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एक्स-रे और एमआरआई जैसी मशीनों ने शरीर के भीतर झांककर मेडिकल जगत की तस्वीर बदल दी है। अब वैज्ञानिक ‘एडिबल सेंसर्स’ (निगलने योग्य सेंसर्स) के जरिए शरीर के अंदरूनी हिस्सों की निगरानी का नया दौर शुरू कर रहे हैं। बीमारी का पता लगाने के लिए अक्सर कैमरे या सेंसर युक्त गोलियां दी जाती हैं, लेकिन सबसे बड़ा जोखिम उनकी बैटरी को लेकर रहता है। सामान्य बैटरियों में जहरीले केमिकल होते हैं, जिनका पेट में फटना या अटकना जानलेवा साबित हो सकता है। इस जोखिम को दूर करने के लिए मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के शोधकर्ताओं ने जियोवानी ट्रावर्सो के नेतृत्व में एक अनोखा समाधान विकसित किया है। उन्होंने कागज की ऐसी बैटरी बनाई है, जो अपना काम पूरा करने के बाद पेट के अंदर ही सुरक्षित रूप से घुल जाती है और शरीर उसे आसानी से पचा लेता है। ‘नेचर केमिकल इंजीनियरिंग’ में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, यह नई बैटरी मैग्नीशियम, जेल और विशेष रासायनिक कागज की परतों से बनाई गई है। पेट के एसिडिक और कठिन वातावरण से इसकी रक्षा के लिए इस पर मोम की खास परत चढ़ाई गई है। मैग्नीशियम की रासायनिक प्रतिक्रिया से इसमें बिजली पैदा होती है। यह एक सामान्य ‘एए’ बैटरी से भी थोड़ा ज्यादा वोल्टेज दे सकती है। आकार इतना छोटा है कि यह सामान्य जिलेटिन कैप्सूल का चौथाई हिस्सा घेरती है। बाकी जगह में सेंसर, कैमरा या दवा रख सकते हैं, जिससे इसके मेडिकल इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। शोधकर्ताओं ने इसका परीक्षण चूहों के बजाय सुअरों पर किया, क्योंकि उनकी पाचन प्रणाली इंसान के पेट से काफी मेल खाती है। पहले परीक्षण में बैटरी को आरएफआईडी ट्रैकर के साथ कैप्सूल में बंद करके दिया गया, जिसे बैटरी ने सफलतापूर्वक चालू रखा। इसके बाद, ज्यादा बिजली की खपत वाले काम में पेट की मांसपेशियों को इलेक्ट्रिक शॉक देने के लिए इसकी मदद ली गई, जहां इसने लगातार 20 मिनट तक काम किया। काम खत्म होने के तीन दिन बाद पेट के पाचक रसों ने मोम की परत को भेद दिया और बैटरी के सभी हिस्से धीरे-धीरे गलकर पूरी तरह घुल गए। खाने वाली चीजों से बैटरी बनाने पर भी काम चल रहा सदर्न कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर यासिर खान के मुताबिक, यह ‘एडिबल डिवाइस’ की दिशा में बड़ा कदम है। हालांकि इंसानों पर उपयोग से पहले यह जांचना जरूरी है कि घुलकर शरीर में अवशोषित होने वाले हिस्से आंतों को कोई नुकसान तो नहीं पहुंचाते। दिलचस्प बात यह है कि बैटरी को खाने की सामग्री से बनाने पर भी काम चल रहा है। मिलान के इटालियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने तो विटामिन बी-2 और समुद्री शैवाल (नोरी) से बैटरी बना ली है। आने वाले समय में स्वास्थ्य जांच के लिए खतरनाक लिथियम नहीं, बल्कि शरीर में सुरक्षित रूप से पचने वाली तकनीक काम करेगी।
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एमआईटी का इनोवेशन: पेट में ही पैदा होगी बिजली:शरीर के भीतर घुलकर पच जाएगी कागज से बनी बैटरी, केमिकल से छुटकारा
