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परफेक्ट सुंदरता का पैमाना दे रहा डिप्रेशन:फेशियल स्कैन का स्कैम; महिलाओं के चेहरे में कमी बता ट्रीटमेंट सुझा रहे एप




37 साल की डेनियल मॉडल हैं, बीते कुछ दिनों से उनके पास काम के मौके घटने लगे। मन में सवाल उठा…‘क्या सुंदर दिखने से मुझे मॉडलिंग में ज्यादा मौके मिल सकते हैं?’ अनिश्चितता के इसी दौर में उनके सोशल मीडिया फीड पर ‘फेशियल एनालिसिस’ कंपनियों के विज्ञापन तैरने लगे। दावा था कि यह सेवा विज्ञान पर आधारित है, चेहरे को परफेक्ट बना सकती है। डेनियल ने 32 हजार रुपए खर्च कर अपनी सेल्फी ‘कोव्स’ कंपनी को भेजी। कुछ दिनों बाद उन्हें 30 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट मिली, जिसमें उनके चेहरे, कानों के आकार का गणितीय विश्लेषण किया गया था। रिपोर्ट में राइनोप्लास्टी, चिन इम्प्लांट, गालों व जबड़ों में बोटोक्स और फिलर्स सहित कई कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं की सिफारिश की गई। अब डेनियल कर्ज चुकाने के बाद मैक्सिको जाकर सर्जरी कराने की योजना बना रही हैं। उन्हें लगता है कि सुंदरता का जो पैमाना उन्होंने तय किया है, उसे लाखों रुपए खर्च किए बिना पाना संभव नहीं है। इसी तरह पेरिस की ओसियन (25) बचपन से चेहरे को लेकर असुरक्षित महसूस करती थीं। उन्होंने भी कोव्स से रिपोर्ट मंगवाई। इससे कुछ राहत मिली, पर उनकी कथित शारीरिक कमियों को लेकर चिंता और असुरक्षा और बढ़ गई। एक्सपर्ट ने जब खुद कोव्स और एपिका एप का परीक्षण किया तो चौंकाने वाली बातें सामने आईं। एप पर सेल्फी अपलोड करने के बाद लेखिका लॉरा को विस्तृत विश्लेषण और 16 पन्नों का ‘ब्यूटी प्रोटोकॉल’ मिला। इसमें उनके चेहरे की परेशान करने वाली एआई तस्वीर थी, जिसमें दिखाया गया था कि बोटोक्स, लिप फिलर्स व तराशी हुई भौहों के बाद वे कैसी दिखेंगी। ‘एपिका’ एप पर उन्हें 61% ‘स्किन हेल्थ’ स्कोर दिया गया और असमान रंगत की समस्या बताकर महंगे सीरम के विज्ञापन दिखाए जाने लगे। पर जब लाइट बदलकर उन्होंने दोबारा सेल्फी ली, तो स्कोर बढ़कर 81% हो गया। वह कहती हैं,‘इन रिपोर्ट से पहले मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरा मुंह चौड़ा है या मुझे इतनी कम उम्र में बोटोक्स की जरूरत है। पर अब मैं शीशे में खुद को देखकर संकोच करने लगी थी।’ यूरोपीय सुंदरता के मानक सभी पर बेवजह थोपे जा रहे: एक्सपर्ट ओटावा यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ. ट्रेसी वेलैनकोर्ट और अर्कंसस यूनिवर्सिटी के डॉ. मिच ब्राउन कहते हैं,‘सुंदरता या आकर्षण को मापने का कोई सार्वभौमिक वैज्ञानिक पैमाना नहीं है। ऐसी कंपनियां वैज्ञानिक शोध का भ्रामक इस्तेमाल करती हैं। डॉ. ट्रेसी चेतावनी देती हैं कि बॉडी डिस्मॉर्फिया या ईटिंग डिसऑर्डर से जूझ रहे लोगों के लिए ऐसी रिपोर्ट्स मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं। साउथ कैरोलिना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जस्टिन मोगिल्स्की बताते हैं,‘सुंदरता संस्कृति और इलाके के हिसाब से बदलती है। जबकि कंपनियां विश्लेषणों में वैश्विक व सांस्कृतिक मानकों को नजरअंदाज करती हैं। इनके प्रचार में ज्यादातर यूरोपीय सुंदरता (जैसे पतली नाक, बड़ी आंखें) को आदर्श बताया है। जो महिलाएं इस पैमाने पर नहीं पहुंच पातीं, वे हीन महसूस करती हैं।’



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