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- Rita Kothari Column | Small Town Voices In Indian Literature & Cinema
4 घंटे पहले
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रीटा कोठारी अशोका यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की प्रोफेसर और भाषाविद्
‘शहर से दस किलोमीटर’ नाम के अपने उपन्यास में नीलेश रघुवंशी ने भोपाल से कुछ दूर एक ऐसी जिंदगी का जिक्र किया है, जो फल-फूल रही है, मुश्किलों और चुनौतियों से भरी है, लेकिन साथ ही बहुत गहरी और दार्शनिक भी है।
इस कस्बे और उस शहर के बीच- जो अपनी सीमाओं के बाहर किसी और जिंदगी से बेखबर है- आने-जाने का सफर कहानी कहने वाली नैरेटर की साइकिल तय करती है। एक सूत्रधार और एक रिकॉर्ड की तरह, यह साइकिल उस जगह की आखिरी निशानियों में से एक है, जो अब शहर के एक ऐसे बे-पहचान, नव-उदारवादी और साधारण से विस्तार में बदल चुकी है, जिसे पहचानना मुश्किल है।
उपन्यास में साइकिल से जुड़ी बचपन की यादें खूब उभरने लगती हैं, क्योंकि ‘बचपन में छोटे-छोटे पांव बड़े-बड़े पंख होते हैं।’ एक स्त्री नैरेटर हमें उन दिनों की याद दिलाती है, जब काले डंडे वाली साइकिलें थीं, न कि गुलाबी खूबसूरत दिखती लेडीज साइकिलें जो अब मिलती हैं।
ऐसी कल्पना ही कहां थीं कि लड़कियां साइकिल चलाएंगी। परंतु हमारी नैरेटर तो इस तरह की जेंट्स साइकिल भी ऐसे चलाती- ‘मैं धड़ल्ले से तो साइकिल चलाने लगी। कभी झुककर तो कभी तनकर, कभी सीटी बजाते हुए तो कभी लहराते हुए, कभी हैंडिल और खुद को तिरछा करते हुए, कभी एक हाथ छोड़कर, तो कभी सीट से ऊपर उठकर दोनों हाथ छोड़ते हुए। मैं साइकिल के साथ लहराने लगी।’
साइकिल सिर्फ एक रोमांच नहीं, एक पोलिटिक्स भी है- एक समय और जीवन-शैली का निशान भी है, जब वह सिर्फ गरीबी या मजबूरी की प्रतीक नहीं थी। यह उपन्यास पढ़ते हुए, मैं चली गई बीते हुए दिनों में- भूतकाल जो एक टाइम भी है और स्पेस भी।
मुझे पुरानी बातें याद आ गईं- अजमेर में बिताई गर्मियों की लंबी और धीमी छुट्टियां, जहां मेरी मां का मायका है। मैं हर गर्मी में वहां जाती थी और घंटों कर्नल रंजीत और राजहंस के उपन्यास पढ़ती थी, जिन्हें मैं प्रभात टॉकीज के पास एक छोटी-सी दुकान से किराए पर लेती थी।
सिंधी मोहल्ले से प्रभात टॉकीज तक का रास्ता चढ़ाई वाला था और खुले नालों की बदबू से भरा होता था। लेकिन मैं खुश रहती थी, क्योंकि उसी दुकान से मुझे साइकिल भी मिल जाती थी, जहां से मैं किताबें लेती थी। पूरे दिन के लिए साइकिल का किराया एक रुपये से भी कम होता था। साइकिल चलाने और उपन्यास पढ़ने के मजे ने उन गर्मियों को खास बना दिया था।
अलग-अलग जगहों पर समय का एहसास अलग- अलग होता है। यह वह समय नहीं है, जो हमारी घड़ियों में टिक-टिक करता है, बल्कि वह है, जो बैकग्राउंड में शांत और स्थिर रहता है- जैसे कोई खिड़की हो, जिससे अंदर और बाहर दोनों तरफ देखा जा सके। बड़े शहरों में समय का यह रूप देखने को नहीं मिलता।
इस समय की शांति को बहुत कम लेखक पकड़ पाते हैं, लेकिन जब वे ऐसा करते हैं, तो हमें विनोद कुमार शुक्ल, सारा राय या नीलेश रघुवंशी जैसे लेखक मिलते हैं। लेकिन क्या ‘बरेली की बर्फी’ या ‘तनु वेड्स मनु’ जैसी फिल्में- जिन्हें अब छोटे शहर की फिल्में कहा जाता है- उनमें यह शांति सिनेमाई रूप से दिखाई देती है? इस सवाल का जवाब देने से पहले, कोई यह पूछ सकता है कि आखिर ‘छोटा शहर’ क्या है?
अजमेर के साथ मेरा अनुभव शायद एक छोटे शहर जैसा ही था, और मुझे पूरा यकीन है कि आज का अजमेर मेरी इस परिभाषा को चुनौती देगा। असल में, जो न तो गांव है और न ही शहर, उसे अकसर छोटा शहर कहा जाता है- एक ऐसी श्रेणी जिसे ‘नहीं’ (यानी जो नहीं है) के आधार पर परिभाषित किया जाता है।
पिछले एक-दो दशकों में हमने छोटे शहर पर आधारित फिल्मों और सीरियलों की बाढ़ देखी है। इनकी शुरुआत शायद ‘बंटी और बबली’ से हुई थी। आप देखिए कि बंटी न सिर्फ जगह छोड़ना चाहता है, पर वक्त की धीमी रफ्तार से भागना भी चाहता है।
फुरसतगंज इस टाइम और स्पेस को साथ में किस खूबसूरती से मिलाता है, जहां से नए इंडिया के बेचैन नौजवान दूर भागना चाहते हैं। बबली पंकिनगर की हैं। जब हम बरेली या धनबाद या मिर्जापुर आते हैं, तो इनमें अपने अस्तित्व को बनाये रखने की बात है। छोटा शहर एक स्टेशन नहीं और न ही ‘मदर इंडिया’ वाला गांव है।
छोटा शहर वो जगह है, जिसमें मध्यम वर्ग की नई आकांक्षाएं और ख्वाहिशें उपज रही हैं और उनसे वह जूझता है। इस जद्दोजहद को फिल्मों ने कॉमेडी के रूप में दर्शाया है, तनाव के तौर पर नहीं। हम गोरियों के गांव और बम्बई-कलकत्ते के कालाबाजार को पीछे छोड़ आए हैं। जिन्हें गहराई चाहिए, उन्हें शहर से कुछ मील दूर जाना होगा, और वह भी साइकिल पर!
छोटा शहर वो जगह है, जिसमें मध्यम वर्ग की नई आकांक्षाएं और ख्वाहिशें उपज रही हैं और उनसे वह जूझता है। इस जद्दोजहद को फिल्मों ने कॉमेडी के रूप में दर्शाया है, तनाव के तौर पर नहीं। हम गोरियों के गांव और बम्बई-कलकत्ते के कालाबाजार को पीछे छोड़ आए हैं। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

