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उत्तर प्रदेश और पंजाब दो अहम राज्य हैं, जहां चुनाव होने वाले हैं। तमाम राजनीतिक पार्टियां इन चुनावों के लिए ही अपनी कमर कस रही हैं। नए-नए प्रभार गढ़े जा रहे हैं और नए-नए प्रभारी बनाए जा रहे हैं। हर तरह से, हर तरफ जोर-शोर से तैयारी की जा रही है। अगर कोई बेफिक्र बैठा है, अगर कोई किसी तरह की तैयारी नहीं कर रहा है तो वो हैं हम।
आम लोग! आम वोटर्स! क्योंकि हमें कोई कुछ भी कहे- अन्नदाता, जनता जनार्दन और भी बहुत कुछ- पर हकीकत यह है कि हर दो, ढाई या पांच साल में होने वाले चुनावों के हम मालिक नहीं हैं। हमने अपने मन को आजादी दी है तो सिर्फ इतनी, कि अपनी मर्जी से चुनाव कर लें अपने पिंजरे का। रहना हमें कैद में ही है। हर तरह के कैदखाने हैं देश में…
और हर तरह की कैदें।
बच्चे अपनी वजन बढ़ाऊ किताबों की बस्ताई शिक्षा में कैद हैं। बेटियां अपनी सुरक्षा के खतरे के कारण खुद में ही कैद रहने को मजबूर हैं। और महिलाओं, बुजुर्गों की कैदों का तो पारावार नहीं है। तथाकथित सभ्य समाज इन कैदों को घर, ऑफिस, मुहल्ला, खेत, खलिहान, सड़क, बाजार और जाने क्या-क्या कहता है। जब हर कोई कैद है, अलग-अलग कैदखानों में, फिर कैसी आजादी, कैसा लोकतंत्र, कैसा चुनाव?
अगर ये पार्टियां, ये नेता, सच में चुनाव जीतना चाहते हैं तो हमें इन कैदखानों से मुक्ति दिला दें। फिर करें राज। चतुर्दिक। एकतरफा। फिर किसी भी नेता को वोट के लिए गिड़गिड़ाना नहीं पड़ेगा। लोग खुद ही चुन लेंगे अपने मुक्तिदाता को।
लेकिन सच ये है कि अंग्रेजों के जाने के बाद ये जो मौजूदा कैदखाने हैं, इनमें से ज्यादातर का निर्माण राजनीति ने ही किया है। और चौंकने की कोई वजह हमारे पास नहीं है, क्योंकि हर कैदखाने के उद्घाटन के वक्त बड़े मजे से तालियां भी हमने ही बजाई हैं। सभ्य समाज कहा जाने वाला बड़ा कैदखाना जरूर हमने खुद बनाया है। दकियानूसी सोच की गलत परंपराओं की कई शाखाएं भी खोली हैं, जिनमें हमारा बचपन, जवानी और वृद्धावस्था कैद है।
चुनाव के वक्त भी ये कैदें काम करती हैं। जातिवाद की कैद सबसे बड़ी और लंबी है। फिर गांव, शहर, पंचायत, सरपंच, पटेल, रिश्तेदारों का क्षेत्रवाद अलग कैदखाने गढ़ता है। चुनाव के वक्त ये कैदें कानों में गूंजती हैं या कहिए कान फोड़ती हैं। जैसे ठण्ड के मौसम में हवा आवाज करती है- दांतों में कंघी रखकर। कुछ फटी-फटी… झीनी-झीनी… बालिग होते लड़कों की तरह।
वोट देते वक्त तो ये आवाजें और भी ऊंची होती हैं, जैसे दरिया के दो किनारों पर खड़े होकर देहात के दो दोस्त गांवभर के हाल पूछ रहे हों। जब तक हम इन कैदों, इन बेड़ियों को तोड़कर वोट नहीं देंगे, सरकारें ऐसी ही आती रहेंगी। बेमुरौव्वत और आलसी।
जनप्रतिनिधि ऐसे ही रहेंगे। लालची और गिरोहबाज। दरअसल, हम इन बेड़ियों, इन कैदों के आदी हो चुके हैं। सरकार भ्रष्ट नहीं हो, तो हमें लगता है काम जल्दी नहीं होंगे। व्यवस्था दुरुस्त हो जाए तो हमें लगता है काम पक्का नहीं होगा। और जनप्रतिनिधि लालची या गिरोहबाज नहीं हो, तो लगता है सीधा यानी कमजोर होगा। वोट बेचकर अच्छी सरकार का सपना देखने वाली मानसिकता से बाहर आना होगा, वरना हम ऐसे ही पिसते रहेंगे। व्यवस्था ऐसे ही चलती रहेगी और सरकारें यूं ही आती-जाती रहेंगी- घपले-घोटाले करते हुए। सच को दबाते हुए। ईमानदारी को धकियाते हुए और जनता को किनारे करते हुए। हमारी हालत ऐसी ही रहेगी, जैसी अभी है। बिजली के पुराने, जंग-आलूदा, पान खाए दांतों की तरह, जैसे फ्यूज प्लेटें लगी रहती हैं।
वो जो एक मियाद होती है, दवाओं की शीशियों पर लिखी हुई। दवा लेते वक्त ज्यादातर लोग उसे ही देखते हैं। मियाद बीत जाए तो बेअसर हो जाती है दवा। कभी- कभी जहरीली भी। आप पार्टी जब नई-नई आई थी तो उसे देखकर कुछ हद तक लगा था कि पुरानी ज्यादातर पार्टियों की मियाद बीत चुकी है। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। पुरानी पार्टियां जमती, बढ़ती गईं और उनकी तगड़ी जमावट ने आप पार्टी की बरात निकाल दी। दरअसल, राजनीति एक ऐसी संस्कृति है, जिसमें रिश्तों का, भावनाओं का, काया का अपमान इन तमाम शब्दों से अनजान रहते हुए किया जाता है।
कुल-मिलाकर यह संस्कृति भावनाओं के शून्य की प्रतीक है।
…और जहां भावनाएं नहीं होतीं, वहां अपमान के सिवाय कुछ नहीं होता। हम ही इन बेड़ियों, इन कैदों के अब आदी हो चुके हैं…
दरअसल, हम इन बेड़ियों, इन कैदों के आदी हो चुके हैं। सरकार भ्रष्ट नहीं हो, तो हमें लगता है काम जल्दी नहीं होंगे। व्यवस्था दुरुस्त हो जाए तो हमें लगता है काम पक्का नहीं होगा। और जनप्रतिनिधि लालची या गिरोहबाज नहीं हो, तो लगता है सीधा यानी कमजोर होगा।
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नवनीत गुर्जर का कॉलम:कोई हमें अन्नदाता कहे या जनता जनार्दन, पर चुनावों के हम मालिक नहीं हैं
