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'कोठला' के जरिए बिहार की अनकही कहानियों को दिखाएंगे शैवाल:नेशनल अवॉर्ड विनिंग 'दामुल' मूवी की लिखी थी स्क्रिप्ट, बोले- आधी आबादी को बराबरी का अवसर मिलना जरूरी




बिहार की मिट्टी, समाज और इतिहास को अपनी कहानियों में जीवंत करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार, कथाकार और फिल्म लेखक शैवाल एक बार फिर नए कथ्य के साथ दर्शकों के सामने आने की तैयारी में हैं। उनकी नई शॉर्ट फिल्म ‘कोठला’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि समाज की जड़ सोच, अंधभक्ति और स्त्री अस्मिता पर सवाल उठाने वाली संवेदनशील रचना है। फिल्म प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शन के लिए सूचीबद्ध हो गई है। अब उसे भेजे जाने की तैयारी की जा रही है। करीब चार दशकों से साहित्य व सिनेमा की दुनिया में सक्रिय शैवाल उन चुनिंदा रचनाकारों में हैं। जिन्होंने बिहार गया की जमीन से निकली कहानियों को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म ‘दामुल’ की कथा, पटकथा और संवाद लिखे। वर्ष 1985 में ‘दामुल’ को 32वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का स्वर्ण कमल (1984 की फिल्मों के लिए) मिला था। फिल्म को बाद में फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड भी मिला और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी सराहा गया। खास बात यह भी शैवाल खुद कहते हैं देश की 17 भाषाओं की फिल्मों में से चुनकर दामुल को पुरस्कृत किया गया था।इसके बाद से अब तक ऐसा नहीं हुआ है। मुझे इंतजार है कि कब कोई दूसरी फिल्म दूसरी भाषा से उस श्रेणी में आए। शैवाल ने इसके बाद चर्चित फिल्म ‘मृत्युदंड’ की कहानी लिखी। उन्होंने ‘दास कैपिटल : गुलामों की राजधानी’ की कथा, पटकथा और संवाद भी लिखे। इसके अलावा ‘मांझी : द माउंटेन मैन’ में भी बतौर लेखन सहयोगी उनका योगदान रहा। शैवाल बोले- आज लोग पढ़ने से ज्यादा देखना पसंद करते हैं अब उनकी नई शॉर्ट फिल्म ‘कोठला’ चर्चा में है। शैवाल का कहना है कि आज लोग पढ़ने से अधिक देखना पसंद करते हैं। समय भी सीमित है। ऐसे में 10 से 20 मिनट की शॉर्ट फिल्म किसी गंभीर विषय को प्रभावी ढंग से बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम बन चुकी है। उन्होंने बताया कि ‘कोठला’ नाम अपने आप में प्रतीक है। गांवों में नए अनाज को सुरक्षित रखने के लिए मिट्टी से बनाया जाने वाला पारंपरिक भंडार कोठला कहलाता है। फिल्म इसी प्रतीक को आधार बनाती है। जिस तरह नवान्न को सुरक्षित रखा जाता है। उसी तरह नवजात कन्या को भी सुरक्षित वातावरण, सम्मान और अवसर मिलने चाहिए। उन्होंने बताया कि ‘कोठला’ शॉट फिल्म नवजात कन्या की हत्या, स्त्री अस्मिता, सामंती मानसिकता, अंधभक्ति और रूढ़िवादिता पर आधारित है। शैवाल मानते हैं कि समाज की आधी आबादी को बराबरी का अवसर दिए बिना समग्र विकास संभव नहीं है। फिल्म इसी संदेश को संवेदनशील तरीके से सामने रखती है। फिल्म में हिमानी शिवपुरी संग नजर आएंगे आजाद और नील आर्य ठाकुर फिल्म में अभिनय के क्षेत्र की चर्चित अभिनेत्री हिमानी शिवपुरी अहम भूमिका में हैं। उनके साथ डी आलिया, आजाद और नील आर्य ठाकुर भी नजर आएंगे। फिल्म का निर्देशन अंजनी कुमार कर रहे हैं, जबकि के अरविंद छायांकन की जिम्मेदारी संभाली है। शैवाल को विश्वास है कि अपने मजबूत कंटेंट और प्रस्तुति के कारण फिल्म प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में निश्चित जगह बनाएगी। शैवाल की योजना केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है। वे शॉर्ट फिल्मों की पूरी श्रृंखला तैयार कर रहे हैं। उनका उद्देश्य बिहार के उन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रसंगों को सामने लाना है, जो इतिहास की मुख्यधारा में दर्ज नहीं हो सके। आम आदमी का संघर्ष, उसकी पीड़ा और समय की बदलती तस्वीर इन फिल्मों का केंद्र होगी। उन्होंने अपनी अगली शॉर्ट फिल्म ‘अग्निराग’ की भी झलक दी। यह फिल्म 1999 के कारगिल युद्ध और सेनारी नरसंहार जैसी दो अलग-अलग त्रासदियों के बीच एक स्त्री के जीवन, उसकी पीड़ा और मानवता की संवेदना को जोड़ती है। शैवाल के अनुसार, इसमें स्त्री केवल एक पात्र नहीं, बल्कि पूरी मानवता का प्रतीक है। बोले- मैंने 40 साल तक कोशिश की, अब युवाओं की बारी युवा पीढ़ी के लिए उनका संदेश भी स्पष्ट है। उनका कहना है कि उन्होंने 40 वर्षों तक बिहार के सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाने की कोशिश की। अब नई पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह इस सशक्त माध्यम से जुड़े और इसे नए आयाम दे। इसी कड़ी में उनकी फीचर फिल्म ‘अर्धनायक’ भी तेजी से आगे बढ़ रही है। इसकी शूटिंग सितंबर तक पूरी करने का लक्ष्य है। फिल्म का मुख्य विषय लोक कलाओं का क्षरण और पानी का संकट है। सात दिनों तक इसकी शूटिंग गया और 23 दिनों तक वैशाली में होगी। फिल्म की निर्माता डी. आलिया हैं। शैवाल का मानना है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का दस्तावेज भी है। उनकी नई फिल्म ‘कोठला’ इसी सोच का विस्तार है। यह फिल्म सिर्फ एक कहानी नहीं कहती, बल्कि उस समाज से सवाल भी करती है, जो आज भी बेटी और स्त्री के सम्मान की परीक्षा में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। बिहार की लोक स्मृतियों, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक चेतना को परदे पर उतारने का शैवाल का यह नया प्रयास सिनेमा प्रेमियों के साथ-साथ गंभीर साहित्यिक जगत का भी ध्यान आकर्षित करने वाला माना जा रहा है।



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