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तसर उत्पादन से लाखों की कमाई कर रहे किसान:पारंपरिक हुनर और वैज्ञानिक तकनीक से रेशम का उत्पादन, चार हजार किसान जुड़े




गिरिडीह के बेंगाबाद में तसर कभी जंगल और अर्जुन के पेड़ों तक ही सीमित था। अब यह बेंगाबाद प्रखंड के किसानों के लिए रोजगार, आत्मनिर्भरता और अच्छी कमाई का जरिया बन गया है। तसर के कीट पालन से लेकर कोकून उत्पादन और फिर रेशमी धागे व कपड़े बनने तक की पूरी प्रक्रिया से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है। बेंगाबाद के बासजोर क्षेत्र में किसान पारंपरिक अनुभव के साथ वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर तसर उत्पादन को आय का मुख्य जरिया बना रहे हैं। तसर उत्पादन की शुरुआत कीट के अंडों से होती है। किसानों को अंडे उपलब्ध कराने से पहले उन्हें वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया जाता है। करीब सातवें दिन किसानों को अंडे दिए जाते हैं। लगभग नौवें दिन उनसे कीट के बच्चे निकलते हैं। इसके बाद किसान इन कीटों का पालन अर्जुन समेत दूसरे पेड़ों पर करते हैं। पहला क्रॉप करीब 30 दिनों में तैयार होता है कीट पत्तियों पर बढ़ते हुए कुछ ही समय में अपने चारों ओर रेशम का कोकून तैयार कर लेते हैं। तसर पालन का पहला क्रॉप करीब 30 दिनों में तैयार होता है। दूसरे क्रॉप में 45 से 60 दिनों तक का समय लगता है। तैयार कोकून को प्रोजेनी प्रोडक्शन सेंटर (पीपीसी) भेजा जाता है। यहां तितली निकलने के बाद कोकून को झारक्राफ्ट और दूसरी इकाइयों तक भेजा जाता है। इसके बाद कोकून से रेशमी धागा तैयार किया जाता है। इससे अलग-अलग तरह के कपड़े और हस्तशिल्प उत्पाद बनाए जाते हैं। बेंगाबाद में स्थित पीपीसी केंद्र तसर उत्पादन की पूरी प्रक्रिया में अहम भूमिका निभा रहा है। केंद्र के जरिए किसानों को कीट पालन, कोकून उत्पादन, रोग नियंत्रण और अच्छी गुणवत्ता वाली तकनीकों की जानकारी मिलती है। 30 किसानों ने तसर पालन को अपनी आजीविका का जरिया बनाया बेंगाबाद प्रखंड में करीब चार हजार किसान तसर उत्पादन से जुड़े हैं। वहीं बासजोर क्षेत्र के लगभग 30 किसान सीधे तौर पर तसर पालन को अपनी आजीविका का जरिया बनाया है।
किसानों का कहना है कि मेहनत, सही तकनीक और बाजार की सुविधा मिलने पर तसर पालन से सालाना लाखों रुपये तक की आमदनी की जा सकती है। तसर किसान कैलास मंडल और मेरुलाल बास्की के अनुसार, पहले क्रॉप से करीब 50 से 60 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है, जबकि दूसरे क्रॉप में मेहनत और उत्पादन के अनुसार दो से तीन लाख रुपये तक की आमदनी संभव है। किसानों का कहना है कि जितनी मेहनत और बेहतर देखभाल की जाती है, उत्पादन और कमाई भी उसी अनुपात में बढ़ती है।



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