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अर्घ्य सेनगुप्ता और स्वप्निल त्रिपाठी का कॉलम:कुल कितने सांसद हमारे लिए अंतत: पर्याप्त साबित होंगे?




हाल ही में तमिलनाडु में दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की 31वीं बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता गृह मंत्री अमित शाह ने की। बैठक के दौरान तमिलनाडु और कर्नाटक ने आग्रह किया कि लोकसभा का आकार न बढ़ाया जाए। इससे पहले तमिलनाडु विधानसभा ने भी इसी आशय का एक प्रस्ताव पारित किया था। लेकिन लोकसभा सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव एक और बुनियादी सवाल खड़ा करता है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है : इतने बड़े विस्तार का संसद पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इसका एक तात्कालिक प्रभाव वित्तीय होगा। अतिरिक्त सांसदों के वेतन-भत्तों, आवास, कर्मचारियों, यात्रा, संसदीय बुनियादी ढांचे पर खर्च होगा। वर्तमान में प्रत्येक सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र में सालाना 5 करोड़ तक के विकास कार्यों की अनुशंसा कर सकता है। सांसदों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने पर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के लिए एमपीलैड्स का आवंटन 2,715 करोड़ से बढ़कर 4,250 करोड़ हो जाएगा- हर वर्ष 1,535 करोड़ का अतिरिक्त बोझ। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सांसदों की संख्या बढ़ाने भर से संसद स्वतः मजबूत नहीं हो जाती। दल-बदल विरोधी कानून और पार्टी व्हिप के व्यापक इस्तेमाल के कारण सांसदों की अपने राजनीतिक दल से अलग होकर स्वतंत्र रूप से मतदान करने की क्षमता काफी सीमित हो जाती है। इसलिए 300 से अधिक सांसद जोड़ने से प्रतिनिधियों की संख्या तो बढ़ सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि संसद में स्वतंत्र विधायी आवाजों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़े। संसदीय समय का सवाल भी महत्वपूर्ण है। अधिक सांसदों का अर्थ होगा कि पहले से ज्यादा सदस्य प्रश्न पूछना, बहस में हिस्सा लेना और समितियों में काम करना चाहेंगे। यदि इसके साथ संसद अपने बैठने के दिनों की संख्या, प्रश्नकाल की अवधि और संसदीय समितियों की क्षमता में बदलाव नहीं करती, तो प्रत्येक सांसद को भागीदारी के कम अवसर मिलेंगे। लोकसभा के बैठने के दिनों की औसत संख्या 1950 के दशक में सालाना 127 दिनों से घटकर 1990 के बाद लगभग 71 दिन हो गई है। इसलिए भागीदारी के अधिक अवसर पैदा किए बिना केवल सांसदों की संख्या बढ़ाने से संसद में विचार-विमर्श की गुणवत्ता बेहतर नहीं होगी। लोकसभा के विस्तार का असर राज्यसभा पर भी पड़ेगा। राज्यसभा राज्यों के हितों को संसद में स्थान देकर एक अलग प्रकार का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है। यदि लोकसभा का आकार बढ़ाया जाता है, तो राज्यसभा का सापेक्ष संख्यात्मक प्रभाव कम होगा, विशेषकर दोनों सदनों की संयुक्त बैठकों के दौरान। इन चिंताओं का अर्थ यह नहीं है कि लोकसभा की संख्या हमेशा के लिए 543 पर ही निश्चित कर दी जाए। इसके विस्तार पर विचार करने के ठोस कारण हैं। लोकसभा का आकार इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे तय होता है कि प्रत्येक सांसद कितने लोगों का प्रतिनिधित्व करेगा। पहले आम चुनाव के समय लोकसभा में 489 सीटें थीं और आबादी लगभग 38 करोड़ थी। यानी प्रत्येक सांसद लगभग 8 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता था। 2024 तक भारत की आबादी लगभग 144 करोड़ हो गई, जबकि सांसदों की संख्या 543 रही। इस तरह अब औसतन एक सांसद लगभग 26.5 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। एक सांसद से संसद में केवल मतदान और विचार-विमर्श करने की अपेक्षा नहीं होती, उसे अपने निर्वाचन क्षेत्र के हितों का प्रतिनिधित्व करना और मतदाताओं की चिंताओं को सरकार के समक्ष उठाना भी होता है। निर्वाचन क्षेत्र जितना बड़ा होगा, इन जिम्मेदारियों को निभाना उतना ही कठिन हो जाएगा। लेकिन पहले यह तय करना होगा कि हम जनसंख्या और सांसदों के किस अनुपात को हासिल करना चाहते हैं। 144 करोड़ की आबादी पर 850 सांसद होने का अर्थ होगा कि प्रत्येक सांसद औसतन करीब 17 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करेगा। 900 सांसद होने पर यह संख्या करीब 16 लाख और 1,000 सांसद होने पर लगभग 14.4 लाख रह जाएगी। फिर 850 ही उचित संतुलन क्यों है? जनसंख्या आगे भी बदलती रहेगी और उसके साथ समय-समय पर सांसदों की संख्या बढ़ाते रहने से अंततः लोकसभा अत्यधिक बड़ी हो सकती है। संसद को पहले यह पूछना होगा कि एक बड़ी लोकसभा पर कितना खर्च आएगा, वह किस तरह काम करेगी, क्या अतिरिक्त सांसद प्रतिनिधित्व और जवाबदेही को मजबूत करेंगे, और इन सभी पहलुओं के बीच कौन-सी संख्या सबसे उचित संतुलन स्थापित करती है।
(ये लेखकों के अपने विचार हैं)



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