एन. रघुरामन का कॉलम:हम अपनी बदलती हुई आइडेंटिटी को कैसे मैनेज करें?




हाल ही में एक बड़ी कंपनी एक सीनियर पोजिशन के लिए कोई ऐसा व्यक्ति तलाश रही थी, जिसका अंग्रेजी और हिंदी, दोनों पर कमांड हो। उन्होंने मुझसे संपर्क किया, क्योंकि उन्हें लगा कि मैं ऐसी योग्यता वाला व्यक्ति हूं। लेकिन मुझे लगा कि कंपनी को मुझसे भी ब्रिलियंट व्यक्ति की जरूरत है, जिसके पास एज एडवांटेज हो। यानी, जो मुझसे कम से कम 15 साल छोटा हो और कंपनी में लंबे समय तक सेवा दे पाए। मुंबई में कुछ साल पत्रकारिता में हाथ आजमाने के बाद, जहां मेरी उनसे मुलाकात हुई थी, वे एजुकेशन सेक्टर में चले गए और अपने गृह राज्य बिहार में प्रिंसिपल के तौर पर काम करने लगे। मैंने उनका नाम मजबूती से रिकमेंड किया। और इसी फैसले के साथ मुझ पर एक नई जिम्मेदारी भी आ गई कि मैं इस मिड-एज कैंडिडेट को मजबूती से सहारा दूं, ताकि वे आइडेंटिटी के इस बदलाव को आसानी से पार कर सकें। हम सभी जानते हैं कि वयस्क जीवन में एक निश्चित मुकाम पर पहुंचने के बाद हम अपनी जॉब पोजिशन को ही अपनी आइडेंटिटी मानने लगते हैं। इसमें यह भी शामिल होता है कि हम खुद को कैसे देखते हैं, हमारे मूल्य क्या हैं और दुनिया में हमारी जगह क्या है। इसी वक्त हम यह भी निर्णय कर लेते हैं कि यह सब स्थिर और अपरिवर्तित रहना चाहिए। लेकिन वयस्क जीवन में कई ऐसे मौके आते हैं, जब हमारी आइडेंटिटी बदल सकती है। जैसे ऊपर बताए गए मामले में हुआ, या किसी गंभीर बीमारी, जीवनसाथी के ट्रांसफर, तलाक या पैरेंटिंग एडजस्टमेंट में- जब बेटा कहीं दूर पढ़ाई करने चला जाए और मां उसके साथ वहां जाकर नई जॉब तलाशने लगें। हालांकि, बहुत-सी बार आइडेंटिटी में ये बदलाव जानबूझकर होते हैं। ऐसा तब होता है, जब हम आत्मावलोकन करते हैं या फिर से यह आकलन करते हैं कि हम कौन हैं और हमारे लिए क्या मायने रखता है। लेकिन बाकी मौकों पर ये बदलाव अचानक हमारे सामने आ जाते हैं। जिंदगी में किसी बड़े बदलाव के कारण हुआ आइडेंटिटी-शिफ्ट अकसर अचानक हुई घटना और डिस-ओरिएंटिंग महसूस होता है। मसलन, जिस व्यक्ति को सैकड़ों बच्चे ‘गुड मॉर्निंग सर’ कहकर ग्रीट करते थे, वही व्यक्ति नई जॉब संभालने पर उच्चाधिकारियों को ऐसे ही ग्रीट करता नजर आता है। इस बदलाव के साथ वह अपनी पुरानी आइडेंटिटी और जीवन जीने के तरीके को लेकर व्यथित हो सकता है, भले ही नई वास्तविकता सकारात्मक ही क्यों न हो। वह भीड़भाड़ भरे शहर में नई पोजिशन, नई सैलरी पाकर उत्साहित हो सकता है, फिर भी उसे अपनी पिछली जिंदगी के कुछ ऐसे हिस्सों की कमी महसूस हो सकती है, जो अब उसके पास नहीं हैं। इसके अलावा, उसे भविष्य को लेकर एंग्जायटी भी हो सकती है। ऐसे समय में उसे भगवान कृष्ण की बात याद करनी चाहिए- ‘गहना कर्मणो गतिः’, यानी कर्म की जटिलता को समझना बहुत कठिन है। स्वामी शिवानंद कहते हैं कि कोई भी घटना बिना किसी निश्चित और सकारात्मक कारण के नहीं हो सकती। इसीलिए यह नियम काफी रहस्यमय है। विशेषज्ञ आइडेंटिटी में आए बदलाव को मैनेज करने के कुछ तरीके बताते हैं, जो यहां पेश हैं। 1. बहुत दूर की सोचने के बजाय वर्तमान और निकट भविष्य पर फोकस करें : जब आप किसी नई जगह जॉइन करें तो खुद से पूछें कि अगले एक घंटे, एक दिन या एक हफ्ते में मैं कौन-सा हेल्पफुल बिहेवियर अपना सकता हूं? और खुद को रिमाइंड कराएं कि जो समस्या सामने आई ही नहीं, आप उसका समाधान नहीं कर सकते। अगर आपका दिमाग भविष्य की चिंताओं में उलझा है, जैसे दोस्तों के बिना अकेलापन महसूस करना, तो गहरी सांस लें और वर्तमान पर री-फोकस करें।
2. हेल्पफुल रूटीन से जीवन में स्थिरता लाएं : ऐसा रूटीन बनाएं, जो आपको स्थिरता का एहसास दे। नियमित वॉक पर जाएं और नए शहर में नए दोस्त बनाएं।
3. खुद के प्रति नॉन-जजमेंटल करुणा भाव रखें : अगर हम खुद की आलोचना करते रहें तो बदलाव और मुश्किल हो जाएगा। यह मत कहिए कि ‘क्या मैंने बेहतरी के लिए बदलाव किया है या…’ बल्कि कहिए कि ‘मैं नई जगह पर चीजों को समझने की कोशिश कर रहा हूं और यह रोमांचक है।’ फंडा यह है कि जब आइडेंटिटी बदलती है तो अज्ञात चीजों को खोज के अवसर के रूप में देखें और खुद से खुल कर सवाल पूछें। मसलन, ‘इस दौरान मैं अपने बारे में क्या सीखूंगा?’ यकीन मानिए, आप खुद को पहले से बेहतर जान जाएंगे।



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