रश्मि बंसल का कॉलम:केवल सिनेमा के परदे तक ही सीमित नहीं है पार्टिशन की याद




कुछ दिन पहले मैं अमृतसर में थी, कुछ काम से। इस शहर की सबसे बड़ी खासियत है खाना। शादियों में आपने अमृतसरी कुलचा जरूर खाया होगा, मगर किसी छोटे-से ढाबे में बैठकर, तंदूर से निकले गरमा-गरम कुलचे खाने का मजा कुछ और ही है। दूसरी बड़ी बात यह है कि अमृतसर की रग-रग में इतिहास दौड़ता है। चाहे वो स्वर्ण मंदिर हो या जलियांवाला बाग। एक सदियों पुराना एहसास है, इस शहर की हवा में कुछ खास है।
और जो आप पार्टिशन म्यूजियम में दाखिल हो गए, तो बंटवारे की दु:खद दास्तान आपके दिल और दिमाग को पूरी तरह से हिला देगी। मेरी सास संतोष बंसल से मैंने उस दौर की कुछ कहानियां सुनी थीं। उनका जन्म लाहौर में हुआ था, वहां उन्होंने स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई की थी। उनके पिताजी सी.एल. अग्रवाल लाहौर के नामी वकील थे। फेन रोड पर एक आलीशान कोठी में वो रहते थे।
1947 में देश के नक्शे पर एक लाइन खिंच गई और लाखों की जिंदगी तबाह हो गई। पार्टिशन म्यूजियम में उन कहानियों की एक झलक मिलती है। अगर आपको रातोंरात अपना घर छोड़कर भागना पड़े तो आप क्या साथ लेकर जाएंगे? इन्हीं चीजों को म्यूजियम में डिस्प्ले किया गया है। जैसे कि एक काला, थका-हारा संदूक, उसमें शादी के समय पहना हुआ दुपट्टा। गिना-चुना सामान, अनगिनत यादें। लेकिन यह एक मूक संग्रहालय नहीं, दीवार पर लगे टीवी स्क्रीन पर आप उन लोगों के इंटरव्यू देख-सुन सकते हैं, जिन्होंने वो मुश्किल सफर तय किया, जिसमें हजारों ने जान गंवाई। आज कहानी सुनाने वालों के बाल सफेद हैं, लेकिन बचपन का वो दिन उन्हें हूबहू याद है। जब उनकी ट्रेन पर हमला हुआ था और लाशों के नीचे दबे रहने की वजह से वो जिंदा बच गए।
सरहद पार कर, इस देश की मिट्टी को अपने हाथों में लेकर, उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलके। कुछ महीनों तक रिफ्यूजी कैंप में रहने के बाद, लोगों ने अपनी मेहनत और किस्मत से फिर अपना अस्तित्व बनाया। व्यापार शुरू किया, मकान खड़े किए। धीरे-धीरे वह पीढ़ी भी खत्म हो रही है, जिसे सरहद पार छोड़ा हुआ घर याद है। अब पार्टिशन नजर आता है सिनेमा के पर्दे पर। लेकिन वो अमृतसर जिसने इतने लोगों को पनाह दी, एक नई राह दी, इसी शहर में अब हरविंदर उर्फ हैरी जैसे नौजवानों का मंत्र है कि- सरहद पार करो। यहां जितने भी नौजवानों से बात की, उनका यही कहना था कि यहां फ्यूचर नहीं। जाना कहां है? कनाडा, अमेरिका, यूके, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड… कहीं भी। पिछले 6 साल से हैरी फॉरेन का सपना साकार करने में लगे हुए हैं। जैसे कोई 12वीं के बाद एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी करता हो, उसी तरह हैरी वीजा इंटरव्यू की तैयारी करते हैं। काफी बार रिजेक्ट होने के बाद आखिर रूस का वीजा लग गया। फिर क्या- फ्लाइट लेकर पहुंच गए और किसी रेस्तरां में दो नंबर का काम शुरू किया। यानी कि वो काम जो वीजा के रूल के मुताबिक गैरकानूनी हो। हैरी जी एक रेस्तरां में हेल्पर हैं, एक छोटे-से फ्लैट में 6 लोगों के साथ रहते हैं, लेकिन खुश हैं। क्योंकि वहां उन्हें अपना फ्यूचर बनते हुए दिख रहा है।
उनकी कॅरियर प्लानिंग सॉलिड है। वहीं पर किसी गोरी मेम से शादी कर लूंगा, बच्चे हो जाएंगे, सिटीजनशिप मिल जाएगी। एक भाई इंडिया में है, मां-बाप की देखभाल के लिए। हैरी जी पैसे भेजते रहेंगे। दोनों खुश। यह एक सच्ची स्टोरी है, जो मैंने सुनी हैरी जी के भाई पैरी जी से। वो मेरी टैक्सी चला रहे थे।
आज न जाने इस देश में कितने हैरी हैं, जो अपना सब कुछ छोड़कर किसी और देश में सेटल होने के लिए बेताब हैं। उन्हें कहा जा सकता है आर्थिक रिफ्यूजी।
फर्क यह है कि बंटवारे के उलट इस बार ये लोग अपनी मर्जी से जा रहे हैं। अपनी पुश्तैनी जमीन बेच कर, एजेंट को पैसे देकर, डंकी रूट से भी। पार्टिशन के वक्त लोगों ने पूछा था- हम जाएं कहां?
लेकिन आज हैरी जैसे नौजवान पूछ रहे हैं- हम यहां क्यों रहें?
इस सवाल का जवाब हमें खोजना होगा। अमृतसर की रग-रग में इतिहास दौड़ता है। सदियों पुराना एहसास है, इस शहर की हवा में कुछ खास है। और जो आप पार्टिशन म्यूजियम में दाखिल हो गए, तो बंटवारे की दु:खद दास्तान आपके दिल और दिमाग को पूरी तरह से हिला देगी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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