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ब्लैकबोर्ड-नाचने से ज्यादा किसी के साथ सोकर कमा लेगी:बेटी को देखकर बोला- इसे भी साथ लाना; वो डांसर जो बिन शादी के मां बन गईं




रात करीब डेढ़ बजे का वक्त था। तेज आवाज में गाने बज रहे थे। मैं घाघरा-चोली पहने स्टेज पर थी। 100 मर्दों के बीच नाच रही थी। तीन घंटे से नाचते-नाचते शरीर थक चुका था। भीड़ से एक मर्द स्टेज पर चढ़ आया। दुपट्टा खींचा और कमर में हाथ डाल दिया। मैं घबरा गई। खुद को संभालते हुए उसे धक्का दिया। उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी ओर खींच लिया। मैंने जोर से धक्का देकर उसे स्टेज से नीचे गिरा दिया। फिर नाचने लगी। 15 मिनट बाद वो फिर स्टेज पर आया और घाघरे पर ब्लेड मार दिया। मैं कुछ समझ पाती उससे पहले ही उसने दूसरा वार बांह पर किया। एक गहरा घाव हुआ और खून बहने लगा। मेरी चीख सुनकर तो भीड़ से कुछ लोग आए और उसे उठा ले गए। मेरा पूरा शरीर अभी भी कांप रहा था। लगातार खून बह रहा था। लोग चिल्लाने लगे- ‘भूरी बाई, नाचना क्यों बंद कर दिया,पैसे तो पूरी रात के दिए है।’ मैं स्टेज के पीछे की तरफ भागी तो रेखा बाई ने डंडा दिखाते हुए कहा- ‘अगर तेरे पैर रुके, डंडे मार-मार के हड्डियां तोड़ दूंगी। तेरी बेटी को भी इसी स्टेज पर नचाऊंगी।’ रेखा बाई हम जैसी नाचने वालों की मुखिया है। बुकिंग, पैसों का लेन-देन, खाना-पीना; सब वही देखती है। रेखा बाई की डांट सुनते ही मैंने दुपट्टे का किनारा फाड़कर बाजू में बांधा और स्टेज पर चढ़ गई। फिर पूरी ताकत से नाचने लगी। स्टेज पर इस तरह के व्यवहार का इकलौता किस्सा नहीं है। ऐसा मेरे साथ न जाने कितनी बार हुआ, क्योंकि मैं एक राई डांसर हूं। राई डांसर भूरी बाई। ब्लैकबोर्ड में मैं नीरज झा आज कहानी लेकर आया हूं ऐसी डांसर की, जिसने अपनी बेटी को डांसर नहीं बनने दिया… भूरी बाई से मिलने मैं मध्यप्रदेश के रायसेन-सागर रोड पर बसे जमुनिया गांव में उनके घर पहुंचा। छप्पर की छत वाला दो कमरे का कच्चा मकान। छत इतनी नीचे की बिना सिर झुकाए खड़े नही हो सकते। आवाज देने पर भूरी बाई ने अंदर आने को कहा। आसमानी रंग की साड़ी। दोनों हाथ में हरी-हरी चूड़ियां, माथे पर लाल रंग की बिंदी और मांग में सिंदूर। जैसे कोई शादीशुदा औरत हो। मैंने पूछा- कितने साल हो गए डांस करते हुए। वो धीरे से बोलीं- ‘इतनी गिनती तो आती नहीं है, लेकिन जब 12 साल की थी तबसे नाचना शुरू किया। पापा को मर्डर केस में उम्रकैद हो गई थी। घर में कोई कमाने वाला नहीं था। भरपेट खाना नहीं मिलता था। बगल में रेखा दीदी रहती थीं। अक्सर शाम में घाघरा-चोली पहनकर कहीं जाया करती थीं और सुबह घर लौटती थीं। पूछने पर कहती थीं कि पैसे कमाने जाती हूं। एक दिन घर में राशन नहीं था। सुबह से सब भूखे थे। दिमाग में बस यही बात चल रही थी कि क्या करें जिससे कुछ पैसे मिलना शुरू हो जाएं। घर से बाहर निकली तो देखा रोज की तरह घाघरा-चोली पहने रेखा दीदी कमाने जा रही थीं। मैंने पूछा- मुझे भी कोई काम दिलवा दोगी क्या? घर में आटा तक नहीं बचा, सब भूखे बैठे हैं।’ वो फौरन बोलीं- ‘चल जल्दी। देरी हुई तो पैसे कट जाएंगे।’ चलते–चलते रास्ते में मैंने पूछा- करना क्या होगा? वो बोलीं- ‘नाचना है, जैसे-जैसे हम करेंगे, तू भी वैसे ही करना। आज के लिए तो ये कपड़े ठीक हैं, अगली बार घाघरा-चोली पहनकर चलना।’ रातभर नाचने के 150 रुपए मिले। सुबह घर लौटी तो पैसे मां को देते हुए कहा- सबके लिए रोटी बना लो। उसी दिन से सिलसिला शुरू हो गया। पैरों में आधा-आधा किलो के घूंघरू बांधकर रातभर नाचती। पूरा बदन टूट जाता। दर्द की दवाई खाकर अगले दिन के लिए फिर तैयार हो जाती। शुरू में मां ने रोका। कहती थी-‘अभी बच्ची हो, बड़ी होगी, तो सब गंदी नजरों से देखेंगे। गलत तरीके से छुएंगे। जिंदगी नरक हो जाएगी।’ मैं मां की ये बात हर बार टाल देती। कहती- खाने के लिए पैसा तो कमाना पड़ेगा। अब जिसके घर में खाना न हो, उसको ये सब बातें कैसे समझ आतीं। बड़ी हुई तो मां की सब बातें सच होने लगीं। एकबार मैं डांस के लिए तैयार हो रही थी। अचानक एक आदमी कमरे में घुस आया। कहने लगा- ‘आज की रात मेरे साथ बिताओ। तीन दिन नाचने का जितना पैसा मिलता है उसका दोगुना दूंगा।’ ये कहते हुए वो मेरी तरफ बढ़ा। मैं घबराकर भागी, लेकिन उसने दुपट्टा पकड़ लिया। मैं जोर-जोर से चीखकर मदद मांगने लगी। आवाज सुनकर दो-तीन लोग वहां आए और उस आदमी को निकालकर बाहर फेंका। मैंने खुद को कैसे बचाया, ये मैं ही जानती हूं। मेरे साथ कुछ ऐसी भी औरतें थीं, जो पैसे के लालच में गलत काम करती थीं। उम्र जितनी कम, पैसा उतना ज्यादा। रेखा बाई भी यही करती थी। रोज शाम को उसके घर पर लोगों की भीड़ लगी रहती थी। जब मैं 17-18 साल थी तब रेखा बाई ने मुझसे भी यही काम करने को कहा। उसने एक आदमी से मेरे बदले एक लाख रुपए लिए। फिर जबरदस्ती उसके साथ भेजने लगी। मैं उसके घर से बचकर भाग निकली। उसके बाद से मैं रेखा बाई के साथ कभी नहीं गई। अकेले ही नाचने जाने लगी।’ भूरी बाई आगे बताती हैं- ‘एक दिन करीब 30 साल की उम्र का एक आदमी स्टेज के ठीक सामने खड़ा था। मैं जब तक नाचती रही वो शख्स वहां से हिला नहीं। उसके बाद लगातर 15 दिन तक वो डांस देखने आता रहा। आखिर एक दिन हिम्मत करके उसने मुझसे बात की। उसका नाम धीरज सिंह था। धीरे-धीरे हम दोनों बात करने लगे। वो अक्सर मुझसे कहता- ‘तुम मुझे अच्छी लगती हो।’ मैंने भी कह दिया कि- तुम शादीशुदा हो। मुझे तो जिंदगी भर का साथ चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि आज मैं तुम्हारे साथ हूं, कल किसी और के साथ। बावजूद इसके वो अक्सर मेरे घर आने लगा। रात में रुकता और सुबह अपनी बीवी-बच्चों के पास लौट जाता। कुछ साल बाद उसकी पत्नी की कैंसर से मौत हो गई। एक दिन मैंने उससे कहा कि अगर हमारा बच्चा हुआ तो तुम्हे उसे बाप का नाम देना होगा। अगर ये बात मंजूर हो तो मेरे साथ रहो, वरना चले जाओ। धीरज ने कहा कि कल मथढक्का की रस्म कर लेते हैं। इस रस्म में आदमी को जिस औरत के साथ रहना होता है, उसको कुछ पैसे देता है। फिर वो औरत उसके लिए दुल्हन की तरह तैयार हो जाती है। शादी की कोई रस्म नहीं होती, लेकिन इस रस्म के बाद औरत सिंदूर लगाने लगाती है और शादीशुदा औरतों की तरह रहती है। इस रस्म के बाद समुदाय की कोई भी औरत, किसी आदमी के साथ बिना शादी के भी रह सकती है। इसमें बारात या विदाई जैसा कुछ नहीं होता। मेरे साथ भी यही हुआ। अगली सुबह मेरा मर्द बीस हजार रुपए लेकर आया और मेरे हाथ में रख दिए। उसके बाद समुदाय की तीन औरतों ने मुझे साड़ी पहनाई। मैंने अपने मर्द के नाम की बिंदी लगाई, चूड़ी पहनी और अपने ही हाथों से मांग में सिंदूर भरा। उस दिन धीरज को मेरा मालिकाना हक मिल गया। आज उसी से तीन बच्चे हैं। भूरी बाई को बीच में टोकते हुए मैंने पूछा- अभी बच्चे कहां हैं? वो बोलीं- एक बेटा दूसरे शहर कमाने गया है। दो बच्चे यहीं हैं। एक 18-19 साल की बेटी और दूसरा 12-13 साल का बेटा। बच्चों के सामने ये सब बताने में, घाघरा-चोली, घुंघरू निकालने में शर्म आती है। वो गुस्सा करते हैं, डांटते हैं। जब कोई घर आता है, तो बच्चों को यही लगता है कि नाच के लिए बयाना (बुकिंग) करने आए हैं। कई बार तो नाच की बुकिंग वालों को बहाना बनाकर भगा देते हैं। कह देते हैं- मम्मी नहीं है या सो रही है, बाद में आना। फिर मुझे बताते ही नहीं हैं। जब बच्चे कमरे में आएंगे, तो मुझसे कुछ मत पूछिएगा। खराब लगता है। 20-25 साल हो गए इस घुंघरू का बोझ ढोते-ढोते। बेटी बीए सेकंड ईयर में है। हॉस्टल में रहकर पढ़ती है। इन दिनों घर आई हुई है। अब कोई ढंग का लड़का देखकर शादी कर दूंगी। मर जाऊंगी, लेकिन इसे कभी नाचने के लिए नहीं भेजूंगी। कभी नहीं चाहूंगी कि मेरे जैसी जिंदगी बेटी को मिले। एक बार कुछ लोग बुकिंग के लिए घर आए थे। बेटी को देखते ही बोले- बेटी को भी साथ ले आना। दोगुने पैसे दूंगा। मैंने गाली देते हुए कहा- खबरदार, जो मेरी बेटी पर गंदी निगाह डाली तो…। नाचने वाली की बेटी भी नाचने वाली बने, ये जरूरी नहीं है। वे गुस्से में कहने लगे- जब बिना शादी-ब्याह के बच्चे पैदा कर लेते हो तो शर्म नहीं आती। बाद में दिखावा करते हो। मैंने जवाब दिया- मेरा एक ही मर्द है और इन बच्चों के पास बाप का नाम है। बोलते-बोलते भूरी बाई की आंख भर आईं। कहती हैं, ‘लोगों को ऐसा लगता है कि हमारी कोई इज्जत ही नहीं है। पैर में घुंघरू बांधकर पूरी रात ढोलक की ताल पर नाचती रहती। जैसे ही पैर रुकते, रेखा बाई डंडे से मारती। गुस्से में कहती- मालिक ने नाचने के पैसा दिए है न! तो नाचो। नहीं नाचोगी, तो सिखोगी कैसे?’ पूरी रात बिना खाए-पिए, घुटनों के बल नाचना पड़ता था।’ तभी भूरी बाई का बेटा कमरे में मोबाइल लेने के लिए आया। उसे देखते ही भूरी बाई चुप हो गईं। बेटे के जाने के बाद कहती हैं, ‘अब तो इनका बाप भी कहता है, बेटी की पढ़ाई पूरी हो जाए तो घाघरा-चोली और घुंघरू आग के हवाले कर देना। तभी भूरी बाई की बेटी विमला चाय लेकर आती हैं। बेटी के जाते ही वो कहती हैं, ‘ये महीने-दो महीने की रही होगी। इसे साथ लेकर नाचने जाती थी। जहां प्रोग्राम होता, वहीं स्टेज के सामने इसे दूध की बॉटल थमाकर सुला देती थी। साथ में एक खवास (नौकरानी) रखती थी। उसे तीन-चार सौ रुपए एक रात के देती थी। भूरी बाई की बेटी विमला पहचान छिपाने की शर्त पर बोलीं, ‘स्कूल में जब मेरी जाति पूछी जाती थी, तो शर्म के मारे बेड़िया के बदले बेदी जाति बता देती थी। जिन बच्चों की मां शादीशुदा नहीं होती थीं, किसी भी मर्द से बच्चे पैदा कर लेती थी, लोग उन्हें नाजायज कहकर चिढ़ाते हैं। इसलिए मैं अपनी जाति बताने में डरती थी। हमारी जाति में बेटी पैदा हो तो लोग खुशी मनाते हैं। उन्हें लगता है नाचने जाएगी तो पैसों की बारिश होगी। इसलिए तो औरतें बिना शादी के भी बच्चा पैदा कर लेती हैं। मैं तो सोचती हूं कि काश! इस जाति में पैदा ही न हुई होती। दूसरे बच्चों की तरह मेरे भी पापा होते। परिवार के साथ घूमने-फिरने जाती। अब तो लोग देखते ही कहते हैं- देखो, वो बेड़नियां नाचने वाली की बेटी जा रही है। जबकि मैं तो अपनी मां के साथ कहीं जाती भी नहीं हूं।’ इनसे बात करने के बाद मैं हरिकेश हरिजन से मिलने पहुंचा। ये राई डांस कराने के लिए औरतों को लेकर जाते हैं। राई डांस को लेकर हरीकेश कहते हैं ‘ये तो परंपरा का हिस्सा था, लेकिन अब इसमें गलत काम होने लगा है। औरतें, लड़कियां भी सोचती हैं कि पूरी-पूरी रात नाचने, शरीर को थकाने के बाद 4-5 हजार रुपए मिलेंगे। यदि वह किसी के साथ संबंध बनाएंगी, तो आसानी से इतने पैसे कमा लेंगी। इसलिए इस तरह के गलत काम इस समुदाय में होने लगे हैं। जो लड़कियां नाचने लगती हैं उनकी शादी नहीं होती। शादी कर लेंगी, तो पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ जाएगी। फिर ये नाच-गाना छोड़ना पड़ेगा।’ नोट- पहचान छुपाने के लिए नाम बदले गए हैं। ———————————————————————–
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साल 2020, 2-3 जुलाई की दरमियानी रात। मैं अपने छोटे बेटे के साथ लखनऊ वाले घर पर सो रही थी। बड़ा बेटा उन दिनों छुट्टी पर मॉस्को से इंडिया आया हुआ था और अपनी चाची के घर पर था। रात 2 बजे अचानक फोन बजा। पूरी कहानी यहां पढ़ें…



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