एक महीने तक पाकिस्तान ने कोई कार्रवाई नहीं की थी। उसकी ऊहापोह की पुख्ता वजहें भी मौजूद थीं।
कम से कम सैन्य क्षमता की कमी तो इसकी वजह नहीं हो सकती। ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स में पाकिस्तान 14वें स्थान पर है। उसके पास 6.60 लाख सक्रिय और 5.50 लाख रिजर्व सैनिक हैं। उसकी वायुसेना में करीब 1400 विमान हैं, जिनमें चीन के जेएफ-17 और अमेरिका के एफ-16 समेत 300 से ज्यादा फाइटर जेट हैं। फिर उसके पास परमाणु हथियारों का तुरुप का पत्ता भी है।
लेकिन जिस चीज की कमी रही है, वह है इन्हें इस्तेमाल करने की रणनीतिक गुंजाइश। इसके तीन कारण रहे हैं- राजनीति, प्राथमिकताएं और पैसा।पाकिस्तान ने खुद को ईरान युद्ध में मध्यस्थ के तौर पर पेश किया था। उसने यूएस-ईरान के बीच बातचीत की मेजबानी की और युद्धविराम में मदद की। इस भूमिका को पाकिस्तान आगे भी बनाए रखना चाहता है, क्योंकि इससे उसे प्रभाव और रणनीतिक फायदा मिलता है।
इसके लिए ईरान से अच्छे संबंध बनाए रखना जरूरी है। पाकिस्तान और ईरान के बीच 900 किलोमीटर लंबी सीमा है। अतीत में दोनों देश एक-दूसरे पर हवाई हमले कर चुके हैं। ईरान पाकिस्तान की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित कर सकता है, सीमा पर परेशानी या सैन्य तनाव बढ़ा सकता है। ऐसे कई कारण हैं, जिनके चलते पाकिस्तान ऐसी स्थिति को एक महीने से टालना चाह रहा था।
दूसरा कारण है रणनीतिक प्राथमिकताएं। पश्चिम एशिया पैसे और तेल के स्रोत के तौर पर पाकिस्तान के लिए अहम है। लेकिन वह उसका पड़ोसी नहीं है। पाकिस्तान के सामने अपने बिल्कुल नजदीकी क्षेत्रों में ज्यादा बड़ी चुनौतियां हैं। अफगानिस्तान को ही लें। पाकिस्तान आरोप लगाता है कि तालिबान से टीटीपी यानी पाकिस्तानी तालिबान को समर्थन मिलता है।
दोनों देशों के बीच यह मसला पहले ही हिंसक रूप ले चुका है और सीमा पार हमले तक हो चुके हैं। फिर पाकिस्तान का ध्यान अपनी पूर्वी सीमा पर भी है, जहां उसकी सेना का बड़ा हिस्सा तैनात है। अपने घर के भीतर भी पाकिस्तान आतंकवाद के बढ़ते खतरे से जूझ रहा है। 2026 के पहले सात महीनों में हुए हमलों में 2700 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। पीओके में अशांति और बलूचिस्तान में उग्रवाद को लेकर भी पाकिस्तान पर दबाव है। ऐसे में सऊदी अरब उसके लिए जरूरी मोर्चा नहीं था।
अब हम तीसरे कारण पर आते हैं- पैसा। किसी दूसरे देश के लिए युद्ध लड़ना बेहद महंगा होता है और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था फिलहाल ऐसा खर्च नहीं झेल सकती। उसकी आर्थिक वृद्धि दर महज 3.5% रहने का अनुमान है, महंगाई दर 10.2% है, जबकि विदेशी मुद्रा भंडार बेहद जोखिमपूर्ण स्थिति में बना हुआ है। उसके विदेशी मुद्रा भंडार का 91% पैसा अन्य देशों से उधार ली गई रकम से बना है। उसकी अर्थव्यवस्था आईएमएफ, चीन, सऊदी अरब और अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड से मिले विदेशी कर्ज के सहारे है।
ऐसे में वह किसी दूसरे के लिए युद्ध लड़ने का खर्च नहीं उठा सकेगा। पाकिस्तान के करीब 8 हजार सैनिक पहले ही सऊदी अरब में तैनात हैं। उनके साथ वहां 16 जेएफ-17 फाइटर जेट और चीन का एचक्यू-9 एयर-डिफेंस सिस्टम भी है। इस तैनाती का खर्च सऊदी अरब उठा रहा है, जबकि पाकिस्तान इन्हें ऑपरेट कर रहा है।
लेकिन इस सबके बावजूद पाकिस्तान टकराव नहीं चाहता और हूतियों से राजनीतिक रूप से चर्चा करने का पक्षधर है। ऐसे में सऊदी अरब को दूसरे विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए। क्योंकि इन तमाम सैन्य संसाधनों के बाद भी पाकिस्तान की सेना अपने इतिहास में कोई युद्ध नहीं जीत पाई है। और जब वह अपनी ही जमीन पर युद्ध नहीं जीत सकती, तो विदेश में कैसे लड़ सकती है?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

