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धान की फसल पर 'कंडुआ रोग' का खतरा:जिला कृषि पदाधिकारी ने जारी की एडवाइजरी, जानें लक्षण और बचाव के उपाय




जिला कृषि अधिकारी (डीएओ) ने किसानों को धान की फसल को फॉल्स स्मट (कंडुआ) रोग से बचाने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि इस रोग की पहचान कर समय पर इसका नियंत्रण करना बहुत जरूरी है। यह रोग धान की बालियों को खराब करता है। इसमें दानों की जगह पीले-नारंगी से हरे-काले रंग के फफूंद वाले पिंड बन जाते हैं। डीएओ ने किसानों से फसल की लगातार निगरानी करने और रोग के लक्षण दिखने पर कृषि विभाग के विशेषज्ञों से सलाह लेने को कहा है। इस रोग से होने वाला नुकसान हर खेत में अलग-अलग होता है। अगर रोग का असर हल्का है, तो नुकसान कम होता है, लेकिन ज्यादा असर होने पर काफी नुकसान हो सकता है। रोगग्रस्त पिंडों के कारण धान की क्वालिटी खराब हो जाती है। संक्रमित दाने और फफूंद वाले पिंडों के मिलने से फसल का बाजार भाव गिर सकता है। बीज बनाने वाले खेतों में खास सावधानी बरतनी चाहिए। फॉल्स स्मट रोग के बीजाणु खेत और फसल के बचे हुए हिस्सों में रह सकते हैं। संक्रमित खेत से मिले बीज या फसल के अवशेषों से अगली फसल में भी रोग का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए स्वस्थ बीज का इस्तेमाल और खेत की सही साफ-सफाई जरूरी है। इस रोग का नाम फॉल्स स्मट या धान का कंडुआ रोग है। यह Ustilaginoidea virens नाम के फफूंद से फैलता है। यह धान की बालियों और दानों को खराब करता है। इसकी पहचान यह है कि सामान्य दानों की जगह पीले, नारंगी या हरे-काले रंग के फफूंद वाले गोल पिंड बन जाते हैं। रोग बढ़ने पर ये पिंड हरे रंग के हो जाते हैं और इनका आकार भी बढ़ जाता है। बाद में इन पिंडों पर हरे-काले रंग के बीजाणु बनते हैं। संक्रमित बाली में स्वस्थ दानों की संख्या और क्वालिटी पर असर पड़ सकता है। इस रोग के बढ़ने के मुख्य कारण हैं: धान में बालियां निकलने और फूल आने के समय ज्यादा नमी। लगातार बादल छाए रहना, बारिश होना और खेत में नमी बने रहना। नाइट्रोजन या यूरिया का ज्यादा और असंतुलित इस्तेमाल। घनी फसल और खेत में हवा का कम आना-जाना। साथ ही, संक्रमित खेत से मिले बीज या फसल के अवशेषों के कारण भी यह रोग फैलता रहता है।



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