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गुजरात के बनासकांठा जिले के वाडिया गांव में बेटियों को देह व्यापार से बचाने के लिए कम उम्र में सगाई कराई जा रही है। गांव में लड़कियों की सगाई 7 से 12 साल की उम्र में कर दी जाती है। वाडिया गांव अहमदाबाद से करीब 200 किलोमीटर दूर है। यहां करीब 750 लोग रहते हैं। न्यूज एजेंसी PTI की रिपोर्ट के मुताबिक पीढ़ियों से इस पारंपरिक घुमंतू समुदाय की महिलाओं को देह व्यापार में धकेला जाता रहा है। गांव के पुरुष दलालों की तरह ग्राहकों की तलाश करते हैं। वे हर सुबह पालनपुर-थराद हाईवे पर जाकर ट्रक ड्राइवरों, राहगीरों और आसपास के गांवों-शहरों के पुरुषों से संपर्क करते हैं। गांव वालों का कहना है कि सगाई या शादी हो जाने के बाद लड़कियों को देह व्यापार में नहीं धकेला जाता। कम उम्र की सगाई को वे बेटियों को गांव से बाहर सम्मानजनक जिंदगी देने का रास्ता मानते हैं। देह व्यापार से बचने के लिए सगाई भारत में बाल विवाह पर रोक है। इसके बावजूद वाडिया में कम उम्र की सगाई को लड़कियों को देह व्यापार से बचाने का उपाय माना जाता है। गांव की कई लड़कियों की शादी परिवार पहले ही तय कर देते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि वे अपनी मां और दादी की तरह देह व्यापार में न जाएं। वाडिया में बदलाव की कोशिश पितृसत्तात्मक व्यवस्था के बीच हो रही है। कई परिवारों के लिए बाल सगाई ही बेटियों को इस धंधे से दूर रखने का एकमात्र रास्ता है। गांव की 19 साल की एक लड़की इस संघर्ष की मिसाल है। उसकी मां और दादी दोनों देह व्यापार में थीं। वह दूर के कॉलेज में नर्स बनने की पढ़ाई कर रही है। उसकी शादी हो चुकी है। उसके लिए दूल्हा 11 साल की उम्र में तय कर दिया गया था। उसने PTI को पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया, “मैंने देखा कि मेरे पिता और चाचा मेरी मां और दादी के लिए ग्राहकों को लाते थे।” उसने कहा, “जब वे ग्राहकों की जरूरत पूरी करने की स्थिति में नहीं रहीं, तब यह सिलसिला बंद हुआ। मेरी मां ने बताया कि उन्हें जबरन इसमें नहीं धकेला गया था।” उसके मुताबिक, गरीबी के कारण गांव में सब इसे सामान्य मानते थे। उसकी मां को यह भी पक्का पता नहीं था कि उसके जैविक पिता कौन हैं। लड़की ने कहा, “मेरी मां ने तय किया कि वह मुझे इस धंधे में नहीं जाने देंगी। 11 साल की उम्र में सामूहिक समारोह में मेरी सगाई हुई और 18 साल में शादी।” वह ऐसी अकेली लड़की नहीं है। गांव में निगरानी और नियम समाजसेवियों और कुछ परिवारों की मदद से आसपास के गांवों या रिश्तेदारों के परिवारों में लड़कियों की औपचारिक सगाई कराई जाती है। इन लड़कियों की उम्र 7 से 12 साल तक होती है। गांव वालों ने आपसी सहमति से एक अनलिखा नियम बनाया है। सगाई या शादी हो चुकी लड़कियों को देह व्यापार में नहीं धकेला जाता। गांव में आने वाले लोगों पर भी नजर रखी जाती है। हाल ही में गर्म दोपहर में खाट पर बैठे कुछ पुरुष हर नए व्यक्ति से उसके आने की वजह पूछ रहे थे। रंग-बिरंगे घाघरा-चोली पहने कुछ महिलाएं गांव के बाहर थीं। इनमें सगाईशुदा, शादीशुदा और देह व्यापार छोड़ चुकीं बुजुर्ग महिलाएं शामिल थीं। एक ग्रामीण के मुताबिक, देह व्यापार में शामिल महिलाएं ज्यादातर घरों के अंदर रहती हैं। परिवार के पुरुष या दलाल उनके लिए ग्राहक तलाशते हैं। गांव की करीब 750 लोगों की आबादी में लगभग 350 महिलाएं हैं। पितृत्व की पहचान को लेकर लगे कलंक के कारण वाडिया की महिलाएं पीढ़ियों तक अविवाहित रहीं। कम उम्र में सगाई से बेटियों को बचाने की कोशिश चंद्रा सरानिया ने बताया कि जब वह अपनी बेटी की शादी करना चाहती थीं, तो लोगों ने उन्हें इसे लड़कियों की किस्मत मानने को कहा। उन्होंने कहा, “मुझसे कहा गया कि विद्रोह मत करो और यहां की लड़कियों की किस्मत स्वीकार कर लो। मैंने अपनी बेटी की 12 साल में सगाई और 18 साल में शादी कराई।” उन्होंने बताया कि सगाई पक्की करने के लिए लड़के के परिवार ने 1 रुपए और बेटी को कुछ कपड़े दिए थे। चंद्रा को 15 साल की उम्र में देह व्यापार में धकेला गया था। अब वह छोटी डेयरी चलाती हैं। सरकार ने 1963 में उनके परिवार को खेती की जमीन दी थी। लेकिन गांव में सिंचाई की सुविधा नहीं थी। इसी वजह से उन्हें देह व्यापार में जाना पड़ा। चंद्रा ने देह व्यापार से हुई कमाई से तीन बच्चों का पालन-पोषण किया। इनमें दो बेटे और एक बेटी है। वह नहीं चाहती थीं कि उनके अतीत का असर उनके बच्चों के भविष्य पर पड़े। खासकर, वह अपनी बेटी को इस धंधे से दूर रखना चाहती थीं। 2012 से सामूहिक शादी और सगाई 2012 में बदलाव की एक शुरुआत हुई। गैर-सरकारी संगठनों ने कुछ परिवारों को बेटियों को देह व्यापार में न धकेलने के लिए मनाया। इसके बाद गांव में पहली सामूहिक शादी कराई गई। तब से वाडिया में हर साल सामूहिक शादी या सगाई का आयोजन हो रहा है। सामूहिक शादी की पहल करने वाले गैर-सरकारी संगठन विचरता समुदाय समर्थन मंच (VSSM) की संस्थापक मित्तल पटेल ने कहा कि इससे कई लड़कियों को जबरन देह व्यापार से बचाया गया। पटेल ने कहा, “परिवारों को बेटियों को इस धंधे में भेजने से रोकना आसान नहीं था। हमें छिपकर साहूकार बने घूमने वाले दलालों का सामना करना पड़ा।” उन्होंने कहा, “समाज को इस गलत प्रथा के बारे में जागरूक किया गया। माता-पिता से बच्चों को पढ़ाने की अपील की गई।” पटेल ने बताया कि गांव में पहली सामूहिक शादी कराई गई। 160 में से 90 परिवारों को यह धंधा छोड़ने के लिए तैयार किया गया। उन्होंने कहा, “बदलाव आसान नहीं था। लेकिन लड़कियों को इस धंधे से बचाने के लिए लगातार काम करना पड़ा।” पटेल के मुताबिक, सगाई होने के बाद लड़के का परिवार भी लड़की की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारी लेने लगता है। उन्होंने बताया कि बोरवेल और तालाबों को फिर से उपयोगी बनाने, खेती की जमीन को सुधारने और परिवारों को बिना ब्याज कर्ज देने जैसे काम किए गए। इन कर्जों से परिवारों को अपना कारोबार शुरू करने में मदद मिली। इन प्रयासों का मकसद 12-13 साल की लड़कियों को देह व्यापार में धकेले जाने से रोकना है। पटेल ने कहा कि कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बाल विवाह को बढ़ावा देने को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि बाल सगाई देह व्यापार से बेहतर है। यह शादी न होने और सम्मानजनक जिंदगी न मिलने से भी बेहतर विकल्प है। पढ़ाई और बेहतर जिंदगी की उम्मीद कुछ माता-पिता अपनी बेटियों को पढ़ाई और बेहतर जिंदगी का मौका देने के लिए भी सगाई करा रहे हैं। रमेशभाई सरानिया की दो बेटियां हैं। उन्होंने एक की सगाई 8 साल और दूसरी की 11 साल की उम्र में कराई। उन्होंने बताया कि दोनों बेटियों की अब शादी हो चुकी है। दोनों ने अपनी स्कूली पढ़ाई भी पूरी की है। रमेशभाई ने कहा, “मैंने अपने भाई से भी झगड़ा किया, ताकि उसकी बेटियां इस धंधे में न जाएं।” उन्होंने बताया कि गांव के नाम से जुड़े कलंक के कारण आज भी उनकी बेटियों के लिए दूल्हे तलाशना मुश्किल होता है। उन्होंने कहा, “फिर भी यह उन्हें देह व्यापार में जाने देने से बेहतर है।” वाडिया के नाम से जुड़ा पुराना कलंक लोककथाओं के मुताबिक, सरानिया समुदाय एक घुमंतू जनजाति है। यह समुदाय कभी मेवाड़ के महाराणा प्रताप की सेना के साथ घूमता था। पुरुष ढाल और तलवार जैसे हथियारों को धार देते थे। महिलाएं सैनिकों का मनोरंजन करती थीं। कहा जाता है कि 1947 में भारत की आजादी के बाद सरानिया समुदाय के पास काम नहीं रहा। आजीविका के विकल्प न होने के कारण वे फिर देह व्यापार की ओर लौट गए। वाडिया के लोग आज भी इस अतीत से जूझ रहे हैं। वे गांव से जुड़े ‘वेश्याओं के गांव’ के टैग को हटाने की कोशिश कर रहे हैं।
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गुजरात के बनासकांठा के वाडिया गांव में बदलाव:बेटियों को देह व्यापार से बचाने के लिए 7 साल की उम्र में सगाई, 18 में शादी
