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कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर क्षेत्र के ग्राम चौगेल (मुल्ला) स्थित पुनर्वास केंद्र में 28 अगस्त को रक्षाबंधन का त्योहार अलग अंदाज में मनाया गया। यहां आत्मसमर्पित माओवादियों ने डीआरजी जवानों की कलाई पर राखी बांधी। कभी जंगल में एक-दूसरे के सामने रहने वाले लोग अब भाईचारे और विश्वास के धागे से जुड़ते नजर आए। पुनर्वास केंद्र में हुआ यह आयोजन हिंसा छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ने की नई तस्वीर दिखाता है। आत्मसमर्पित माओवादी अब हथियार की जगह हुनर सीख रहे हैं और सामान्य जिंदगी की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। शांति कवाची का पहला रक्षाबंधन आत्मसमर्पित माओवादी शांति कवाची ने बताया कि, यह उनका पहला रक्षाबंधन है। मुख्यमंत्री कौशल विकास प्रशिक्षण के तहत उन्होंने राखी बनाना सीखा। अपने हाथों से बनाई राखी जब उन्होंने पुलिस जवानों की कलाई पर बांधी तो उनके लिए यह पल बेहद खास और भावुक था। उन्होंने कहा कि आत्मसमर्पण के बाद उन्हें महसूस हुआ कि वह वास्तव में समाज की मुख्यधारा में लौट आई हैं। शांति कवाची ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का आभार जताते हुए कहा कि नक्सल पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर उन्होंने आत्मसमर्पण का फैसला लिया। सिलाई से लेकर राखी बनाने तक प्रशिक्षण पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पित माओवादियों को सिलाई, काष्ठ शिल्प और राखी निर्माण जैसे कामों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य उन्हें आगे सम्मानजनक तरीके से आजीविका चलाने और परिवार के साथ सामान्य जीवन जीने के लिए सक्षम बनाना है। DRG जवान बोले- पहले आमने-सामने, अब राखी के धागे से जुड़े डीआरजी जवान टेकेश्वर हिचामी ने कहा कि पहले दोनों पक्ष बंदूक लेकर एक-दूसरे के सामने खड़े होते थे। आज वही हाथ राखी के पवित्र धागे से जुड़ गए हैं। उन्होंने कहा कि राखी भाई की लंबी उम्र और सुख-शांति की कामना का प्रतीक है। संघर्ष से शांति की ओर बदलाव यह रक्षाबंधन सिर्फ एक त्योहार नहीं रहा, बल्कि बदलाव की कहानी भी बना। कभी संघर्ष का हिस्सा रहे लोग अब विश्वास और भाईचारे के रिश्ते को स्वीकार कर रहे हैं। पुनर्वास और कौशल विकास के जरिए आत्मसमर्पित माओवादी हथियार छोड़कर हुनर के साथ नई जिंदगी शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
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पहले जंगल में बंदूकें थीं,अब राखी का रिश्ता:कांकेर में सरेंडर नक्सलियों ने DRG जवानों को बांधी राखी, शांति बोली- यह मेरा पहला रक्षाबंधन
