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‘एक बार विदाई दे मां…’धुन के बीच खुला जेल गेट:सुबह 3:50 बजे शहीद खुदीराम बोस को दी गई श्रद्धांजलि, 11 अगस्त 1908 को इसी वक्त दी गई थी फांसी




मुजफ्फरपुर में मंगलवार की अहले सुबह जब पूरा शहर गहरी नींद में था, तब केंद्रीय कारा के बाहर देशभक्ति और श्रद्धा का माहौल था। रात के करीब 3 बजे केंद्रीय कारा का गेट खुला। अधिकारी, जनप्रतिनिधि, प्रबुद्ध लोग और पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर से आए शहीद खुदीराम बोस के गांव के लोग जेल परिसर में दाखिल हुए। रंगीन रोशनी से सजे परिसर में हुमाद की खुशबू के बीच धीमी आवाज में गीत बज रहा था- ‘एक बार विदाई दे मां घूरे आसी, हांसी हांसी परबो फांसी…।’ यही वह गीत था, जिसे गाते हुए महज 18 वर्ष की उम्र में खुदीराम बोस ने देश की आजादी के लिए फांसी के फंदे को गले लगाया था। उनकी शहादत दिवस पर उसी ऐतिहासिक जेल में श्रद्धांजलि का आयोजन हुआ। 3:50 बजे उसी स्थान पर दी गई सलामी 11 अगस्त 1908 को जिस समय खुदीराम बोस को फांसी दी गई थी, ठीक सुबह 3:50 बजे अधिकारियों और लोगों ने फांसी स्थल पर पहुंचकर उन्हें सलामी दी और पुष्पांजलि अर्पित की। इसके बाद सभी उस ऐतिहासिक सेल में पहुंचे, जहां शहादत से पहले खुदीराम बोस को रखा गया था। पश्चिम मेदिनीपुर से पहुंचे लोग अपने साथ शहीद के पैतृक गांव की मिट्टी और काली मंदिर का प्रसाद लेकर आए थे। फांसी स्थल पर मिट्टी में पौधे लगाए गए और प्रसाद अर्पित किया गया। इस दौरान पूरा परिसर श्रद्धा और देशभक्ति की भावना से भर गया। कार्यक्रम में तिरहुत प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह, पुलिस महानिरीक्षक चंदन कुशवाहा, जिलाधिकारी कुमार गौरव, वरीय पुलिस अधीक्षक कांतेश कुमार मिश्रा समेत कई अधिकारी मौजूद रहे। ‘वीर सपूतों के बलिदान के बिना आजादी मुश्किल थी’ तिरहुत प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह ने कहा कि देश के वीर सपूतों ने आजादी के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे वीरों के बलिदान के बिना देश को आजादी मिलना बहुत मुश्किल था। आज उनके शहादत दिवस पर उन्हें नमन करते हुए गौरवान्वित महसूस हो रहा है। खुदीराम बोस के गांव के रहने वाले प्रकाश कुमार हलदर ने कहा, ‘खुदीराम बोस को मृत्यु से पहले मेदिनीपुर जाने और वहां सिद्धेश्वरी मां का प्रसाद खाने की इच्छा थी। इसी भाव को याद करते हुए हम हर साल उनके शहादत दिवस पर मेदिनीपुर की मिट्टी और सिद्धेश्वरी माता का प्रसाद लेकर मुजफ्फरपुर आते हैं।’ इसके बाद अधिकारियों ने कंपनीबाग स्थित खुदीराम बोस स्मारक पर पहुंचकर उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने पहुंचे थे खुदीराम खुदीराम बोस का नाम मुजफ्फरपुर के इतिहास से उस घटना के कारण जुड़ा है, जिसने ब्रिटिश शासन को हिला दिया था। 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर के तत्कालीन सत्र न्यायाधीश डगलस किंग्सफोर्ड को निशाना बनाकर बम फेंका था। हालांकि जिस बग्घी पर बम फेंका गया, उसमें किंग्सफोर्ड मौजूद नहीं था। बम विस्फोट में दो ब्रिटिश महिलाओं की मौत हो गई। इसके बाद खुदीराम बोस को समस्तीपुर के पूसा स्टेशन के पास गिरफ्तार कर लिया गया। प्रफुल्ल चाकी ने गिरफ्तारी से पहले खुद को गोली मार ली थी। खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर लाकर मुकदमा चलाया गया और महज 18 वर्ष की उम्र में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त 1908 को उन्होंने इसी केंद्रीय कारा में हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया। उनकी शहादत ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे कम उम्र के अमर शहीदों में शामिल कर दिया। आज भी मुजफ्फरपुर की यह जेल उस ऐतिहासिक बलिदान की गवाह है, जहां हर साल 11 अगस्त की सुबह खुदीराम बोस की शहादत को उसी भाव और श्रद्धा के साथ याद किया जाता है।



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