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भागीरथपुरा में दूषित पानी से 36 मौतों की जांच कर रहे आयोग की रिपोर्ट हाई कोर्ट में पेश होने के बाद मामले में अफसरों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भागीरथपुरा में नई पानी की लाइन बिछाने की फाइल 92 से 100 दिनों तक अटकी रही। जबकि इलाके में सालों से दूषित पानी की सप्लाई की शिकायतें सामने आ रही थीं और अफसरों को इसकी जानकारी होने की बात भी जांच में सामने आई है। सबसे अहम बात यह है कि जांच के दायरे में आए अफसरों में से किसी ने भी अपनी गलती नहीं मानी। आयोग के सामने बयान देने वाले अफसरों ने अपनी-अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए जिम्मेदारी दूसरे स्तर के अफसरों पर डाल दी। किसी ने कहा- मेरे स्तर पर गलती नहीं हुई, किसी ने कहा- मुझे दूषित पानी की जानकारी नहीं थी, तो किसी ने फाइल रोकने की जिम्मेदारी से इनकार किया। आयोग ने जांच का दायरा 2019-20 से शुरू किया है। पीड़ित परिवारों ने उन्हें बताया कि लोग कई सालों से अफसरों से शिकायत करते रहे, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। रिपोर्ट फिलहाल सार्वजनिक नहीं हुई है। इस पर 8 सितंबर को सुनवाई होगी। याचिकाकर्ता मनीष यादव और रितेश इनानी ने अंतरिम आवेदन देकर रिपोर्ट सार्वजनिक करने, सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग शुरू करने और उनकी याचिका पर अलग से सुनवाई की मांग की है। रिपोर्ट के 400 पेजों में अफसरों के बयान, 200 पेज में निष्कर्ष
जांच आयोग ने मामले में तत्कालीन निगमायुक्त प्रतिभा पाल, हर्षिका सिंह, शिवम वर्मा, दिलीप यादव, अपर आयुक्त रहे रोहित सिसोनिया, संदीप सोनी और निलंबित कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव के विस्तार से बयान दर्ज किए हैं। सहायक यंत्री, उपयंत्री और पानी की टंकी के स्टाफ के भी बयान लिए गए। आयोग की रिपोर्ट में 400 पेज में अफसरों के बयान दर्ज किए गए हैं। इसके बाद आयोग ने 200 पेज में अपने निष्कर्ष दर्ज किए हैं। 2019 से समाधान की कोशिश, 2025 तक अधूरा रहा काम
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भागीरथपुरा कांड:दूषित पानी का पता था, फिर भी 92 से 100 दिन फाइल दबाए बैठे रहे अफसर
