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उदयपुर की डॉ. मनस्वी अग्रवाल ने मई 2026 में एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया। जिस एवरेस्ट पर अब तक करीब 400 पर्वतारोहियों की मौत हो चुकी है, उसे फतह करने वाली वे राजस्थान की पहली आम महिला बनीं। उनसे पहले यह शिखर राज्य की तीन महिलाओं ने फतेह किया था, जो सेना, अर्धसैनिक बल या सरकारी संस्थान से जुड़ी थीं। सफर इतना जोखिम भरा था कि उतरते वक्त ठंड के कारण पैर की अंगुलियां गल गईं। दोनों पैर कटने तक की नौबत आ गई। अभियान में साथ गए टीम के दो सदस्यों की मौत हो गई। अगस्त 2025 से मई 2026 तक नौ महीनों में एल्ब्रुस, किलिमंजारो, विन्सन मैसिफ, अकोंकागुआ और एवरेस्ट फतेह किया। मनस्वी विन्सन पर पहुंचने वालीं राजस्थान की पहली शख्सियत हैं। 15 अगस्त को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने बीकानेर में राज्य स्तरीय सम्मान दिया। मनस्वी लॉ प्रोफेसर हैं। शूटिंग और घुड़सवारी भी कर चुकी हैं। भास्कर से बातचीत में उन्होंने अपना अनुभव शेयर किया। सवाल: चोटी पर तिरंगा फहराते पहला ख्याल क्या था? जवाब: थकान भूल चुकी थी। लगा ड्राई स्टेट की लड़कियां अगर यह कर सकती हैं, तो मैं उनके लिए इंस्पिरेशन बनूंगी। राजस्थान को सूखा राज्य माना जाता है पर ट्रेनिंग यहां भी हो सकती है। सवाल: सेना या सरकारी अभियान के बिना यह फैसला कैसे लिया? जवाब: घर में कहा गया पहली बार जा रही हो, पहली सिविलियन। आर्मी वाले टफ होते हैं, तुम्हें भी उतना टफ होना पड़ेगा। आर्मी इंस्टीट्यूट से ट्रेनिंग ली। कोच ने प्रॉपर तैयारी पर जोर दिया। एवरेस्ट के लिए मनाली और लेह-लद्दाख में अलग से अभ्यास किया। जब ट्रेनरों को लगा कि ऊंचाई के काबिल हो गई, तभी ग्रीन फ्लैग मिला। सवाल: नौ महीनों में पांच चोटियां, योजना थी या जुड़ती गईं? जवाब: जून 2025 में यूजीसी नेट असिस्टेंट प्रोफेसरशिप क्वालीफाई कर लिया। पीएचडी भी एक तरह से पूरी हो चुकी थी। माता-पिता ने पैशन के लिए मोटिवेट किया। पहले एल्ब्रुस, क्योंकि अगस्त में उसकी विंडो थी। हर अभियान की अगली विंडो बैक टू बैक मिलती गई। यह पहले से लिखी प्लानिंग नहीं थी। जिस लय में जाती गई, उसी में एवरेस्ट तक पहुंची। सवाल: विन्सन पर सबसे कठिन क्या था, ठंड या अकेलापन? जवाब: विन्सन अंटार्कटिका के बीचोंबीच है। लॉजिस्टिक्स की समस्या रहती है। तापमान माइनस 40 से 50। एक बार लगा शरीर माइनस 40 में भी चल सकता है। आठ सदस्यीय टीम गई। सवाल: अकोंकागुआ आपने भारत लौटे बिना शुरू किया, क्यों? जवाब: अंटार्कटिका के बाद बीच में कुछ वक्त मिला। जिम, वेट और लोड कैरींग जारी रखी। अकोंकागुआ पर करीब 7,000 मीटर बिना ऑक्सीजन जाना था। मन में तय था, नौ महीनों में यह सब करना है। रेस्ट का ख्याल आया ही नहीं। सवाल: एवरेस्ट पर चढ़ना खतरनाक रहा या उतरना? जवाब: चोटी पर खुशी हुई। पता नहीं था आगे क्या होगा। उतरते ही दस उंगलियों में सेंसेशन खत्म हुआ। नर्व पेन शुरू हुआ। फ्रॉस्टबाइट समझ आई। करीब 8,500 मीटर से 6,200 मीटर तक आना पड़ा। 20 किलोमीटर, करीब 30 घंटे। कैंप-2 तक पहुंचना था। हेली रेस्क्यू वहीं संभव था। सवाल: डॉक्टरों ने क्या कहा? जवाब: काठमांडू के नॉर्विक अस्पताल में पूछा, इन पैरों से कितना चलीं। कहा 20 घंटे में 30 किलोमीटर। हैरान हुए। सियाचिन की ट्रेनिंग वाले भी इतनी देर नहीं चल पाते। बोले, उंगलियाँ और पैर दोनों बचें। पैर ठीक हो रहे हैं। सवाल: टीम के दो सदस्य नहीं रहे। उन्हें कैसे याद करती हैं? जवाब: दोनों के साथ करीब 50 दिन रही। छोटी बहन की तरह पूछते, ठीक हो, खाना चाहिए क्या। अरुण सर हैदराबाद के थे। चोटी पर मुझसे आधा घंटा दूर थे। उतरते पता चला, टॉप पर रह गए। रात हो चुकी थी। अपनी जान बचाकर चलना ही सही लगा। संदीप सर आंध्र के थे। कैंप-2 तक रेस्क्यू में बूट्स एंड क्रैम्पन्स के ओनर रोमिल सर साथ थे। फिर भी नहीं बचे। सवाल: कौन सी ट्रेनिंग एवरेस्ट पर काम आई? जवाब: माउंट आबू में रॉक क्लाइंबिंग से शुरू किया। अरावली का टेरेन समझ आया। अरुणाचल में बेसिक माउंटेनियरिंग की। 6,500 मीटर की तैयारी दार्जिलिंग के एचएमआई में हुई। तेनजिंग नोर्गे की मूर्ति देखी। वही मोटिवेशन का हिस्सा बनी। सवाल: पहाड़, घोड़ा और राइफल में कॉमन क्या है? जवाब: सेल्फ कंट्रोल। घोड़ा बैठते ही समझ जाता है, राइडर कितना कॉन्फिडेंट है। राइफल में फोकस और डिसिप्लिन चाहिए। पहाड़ पर एक कदम इधर-उधर हुआ तो 100 फुट का गड्ढा। यह एक तरह का मेडिटेशन है। तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। सवाल: 15 अगस्त का सम्मान पाकर कैसे लगा? जवाब: अच्छा लगा। राजस्थान की पहली माउंटेनियर हूं, जिसे यह राज्य अवॉर्ड मिला। मतलब यह नहीं कि कदम रुक जाएं। हर लड़की उस लेवल तक पहुंचे। सरकार कुछ करे, तो योगदान दूंगी। सवाल: छह अंगुलियां गंवाने के बाद अगली चोटी? जवाब: शरीर नहीं रोकता। मन मजबूत हो तो शरीर को साथ ले जाया जा सकता है। एक महीने में रिकवर होकर ट्रेनिंग शुरू करूंगी। डेनाली और ऑस्ट्रेलिया की चोटी पर फोकस रहेगा। सवाल: खर्च किसने उठाया? मौसम बड़ा रोड़ा है या पैसे? जवाब: दोनों। एल्ब्रुस और किलिमंजारो पर अच्छा मौसम मिला। अंटार्कटिका पर तेज हवा, माइनस 40-50, और 60 किलो का स्लेज। खर्च परिवार और रिश्तेदारों ने उठाया। एवरेस्ट के लिए करीब 35 लाख खर्च हुए। उदयपुर में पिता के जरिए स्पॉन्सर मिले। स्पॉन्सर तभी हां कहता है, जब पढ़ाई और दूसरी स्पोर्ट्स में खुद इतना हो। सवाल: कभी लगा, मुड़ जाऊं? जवाब: एवरेस्ट पर 300 से 400 शव पड़े हैं। देखकर लगा, कहीं मैं भी इन्हीं में रह जाऊँ। फिर लगा, ट्रेनिंग अच्छी है। पता है कब लौटना है। पहाड़ में सबसे जरूरी रिटर्न है, सही वक्त पर। एक सेकंड को गिव अप आया, अगले सेकंड में नहीं। सवाल: रोजमर्रा की जिंदगी में क्या बदला? जवाब: अभी जूते नहीं पहन पाती। सैंडल में आराम है। घोड़े अब भी उतने ही पसंद हैं। स्टड फार्म जाती हूं। कुछ महीनों में पहले से बेहतर होऊंगी। एवरेस्ट के बाद मन और मजबूत है। सवाल: दस साल बाद मनस्वी को कैसे याद किया जाए? जवाब: हर मन में एक पहाड़ होता है। सबसे बड़ा पहाड़ अपने मन का है। उसे जीत लिया तो दुनिया का हर पहाड़ जीता जा सकता है। लड़कियां हर फील्ड में आगे बढ़ें। मुकाम से पहले सोशल मीडिया से दूरी रखें। फ्रॉस्टबाइट में नेपाल सरकार, भारत सरकार और राजस्थान सरकार का साथ मिला। चाहती हूँ, रेस्क्यू के कानून बनें। जो परेशानी मुझे उठानी पड़ी, आगे किसी बेटी को न उठानी पड़े।
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‘एवरेस्ट पर 400 शव, लगा मैं यहीं न रह जाऊं’:अंगुलियां गली, पैर काटने की नौबत, मनस्वी एवरेस्ट फतेह करने वाली पहली आम राजस्थानी महिला
