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हम सभी को बचपन से यह सिखाया जाता है कि ‘कभी हार मत मानो।’ कुछ लोग इसे आदत बना लेते हैं। यह आदत पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अधिक नुकसान पहुंचा रही है। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक और लेखिका लिंडसे क्राउज बताती हैं कि जीवन में हर चुनौती से टकराने और बिना रुके काम करते रहने की जिद महिलाओं में ज्यादा पाई जाती है। क्राउज का दावा है कि महिलाएं लक्ष्य या जीत हासिल करने तक संघर्ष करती हैं या काम में जुटी रहती हैं। यह आदत महिलाओं को सफलता देने के बजाय थकान, एंग्जाइटी और निराशा में डाल रही है। वहीं, पुरुष कठिन परिस्थितियों और उच्च तनाव वाले माहौल से समय रहते पीछे हटने में हिचकिचाते नहीं हैं। यही रणनीति अक्सर उनके लिए करिअर और जीवन में अधिक फायदेमंद साबित होती है। बोस्टन में 2018 के मैराथन के डेटा और 10 लाख धावकों पर किए गए अध्ययन से पता चलता है कि कठिन मौसम में दौड़ बीच में ही छोड़ने वाले पुरुषों की संख्या ज्यादा रही, जबकि महिलाएं दर्द सहकर भी दौड़ पूरी करने में जुटी रहीं। मैस्कुलिनिटी (पुरुषत्व) पर शोध करने वाले रिचर्ड रीव्स बताते हैं कि आमतौर पर समाज में लड़कों को ज्यादा महत्व दिया जाता है। वहीं, लड़कियों को कुछ हालात से समझौता करना और चुनौतियों से निपटने वाली माना जाता है। लड़कियां कम उम्र से ही काम करना और निर्देशों का पालन करना सीखती हैं, जबकि लड़के जीतना और असफल रणनीति को छोड़ना सीखते हैं। इसका असर कॉर्पोरेट और कामकाजी दुनिया में साफ दिखता है। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट के अनुसार, 30,000 कर्मचारियों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि जब महिलाओं को प्रमोशन नहीं मिलता, तो वे उसी कंपनी में टिकी रहती हैं और कम वेतन में भी काम करती रहती हैं। दूसरी ओर, पुरुष ऐसी स्थिति में नौकरी छोड़ देते हैं, जिसके बदले उन्हें दूसरी जगह बेहतर पद मिलता है। क्राउज बताती हैं कि जो चीजें काम नहीं कर रही हैं, उन्हें छोड़ना (क्विटिंग) ही बेहतर विकल्प खोजने का तरीका है। जीवन की सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि कोई कितनी देर तक टिक सकता है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह सही समय पर पीछे हटकर सही दिशा कैसे चुनता है। लड़कियों से काम पर ध्यान देने की उम्मीद, लड़कों से जीतने की कॉग्निटिव साइकोलॉजिस्ट्स के अध्ययन में बताया गया है कि जब बच्चों को ऐसे टीचिंग मेथड मिले, जो काम नहीं कर रहे थे, तब लड़कों ने जल्दी उस तरीके को छोड़ दिया। वे बेहतर विकल्प खोजने लगे। लड़कियां निर्देशों का पालन करती रहीं। तब भी, जब वही निर्देश उन्हें फेल करा रहे थे। इस अध्ययन का उदाहरण देते हुए क्राउज कहती हैं कि लड़कियां काम करना सीखती हैं। लड़के जीतना सीखते हैं। आगे चलकर महिलाएं हाई स्कूल और कॉलेज ज्यादा दर से पूरा करती हैं। फिर भी कॉर्पोरेट नौकरियों में उनकी संख्या कम है।
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टिके रहने की आदत करिअर और सेहत पर भारी:पुरुष मुश्किल देखकर पीछे हट जाते हैं, महिलाएं लक्ष्य पाने तक संघर्ष करती हैं
