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चुनाव आयोग का कहना है कि वही लोग वोट डाल सकेंगे, जो नागरिकता साबित कर सकेंगे। यह व्यवस्था पहले ही बिहार और बंगाल में लागू की जा चुकी है। अब इसे देश में लागू करने की बात हो रही है। यहां 4 सवाल हैं। नागरिकता का मतलब क्या है? क्या नागरिकता तय करने के कई तरीके हैं और भारत इनमें किस मॉडल को अपनाता है? कौन-कौन-से दस्तावेज नागरिकता साबित करते हैं? और क्या दस्तावेज के आधार पर नागरिकता तय करना लोगों को बाहर करने वाला तरीका है, सभी को साथ लेने वाला तरीका है या पूरी तरह तटस्थ है? दार्शनिक हाना आरेंट ने नागरिकता को “अधिकार पाने का अधिकार’ कहा था। नागरिक वह व्यक्ति होता है, जिसे कानून किसी राजनीतिक समुदाय का सदस्य मानता है और उसे कई अधिकार मिलते हैं। पुराने समय में ऐसा नहीं था। तब लोग नागरिक नहीं, राजा की प्रजा होते थे। उनके अधिकार राजा की इच्छा पर निर्भर थे। 18वीं सदी के आखिर में जब अमेरिका और फ्रांस में क्रांति हुई, तब पहली बार नागरिकता पर आधारित व्यवस्था शुरू हुई। पश्चिम के दूसरे देशों में भी धीरे-धीरे नागरिकता की व्यवस्था विकसित हुई। भारत में भी अंग्रेजों के शासन के दौरान लोग नागरिक नहीं, बल्कि प्रजा थे। करीब 600 रियासतों में भी यही व्यवस्था थी। भारत में नागरिकता का विचार आजादी के बाद ही सच में लागू हुआ। नागरिकता तय करने के दो मुख्य तरीके हैं। पहला जन्म के आधार पर नागरिकता। इसमें व्यक्ति जिस देश में पैदा होता है, वही उसकी नागरिकता का आधार बनता है। इसमें जाति, धर्म, लिंग या नस्ल मायने नहीं रखते। दूसरा वंश के आधार पर नागरिकता। पहले वाले को अमेरिका में जन्मसिद्ध नागरिकता भी कहा गया है। यही कारण था कि 1867 में संविधान के 14वें संशोधन के बाद गुलाम रहे लोगों को भी नागरिकता मिली। अमेरिका और फ्रांस जन्म के आधार पर नागरिकता वाले देशों के सबसे अच्छे उदाहरण हैं। वहीं जर्मनी और जापान वंश के आधार पर नागरिकता वाले देशों के उदाहरण माने जाते हैं। जब सोवियत संघ टूटा, तब वहां रहने वाले 10 लाख से ज्यादा जातीय जर्मन- जो सोवियत नागरिक थे- जर्मनी जाकर वहां के नागरिक बन गए। इसी तरह, पेरू के राष्ट्रपति अल्बर्टो फुजीमोरी ने 2000 में अपनी सरकार गिरने के बाद जापान जाकर नागरिकता ले ली, क्योंकि उनके पूर्वज जापानी थे। भारत किस मॉडल का पालन करता है? नीरजा गोपाल जयाल की किताब “सिटीजनशिप एंड इट्स डिस्कंटेंट्स : एन इंडियन हिस्ट्री’ बताती है कि संविधान सभा ने साफ तौर पर जन्म के आधार पर नागरिकता को चुना था, न कि वंश के आधार पर नागरिकता को। संविधान सभा ने इस सिद्धांत के आधार पर कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद को दी। 1955 के मूल नागरिकता कानून में कहा गया कि भारत में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति भारतीय नागरिक होगा, जब तक कि वह पाकिस्तान या किसी दूसरे देश की नागरिकता न चुन ले। उस समय कैरेबियन, मलाया, केन्या, युगांडा, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को भारतीय नागरिकता नहीं दी गई। उन्हें कहा गया कि वे जिस देश में रहते हैं, वहीं की नागरिकता लें। 1980 के दशक से- खासकर असम आंदोलन के बाद- भारत की नागरिकता व्यवस्था बदलने लगी। अब सिर्फ भारत में जन्म लेना ही नागरिकता के लिए काफी नहीं रहा। नीरजा जयाल लिखती हैं कि 1987 से पहले भारत में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति कानूनी रूप से भारतीय नागरिक है, लेकिन 1987 से 2003 के बीच जन्म लेने वालों को तभी नागरिकता मिलेगी, जब उनके कम से कम एक माता या पिता भारतीय नागरिक हों। 2004 के बाद भारत में जन्म लेने वाले ऐसे बच्चों को जन्म से नागरिकता नहीं मिलेगी, जिनके माता-पिता में से एक अवैध प्रवासी हो। असम में बांग्लादेश से आने वाले कई प्रवासी मुसलमान थे। इसलिए ‘अवैध प्रवासी’ की यह श्रेणी, जन्म के आधार पर नागरिकता के सिद्धांत में धर्म के आधार पर एक छिपा हुआ अपवाद बन गई। आज विवाद इस पर नहीं है कि सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही वोट देने का अधिकार होना चाहिए। विवाद इस पर है कि नागरिकता साबित करने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज जरूरी होंगे? भारत में ऐसा कोई एक दस्तावेज नहीं है, जो नागरिकता साबित करता हो। यहां सिर्फ करीब 8% लोगों के पास पासपोर्ट है। जन्म प्रमाण पत्र का मामला तो और जटिल है। जितनी ज्यादा उम्र के लोग हैं, उतनी ही संभावना है कि उनका जन्म घर पर हुआ हो और उनके पास जन्म प्रमाण पत्र न हो। यहां यह सवाल भी समीचीन है कि अगर वोट देने के लिए जन्म प्रमाण पत्र को जरूरी बना दिया गया तो किन समुदायों के मतदाताओं की संख्या वोटर लिस्ट में कम हो जाएगी और इससे किसे चुनावी फायदा मिलेगा? पश्चिम बंगाल की नई सरकार ने कहा कि अगर आपका नाम वोटर लिस्ट में नहीं है, तो आपका राशन बंद कर दिया जाएगा। हमें समझना होगा कि नागरिकता सिर्फ एक अधिकार नहीं है, वह दूसरे अधिकार पाने की भी नींव है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम:नागरिक कौन है, इसी से तय होगा कि अधिकार किसे मिलेंगे
