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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने भरवारा रेलवे ओवरब्रिज (आरओबी) के लिए भूमि अधिग्रहण पर गंभीर नाराजगी व्यक्त की है। न्यायालय ने प्रथम दृष्टया पाया कि अधिग्रहण से लोगों का न्यूनतम विस्थापन सुनिश्चित करने और वैकल्पिक स्थल पर विचार करने की प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं किया गया। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ वैज्ञानिक स्वामी सत्य प्रकाश वेद विज्ञान सेवा समिति की जनहित याचिका सहित छह याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। खंडपीठ ने कहा कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 11 की अधिसूचना में किसी परिवार के विस्थापन से इनकार किया गया है, जबकि सामाजिक प्रभाव आकलन (एसआईए) रिपोर्ट प्रभावित परिवारों के विस्थापन का उल्लेख करती है। इस विरोधाभास पर राज्य सरकार से जवाब मांगा गया है। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि एसआईए रिपोर्ट में सुझाए गए वैकल्पिक स्थल पर विचार नहीं किया गया। जबकि स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह ने भी आरओबी की आवश्यकता स्वीकार करते हुए स्थान चयन पर रेलवे, सेतु निगम और अन्य तकनीकी एजेंसियों की राय लेने की आवश्यकता बताई थी। अदालत ने जोर देकर कहा कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया केवल औपचारिकता नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य न्यूनतम विस्थापन सुनिश्चित करना और कम प्रभावित करने वाले व्यवहारिक विकल्प को प्राथमिकता देना है। मामले की अगली सुनवाई बुधवार को होगी।
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भरवारा आरओबी भूमि अधिग्रहण पर लखनऊ हाईकोर्ट नाराज:कहा- कम लोगों को हटाने और दूसरी जगह बसाने पर नहीं हुआ विचार
