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चंडीगढ़ में 54 ग्राम हेरोइन बरामदगी के मामले में दोषी ठहराए गए अबिनाश को एनडीपीएस एक्ट की स्पेशल कोर्ट ने बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने उसे दोबारा जेल भेजने के बजाय पहले ही जेल में बिताई अवधि को उसकी पूरी सजा मान लिया। 6 साल तक नियमित रूप से कोर्ट में पेश होने, इस दौरान किसी दूसरे अपराध में शामिल नहीं होने और खुद को सुधारने के प्रयासों को अदालत ने राहत का आधार बनाया। जज रमन गोखलेनी ने कहा कि एक गलती के आधार पर किसी व्यक्ति को आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता। आपराधिक न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को सुधारकर समाज की मुख्यधारा में वापस लाना भी है। 6 साल में एक भी सुनवाई मिस नहीं की अदालत ने अबिनाश के पिछले छह साल के आचरण को विशेष रूप से ध्यान में रखा। कोर्ट के मुताबिक, वह मामले की सुनवाई के दौरान लगातार नियमित रूप से पेश होता रहा। उसने किसी भी सुनवाई से बचने की कोशिश नहीं की और न ही किसी तारीख पर गैरहाजिर रहा। इतने लंबे समय तक केस चलने के बावजूद उसके खिलाफ किसी अन्य आपराधिक गतिविधि में शामिल होने की बात सामने नहीं आई। अदालत ने माना कि इस अवधि में अबिनाश ने अपने व्यवहार में सुधार किया। उसने ईमानदारी से काम किया और सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश की। कोर्ट के सामने ऐसा कोई साक्ष्य भी नहीं था, जिससे यह साबित हो कि वह नशीले पदार्थों की बिक्री, सप्लाई या तस्करी में शामिल रहा हो। 2020 में 54 ग्राम हेरोइन के साथ पकड़ा था यह मामला वर्ष 2020 का है। पुलिस ने सेक्टर-23 निवासी अबिनाश को 54 ग्राम हेरोइन के साथ गिरफ्तार किया था। उसके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने उसे दोषी करार दिया। इसके बाद जब सजा तय करने की बारी आई तो कोर्ट ने उसके मौजूदा आचरण और पिछले छह वर्षों के रिकॉर्ड को भी देखा। कोर्ट ने माना कि दोषसिद्धि के बाद सजा का उद्देश्य केवल व्यक्ति को जेल भेजना नहीं होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक अपराध से दूर रहा है और अपने जीवन को सुधारने की कोशिश कर रहा है तो उसके पुनर्वास के पहलू को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता जज रमन गोखलेनी ने टिप्पणी की कि अबिनाश से यह गलती कम उम्र में हुई थी। केवल इस एक घटना के आधार पर उसे आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के पूरे आचरण को केवल एक आपराधिक मामले के आधार पर तय नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब वह बाद के वर्षों में अपराध से दूर रहा हो। अदालत ने यह भी कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य दोषी व्यक्ति को सुधारने का अवसर देना और उसे समाज की मुख्यधारा में वापस लाना है। इस मामले में पिछले छह वर्षों के दौरान अबिनाश का व्यवहार इस दिशा में उसके प्रयास को दिखाता है। सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा है अबिनाश ने अदालत के सामने अपने भविष्य को लेकर भी पक्ष रखा। उसने बताया कि वह अविवाहित है और सरकारी नौकरी हासिल करना चाहता है। उसका कहना था कि अगर उसे अब दोबारा जेल भेजा गया या लंबी सजा भुगतनी पड़ी तो उसके भविष्य पर इसका असर पड़ेगा। उसकी इस दलील को भी अदालत ने ध्यान में रखा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि अपने आप में उसके भविष्य में रोजगार पाने के रास्ते में बाधा नहीं बनेगी। जेल में बिताया समय ही माना पूरी सजा सभी परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने अबिनाश को दोबारा जेल भेजने के बजाय पहले ही जेल में बिताई गई अवधि को उसकी पूरी सजा मान लिया। इस तरह छह साल तक कोर्ट में नियमित पेशी, अपराध से दूर रहने और खुद को सुधारने के प्रयासों के आधार पर उसे आगे जेल में रहने से राहत मिल गई। कोर्ट की इस टिप्पणी का मूल आधार यह रहा कि सजा का मकसद केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास भी है। एक गलती के बाद अगर व्यक्ति लंबे समय तक अपने आचरण में सुधार करता है और अपराध से दूर रहता है तो उसे समाज में दोबारा सामान्य जीवन जीने का अवसर दिया जाना चाहिए।
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चंडीगढ़ में हेरोइन केस में 6 साल बाद राहत:जेल में बिताई अवधि पूरी सजा, एक गलती से किसी को आदतन अपराधी नहीं मान सकते
