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7 घंटे पहले
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क्रोध इंसान का ऐसा शत्रु है, जो पलभर में करीबी रिश्तों को भी तोड़ सकता है। गुस्से में कहे गए शब्द अक्सर मन पर ऐसे घाव दे जाते हैं, जो समय बीतने पर भी नहीं भरते। इसलिए कहा गया है कि अगर कोई हमारी आलोचना करे या अपमानित करने का प्रयास करे, तब भी धैर्य और मौन सबसे बड़ा उत्तर होते हैं। यह बात एक लोक कथा से समझ सकते हैं…
बहुत समय पहले एक संत थे, जो अपने शांत और सरल स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने जीवन में कभी किसी पर क्रोध नहीं किया था। उनके आश्रम में प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग प्रवचन सुनने आते थे। संत सभी को यही शिक्षा देते थे कि क्रोध से कभी किसी समस्या का समाधान नहीं होता। यदि कोई आपका अपमान भी करे, तब भी संयम बनाए रखना चाहिए।
संत की बढ़ती प्रसिद्धि से कुछ लोग ईर्ष्या करने लगे। उनमें से एक व्यक्ति ने घोषणा कर दी कि वह संत का असली चेहरा सबके सामने लाकर रहेगा और उन्हें क्रोधित करके उनकी सच्चाई साबित करेगा।
अगले दिन वह व्यक्ति आश्रम पहुंचा। वहां मौजूद लोगों के सामने उसने संत को अपशब्द कहना शुरू कर दिया। उसने झूठे आरोप लगाए कि यह संत नहीं, बल्कि चोर है। रात में चोरी करता है और दिन में साधु बनने का ढोंग करता है। इतना ही नहीं, उसने संत के पूरे परिवार पर भी झूठे आरोप लगाने शुरू कर दिए।
आश्रम में मौजूद लोग यह सब सुनकर हैरान थे। सभी को लगा कि अब संत अवश्य क्रोधित होंगे, लेकिन संत शांत भाव से उसकी बातें सुनते रहे। उनके चेहरे पर न गुस्सा था, न ही किसी प्रकार की बेचैनी।
जब वह व्यक्ति लगातार बोलते-बोलते थक गया, तब संत ने उसे एक गिलास पानी दिया और मुस्कुराकर बोले, “तुम काफी देर से बोल रहे हो, निश्चित ही तुम्हें प्यास लगी होगी। पहले पानी पी लो।”
संत का यह व्यवहार देखकर वह व्यक्ति शर्म से झुक गया। उसने तुरंत संत के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। उस व्यक्ति ने कहा, “मैंने आपको इतना कुछ कहा, लेकिन आपको क्रोध नहीं आया।” तब संत ने कहा, “तुम जो शब्द मेरे लिए लाए थे, मैंने उन्हें स्वीकार ही नहीं किया। जिसे हम ग्रहण नहीं करते, वह हमारे पास ठहरता भी नहीं। मान लो अगर को व्यक्ति तुम्हें कोई उपहार दे और तुम उसे लेने से मना कर दो, उसे स्वीकार ही न करो, तो वह उपहार, उसी व्यक्ति के पास ही रहेगा। ठीक इसी तरह मैंने तुम्हारे बुरे शब्दों को स्वीकार ही नहीं किया।”
संत की यह सीख उस व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल गई। उसने समझ लिया कि सच्ची जीत दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि अपने क्रोध पर विजय पाने में है।
संत की सीख
- क्रोध करने से पहले सोचने की आदत डालें
गुस्सा आने पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ क्षण रुकें। यही छोटा-सा विराम बड़े विवाद को टाल सकता है।
- हर बात को व्यक्तिगत न लें
हर आलोचना सच नहीं होती। कई बार लोग अपनी सोच, ईर्ष्या या परिस्थितियों के कारण कठोर बातें कह देते हैं। उन्हें अपने आत्मसम्मान का आधार न बनाएं।
- मौन सबसे प्रभावी उत्तर हो सकता है
हर आरोप का जवाब देना जरूरी नहीं है। कई बार आपकी शांति ही सामने वाले को अपनी गलती का एहसास करा देती है।
- शब्दों की शक्ति समझें
क्रोध में निकले शब्द वापस नहीं आते। इसलिए बोलने से पहले सोचें कि आपकी बात का रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा।
- अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाएं
दूसरों की नकारात्मक बातों पर समय और ऊर्जा खर्च करने के बजाय अपने लक्ष्य और विकास पर ध्यान दें।
- धैर्य को अपनी ताकत बनाएं
धैर्य कमजोर लोगों का नहीं, बल्कि आत्मविश्वासी लोगों का गुण है। जो स्वयं पर नियंत्रण रखता है, वही परिस्थितियों पर भी नियंत्रण पा लेता है।
- क्षमा करना सीखें
क्षमा करना सामने वाले पर उपकार नहीं, बल्कि स्वयं को मानसिक तनाव से मुक्त करना है। इससे मन हल्का रहता है।
- भावनाओं पर नियंत्रण का अभ्यास करें
ध्यान, योग, गहरी सांस लेना या नियमित व्यायाम जैसी आदतें मन को शांत रखने में मदद करती हैं और क्रोध कम करती हैं।
प्रतिक्रिया नहीं, समाधान चुनें
किसी भी विवाद में यह सोचें कि आपका उद्देश्य जीतना है या समस्या का समाधान करना। समाधान पर ध्यान देने से रिश्ते भी सुरक्षित रहते हैं और समस्या का समाधान भी मिल जाता है।
- सच्ची जीत स्वयं पर विजय है
दूसरों को हराना आसान है, लेकिन अपने क्रोध, अहंकार और नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण पाना ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता है।

