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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा है कि सिर्फ आर्य समाज मंदिर का विवाह प्रमाणपत्र पेश करने से यह नहीं माना जा सकता कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शादी हो गई है। कोर्ट ने कहा कि वैध हिंदू विवाह के लिए हिंदू रीति-रिवाजों और संस्कारों का होना जरूरी है। यह आदेश जस्टिस राजीव सिंह ने एसएसबी के डिप्टी कमांडेंट रोहित पांडेय की याचिका स्वीकार करते हुए दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सेवा से हटाने का 28 अप्रैल 2022 का आदेश रद्द कर दिया और उसे तुरंत ड्यूटी पर वापस लेने का निर्देश दिया। हालांकि, सेवा से हटाए जाने की तारीख से फैसले की तारीख तक की अवधि को ‘नो वर्क, नो पे’ माना जाएगा, लेकिन इसे सेवा में कोई रुकावट नहीं माना जाएगा। पत्नी की शिकायत पर जांच शुरू हुई थी मामले के मुताबिक, रोहित पांडेय का चयन 5 दिसंबर 2009 को सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) में असिस्टेंट कमांडेंट (जनरल ड्यूटी) के पद पर हुआ था। बाद में 22 मार्च 2016 को उन्हें डिप्टी कमांडेंट पद पर प्रमोशन दिया गया। सुचेता तिवारी की शिकायत के आधार पर उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई थी। आरोप लगाया गया था कि दोनों की शादी 16 अगस्त 2007 को आर्य समाज मंदिर में हुई थी, लेकिन नौकरी में आने के समय याचिकाकर्ता ने खुद को अविवाहित बताया था। विभागीय जांच में शिकायतकर्ता ने बताया था कि शादी आर्य समाज मंदिर में हुई थी और मंदिर के पुजारी का बयान भी दर्ज किया गया था। सप्तपदी के अनुसार नहीं हुई थी शादी याचिकाकर्ता ने बताया कि हिंदू रीति-रिवाजों और सप्तपदी के अनुसार शादी नहीं हुई थी। यह भी बताया गया कि संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने खुद माना था कि शादी हिंदू रीति-रिवाजों और सप्तपदी के अनुसार नहीं हुई थी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि सिर्फ आर्य समाज मंदिर का प्रमाणपत्र होने से यह नहीं माना जा सकता कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शादी हुई है। इसलिए इसे याचिकाकर्ता को नौकरी के लिए अयोग्य ठहराने का आधार भी नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए सेवा से हटाने का आदेश रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता को ड्यूटी पर वापस लेने का निर्देश दिया।
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आर्य समाज का प्रमाणपत्र वैध हिंदू विवाह का प्रमाण नहीं:हाईकोर्ट ने SSB डिप्टी कमांडेंट को सेवा से हटाने का आदेश खारिज किया
