![]()
कार्यस्थल पर काम की असली खुशी सहकर्मियों से बातचीत, मिलकर सोचने, बहस करने और गलतियों से सीखने की प्रक्रिया में है। लेकिन अब अति-दक्षता के चक्कर में इंसानी संबंध खत्म हो रहा है। ऑटोमेशन की वजह से काम अब नीरस असेंबली-लाइन बनकर रह गया है। टेक और नॉलेज सेक्टर में इसका सबसे ज्यादा असर है। अमेरिका के लॉस एंजलिस स्थित रिसर्च मैग्जीन ‘नोएमा’ में प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, जैसे रेफरी की इंसानी गलतियां भी खेल को और मजेदार बनाती हैं, वैसे ही दफ्तर का माहौल सहकर्मियों के साथ सीखने से जीवंत बनता है। लेकिन जब सिर्फ नतीजों और ऑटोमेशन को महत्व दिया जाता है, तो काम का आनंद खत्म हो जाता है और सहकर्मियों से दूरी उदासी और निराशा में बदलने लगती है। ऑटोमेशन ऑपरेशन्स विशेषज्ञ एरॉन हॉरवाथ के मुताबिक, अति-दक्षता और ऑटोमेशन की अंधी दौड़ में दफ्तरों से बातचीत और सहकर्मियों के आपसी संबंधों के अवसर कम होते जा रहे हैं। इससे कर्मचारी तेजी से मानसिक तनाव और निराशा का शिकार हो रहे हैं। ऑटोमेशन का असर – विशेषज्ञों के अनुसार, जब से कंपनियों ने हर काम का ऑटोमेशन यानी मशीनीकरण कर दिया है, तब से इंसानी रचनात्मकता पर ताला लग गया है। अब रणनीति बनाने से लेकर प्रजेंटेशन तक का काम मशीनें पलक झपकते ही कर रही हैं। ऐसे में कर्मचारी सोच रहे हैं कि अगर काम का बड़ा हिस्सा मशीन कर रही है, तो मेरी भूमिका और मेरे काम की अहमियत क्या है? इससे सह-कर्मियों का एक-दूसरे का साथ भी छूट रहा है। अनुभवी कर्मियों पर ज्यादा असर – हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की प्रोफेसर टेरेसा अमाबिल के ‘आंतरिक प्रेरणा सिद्धांत’ के अनुसार, इंसान सबसे बेहतरीन और रचनात्मक काम तब करता है, जब वह काम की प्रक्रिया, चुनौती और सहकर्मियों के साथ का आनंद लेता है। जब कंपनियों में सिर्फ नतीजों को प्राथमिकता दी जाती है और सहयोग खत्म हो जाता है, तो रचनात्मकता मर जाती है। जो कर्मचारी केवल बिजनेस के बजाय काम के अनुभव को महत्व देते हैं, उनके लिए दफ्तर में और नौकरी में टिके रहना मुश्किल होता जा रहा है। वर्किज्म का भ्रम टूटा – ‘काम ही पूजा है’ का विचार पुराना हुआ अमेरिकी लेखक व पत्रकार डेरेक थॉम्पसन ने 2019 में ‘वर्किज्म’ को नई परिभाषा दी थी। इसमें काम को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य और धर्म मानने को गौरवान्वित माना गया था। लेकिन अब ऑटोमेशन के दौर में यह गुब्बारा फूट चुका है। समाजशास्त्री डेविड ग्रेबर के अनुसार, कर्मचारियों को अब लग रहा है कि उनके कॉर्पोरेट काम का कोई वास्तविक सामाजिक या मानवीय मोल नहीं है। यही वजह है कि उच्च वेतन पाने वाले टेक प्रोफेशनल्स भी अब क्रोशिया बुनाई, मिट्टी के बर्तन बनाने या पेंटिंग जैसे शौक अपना रहे हैं। कई पेशेवर तो नौकरी छोड़कर दूर-दराज के इलाकों में खेती करने का सपना देख रहे हैं।
Source link
टेक जगत में खत्म हो रही है काम की खुशी:विशेषज्ञों का दावा- अति-दक्षता की दौड़ में दफ्तरों से इंसानी बातचीत के अवसर गायब
