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याद हैं वो दिन, जब पूरा परिवार साथ में यात्राएं करता था? तब यात्राएं कभी भी सिर्फ किसी मंजिल तक पहुंचने का नाम नहीं हुआ करती थीं। वे अपने आप में एक इवेंट थीं, उनमें एक रोमांच था और अकसर चलती-फिरती पिकनिक भी। बचपन में हम ट्रेन की खिड़की से चिपके रहते थे और अगले स्टेशन का इंतजार करते थे। जैसे ही ट्रेन धीमी होती, हमारे युवा पिता प्लेटफॉर्म-विहीन स्टेशन पर उतर जाते, क्योंकि हम बच्चों को नीचे उतरने की इजाजत नहीं थी। वे फूड-कार्ट की ओर दौड़ते और हममें से कोई चिल्लाता, ‘डैडी, वो वाला नहीं! उसके बगल में जो पीला पैकेट है, वो!’ ऐसा करके हम ठीक-ठीक बता देते कि हमें कौन-से बिस्किट चाहिए। कोयले के इंजन की लंबी सीटी बजने से पहले पिता को वापस लौट आना होता था। और जब वह सीटी बजती, तो हम सब मिलकर गाने लगते- ‘गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है!’ आसपास बैठे यात्री हमारी बचकानी हरकतों पर मुस्करा देते। 1960 के दशक की यात्राएं ऐसी ही हुआ करती थीं : खाओ, ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ो, कुछ मिनट सोने का नाटक करो, फिर नीचे उतरकर दोबारा खाओ। जैसे ही पिता बिस्किट का पैकेट हमारे हाथ में देते, हम उस पर टूट पड़ते और दांतों से उसका रैपर फाड़ते। तब मां तुरंत हमारी पीठ पर चपत लगातीं और कहतीं, ‘सब कुछ मुंह से छुओगे, तो बीमार पड़ जाओगे!’ वे पैकेट झपटकर अपने पास रख लेतीं, फ्लास्क से स्टील के गिलासों में गरम दूध उड़ेलतीं और हम बिस्किटों को उसमें डुबोकर खाने लगते। हमें कभी परवाह नहीं होती थी कि बिस्किट किस ब्रांड के हैं, उनमें कौन-कौन-सी चीजें हैं या कितनी कैलोरी हैं। खाली रैपर देखकर हमारा बस एक ही सवाल हुआ करता था : एक और बिस्किट बचा है क्या? अगर जवाब ‘नहीं’ होता, तो खाली पैकेट तुरंत चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया जाता। कभी-कभी वो पैकेट हवा में उड़कर सामने बैठे अंकल की खिड़की से अंदर पहुंच जाता और वे उसे पकड़ लेते। तब वे हमें ऐसी नजर से देखते, मानो कह रहे हों : ‘बैड हैबिट्स’। हम भी तुरंत कह देते, ‘सॉरी’। उस जमाने में ट्रेन का डिब्बा लगभग किसी छोटी-सी बस्ती जैसा होता था। हम छह सीटों वाले किसी भी कूपे में चले जाते और वहां बिल्कुल अनजान लोग भी हमारा स्वागत करते। कोई हमें खाने के लिए कुछ दे भी देता। हम शिष्टता से मना करते और भागकर अपने माता-पिता के पास लौट आते। अब 2026 में आइए। पिछले हफ्ते मुंबई एयरपोर्ट से यात्रा करते हुए अचानक मुझे एहसास हुआ कि घर से निकलने के बाद मैंने एक भी व्यक्ति से बात नहीं की थी। टैक्सी प्री-पेड थी, इसलिए ड्राइवर ने मुझे चुपचाप एयरपोर्ट के प्रवेश द्वार पर उतार दिया। डिजीयात्रा ऐप ने मेरा चेहरा पहचान लिया, इसलिए एयरपोर्ट की सुरक्षा में तैनात सीआरपीएफ जवानों से भी मुझे बात करने की जरूरत नहीं पड़ी। इंडिगो के कियोस्क पर मैंने अपना सूटकेस खुद चेक-इन कर दिया। मशीन ने दो कागज निकाले- एक बोर्डिंग पास और एक बैगेज टैग। सुरक्षा जांच के दौरान और फिर बोर्डिंग गेट पर भी कैमरों ने मुझे पहचान लिया। किसी बातचीत की जरूरत नहीं थी। मैं अपनी सीट पर पहुंचा, नॉइज़-कैंसलिंग हेडफोन लगाए, गले में अपना ‘डु नॉट डिस्टर्ब’ का संकेत लटकाया और आंखें बंद कर लीं। मेरी आंखें तभी खुलीं, जब विमान के उतरते समय मुझे एक हलका-सा झटका लगा। घर से निकलने के बाद मैंने जो पहला वाक्य बोला, वह एयरपोर्ट के बाहर अपने ऑफिस के ड्राइवर से था। आधुनिक यात्राओं में आपका स्वागत है। ये बहुत दक्षतापूर्ण होती हैं। इनमें कहीं झंझट नहीं होती। ये अद्भुत रूप से सुविधाजनक हैं। लेकिन इसी फेर में ये बेहद अकेलेपन से भी भर गई हैं। शायद हमें 1960 के दशक की यात्राओं का थोड़ा-सा हिस्सा अपनी 2026 की जिंदगी में वापस लाने की जरूरत है। नहीं, हमें कोयले से चलने वाले इंजनों को वापस लाने की जरूरत नहीं है, ना ही धुएं से भरे डिब्बों और सख्त बर्थों को। लेकिन उस दौर की बातचीतों को हमें जरूर फिर से लौटा लाना होगा। वे अनजान लोग, जो मुस्कराकर मिलते थे। वे बच्चे, जो घूमते-घूमते किसी दूसरे बर्थ पर जा पहुंचते थे। और वे अंकल, जिन्होंने हमारा नाम तक जाने बिना हमें यह सिखा दिया था कि चलती ट्रेन की खिड़की से चीजें बाहर फेंकना बुरी आदत है। फंडा यह है कि तकनीक ने हमारी यात्राओं को तेज कर दिया है। लेकिन अब शायद हमें फिर से इन्हें मानवीय बनाने की जरूरत है। हर जगह ‘अकेले’ यात्रा करना बंद कर देना चाहिए।
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एन. रघुरामन का कॉलम:क्या हमारी यात्राएं अकेलेपन से जूझ रही हैं
