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- Rajkumar Jain Column: AI Threat To Human Critical Thinking & Originality
5 घंटे पहले
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राजकुमार जैन एआई विशेषज्ञ एवं स्वतंत्र लेखक
हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारी सोच की विविधता रही है। इतिहास गवाह है कि हर बड़ी खोज के पीछे किसी न किसी ऐसे व्यक्ति की आवाज रही है, जिसने अपने समय की स्वीकृत मान्यताओं पर प्रश्न उठाने का साहस किया। लेकिन एआई के युग में यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा हो रहा है कि कहीं यह तकनीक हमारे ज्ञान की विविधता को समाप्त तो नहीं कर रही?
आज हम क्या पढ़ते हैं, क्या खोजते हैं, किन विचारों तक पहुंचते हैं और किस प्रकार के उत्तरों को स्वीकार करते हैं, इन सब पर एल्गोरिदम का प्रभाव है। विडम्बना यह है कि जिस डिजिटल संसार को कभी मानव-अनुभवों, भाषाओं, संस्कृतियों और विचारों का विशाल महासागर माना गया था, वही अब धीरे-धीरे मशीनों द्वारा निर्मित सामग्री से भरता जा रहा है। डिजिटल संसार अब मौलिक चेतना नहीं, एल्गोरिदमिक प्रणालियों द्वारा संचालित हो रहा है। हम ऐसी ज्ञान-प्रणाली रच रहे हैं, जो अपनी ही नींव को खोखला कर रही है।
लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स जिस डेटा पर विशाल मात्रा में प्रशिक्षित होते हैं, वह डिजिटल परिवेश भी अब उन्हीं के द्वारा पूर्व में उत्पन्न की गई कृत्रिम सामग्री से भरता जा रहा है। शोधकर्ता इस आत्मघाती चक्र को “मॉडल ऑटोफैगी’ की संज्ञा देते हैं। इस अवस्था में कोई प्रणाली अपने ही डेटा का उपभोग करने लगती है। इससे ज्ञान की विविधता और मौलिकता धीरे-धीरे कम हो जाती है।
यह स्थिति कुछ वैसी ही है, जैसे प्रकृति में जैव-विविधता समाप्त होने पर पारिस्थितिकी-तंत्र कमजोर हो जाता है। एक जंगल इसलिए मजबूत होता है, क्योंकि उसमें अनेक प्रकार के पेड़-पौधे, जीव-जंतु और जैविक प्रक्रियाएं मौजूद होती हैं। लेकिन यदि वह एक ही प्रकार के पेड़ों पर निर्भर हो जाए, तो एक बीमारी पूरे तंत्र को नष्ट कर सकती है। ज्ञान की दुनिया भी ऐसी ही है।
जब भावी पीढ़ियों के मॉडल मशीन-जनित डेटा पर बारम्बार पुनरावृत्त होते हैं, तो ज्ञान की मूल जीवंतता, भाषाई नमी और सूक्ष्मता समाप्त होने लगती है। दीर्घकालिक रूप में यह “मॉडल कोलैप्स’ अर्थात बौद्धिक पतन का कारण बनता है, जहां मशीन की प्रतिक्रियाएं अत्यधिक रूखी, गैर-रचनात्मक और त्रुटिपूर्ण हो जाती हैं। एआई प्रणाली अपने ही गढ़े प्रतिमानों से सीखते हुए वास्तविक दुनिया की जटिलताओं को खोने लगती है।
इतिहास में कई बार ऐसे विचारों को प्रारम्भ में अस्वीकार किया गया था, जिन्होंने बाद में दुनिया बदल दी। पेट के अल्सर के बारे में लंबे समय तक माना जाता रहा कि इसका कारण केवल जीवनशैली और तनाव है। बाद में वैज्ञानिकों ने दिखाया कि हेलिकोबैक्टर पाइलोरी नामक बैक्टीरिया इसकी बड़ी वजह हो सकता है। शुरुआत में इस विचार को संदेह की दृष्टि से देखा गया, लेकिन अंततः इसी खोज को 2005 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यही विज्ञान की सुंदरता है, वह असहमति और नए विचारों से आगे बढ़ता है।
1840 के दशक में आयरलैंड का अकाल केवल प्राकृतिक आपदा नहीं था। सम्पूर्ण कृषि व्यवस्था एक ही आनुवंशिक प्रजाति पर निर्भर हो गई थी, जिसके कारण एक फफूंद-संक्रमण ने लाखों लोगों को भुखमरी और विस्थापन की त्रासदी में धकेल दिया। एआई की दुनिया भी ऐसे ही डिजिटल मोनोकल्चर की ओर बढ़ रही है।
यदि भविष्य की सूचना-व्यवस्था केवल उन्हीं विचारों को बढ़ावा देने लगे जो पहले से लोकप्रिय हैं, तो नए और असुविधाजनक प्रश्न धीरे-धीरे गायब हो सकते हैं। सबसे बड़ा खतरा गलत जानकारी का नहीं, विचारों की एकरूपता का है। हमारी असली ताकत अलग सोचने की क्षमता में है और इसे ही हमें एआई के युग में सहेजकर रखना होगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

