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- Rita Kothari Column | Love, Reconciliation & Hidden Truths In Stories
2 घंटे पहले
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रीटा कोठारी अशोका यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की प्रोफेसर और भाषाविद्
मेरी मातृभाषा सिंधी में एक मुहावरा है- ‘भूंड जी खबर भाये खे, भाये जी खबर भूंड खे।’ इसका मतलब है- चूल्हा जाने आग को और आग जाने चूल्हे को। मेरी मां अकसर तब यह मुहावरा कहती है, जब उसे यह कहना होता है कि किसी के साथ रहो, तब ही एक-दूसरे की फितरत का पता लगता है।
गौर कीजिये कि मुहावरे के रूपक रसोईघर से हैं, क्योंकि वह घर का सबसे अहम हिस्सा है। सिर्फ इसलिए नहीं कि घर का खाना वहां बनता है पर इसलिए भी कि जिसे हम इंटिमेसी कहते हैं, गुजर-बसर समझते हैं, उसकी सबसे बड़ी चुनौती रसोईघर में होती है।
हमारे आसपास कितनी कहानियां हैं, जिनकी बात की जा सकती है, परंतु मैं थोड़ा मुश्किल रास्ता चुनकर इंटिमेसी पर बात करना चाहती हूं और आपसे मेरी एक विडम्बना शेयर करना चाहती हूं। यहां इंटिमेसी से मेरा मतलब आत्मीयता और घनिष्ठता से तो है ही, किंतु अति-परिचय से भी है।
चूल्हे और आग का रिश्ता घनिष्ठ है, पर एक-दूसरे के साथ रहने की सुलगती आग से भी जुड़ा है। मुझे इन सब पहलुओं को लेकर हिंदी में शब्द नहीं सूझ रहा और फिर अंग्रेजी के ‘इंटिमेसी’ शब्द को भी अधिकांश लोग प्रेम-सम्बन्ध के तौर पर ही देखते हैं।
अगर हम घर की ही कल्पना को लेकर आगे बात करें तो एक है बेडरूम की इंटिमेसी और एक है रसोईघर की- अलग फितरत और संस्कृतियों का बोझ कहां पर ज्यादा पड़ता है? और जब पड़ता है तो कैसे उसे शरीफ घरों में समा दिया जाता है?
मैं समझती हूं कि यह मुहावरा उसकी बात करता है- एक ऐसी आत्मीयता जिसके कुछ पहलुओं को जबान नहीं दी जाती। जिसका ज्ञान साथ रहने पर ही उत्पन्न होता है। रिश्तों को जब रोजमर्रा की जिंदगी की भाप लगती है, तब वे जिंदगी की कई नई परतें खोलते हैं।
एक-दूसरे से प्यार या नफरत करना तो आत्मीयता का बहुत सरल रूप है, पर एक-दूसरे से कोहनियां टकराते हुए जीना; ईर्ष्या करना, प्यार भी; चिढ़ना, कड़वाहट महसूस करना और फिर भी साथ देना- एक साथ इतने विरोधाभासी जज्बातों के साथ रहना पारिवारिक जिंदगी में ही समझा जा सकता है।
यह हमें फिल्मों में अमूमन देखने को नहीं मिलता। इस पर साहित्य जरूर है, परंतु उसे महिलाओं का साहित्य समझकर उस पर व्यापक चर्चा नहीं होती। यह सवाल नहीं पूछा जाता कि इसमें इंटिमेसी को कैसे सूक्ष्म बनाया गया है।
मेरे जेहन में दो उदाहरण आ रहे हैं। एक है सरोज पाठक की जानी-मानी गुजराती कहानी- ‘न काउन्स मां न काउन्स नी बाहर।’
इसमें नायिका को बताया जाता है कि उसका पुराना दोस्त दावत पर आ रहा है। श्रुति नामक इस नायिका को झुंझलाहट होती है, क्योंकि वह आने वाला मेहमान कोई साधारण व्यक्ति नहीं, उसी के अतीत से आ रहा है। वह उसका प्रेमी रह चुका है। उसके आने की तैयारी में न वह अपनी खुशी दर्शा सकती है, न ही नाराजगी।
अपने अंदर घुमड़ रहे तूफान को वह बड़बड़ाते हुए छिपाती है और घर की चीजों से टकराती रहती है। उसके जज्बात न ब्रैकेट के अंदर हैं न बाहर- वे वो जटिल-सी तरंगें हैं, जिन्हें अंत तक घर का कोई सदस्य नहीं समझता। अंत में जब वह आगंतुक नहीं आता है तो उसका विषाद और उसकी राहत, दोनों को सिर्फ एक पाठिका समझ सकती है।
इस कहानी का अनुवाद करते वक्त मुझे उसकी सूक्ष्म इंटिमेसी से पैदा हुई झुंझलाहट वैसी ही बरकरार रखने की चिंता थी, ताकि वह घोषित न हो जाए। दूसरा उदहारण है विवेक शानभाग का जाना-माना उपन्यास ‘घाचर गोचर’।
इस किताब में नायिका अनीता की बनाई गई चीजों को उसकी सास फिर से बनाती है और रसोईघर तथा घर के मर्दों पर अपना वर्चस्व कायम रखती है। इस पर अनीता का क्रोध, उसकी बेरुखी, सास का रसोईघर में मोह और शासन एक अजीब-सी पोलिटिक्स बनाते हैं, जिसे बारीकी से समझने की जरूरत है।
इन सबमें यह तो पता लगता है कि एक-दूसरे को जानना साथ में रहने की क्रिया है और वह रोजमर्रा का चित्र बहुत कम लोग दर्शा पाते हैं। शायद इसीलिए हमारी बहुतेरी फिल्में दो प्रेमियों के मिलने या उनके परिवार वालों की सुलह पर आकर पूरी हो जाती हैं।
लेकिन मुझे उसके बाद की कहानी में दिलचस्पी है, जब आग और चूल्हा एक-दूसरे को गर्म रखते हैं!
रिश्तों को जब रोजमर्रा की जिंदगी की भाप लगती है, तब वे जिंदगी की कई नई परतें खोलते हैं। एक-दूसरे से कोहनियां टकराते हुए जीना; ईर्ष्या करना, चिढ़ना, और फिर भी साथ देना- इसे पारिवारिक जिंदगी में ही समझा जा सकता है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

