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राजस्थान में पहली दलित पाठशाला खोलने वाले स्वतंत्रता सेनानी:‘नेताजी’ का भाषण सुन छोड़ी नौकरी, पाली के रामप्रताप शर्मा ने एक साथ दो लड़ाइयां लड़ी




जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं, 12 साल के रामप्रताप शर्मा ने माता-पिता खो दिए। पैतृक जमीन पर जागीरदारों ने कब्जा कर लिया। कमजोर तबकों पर जुल्म की घटनाओं ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। जोधपुर आए नेताजी सुभाषचंद्र बोस का भाषण सुनकर पुलिस की नौकरी छोड़ आजादी की जंग में कूद पड़े। आंदोलनों में लाठी खाई और जेल भी गए। छुआछूत के दौर में जब स्कूलों ने दलित बच्चों के लिए दरवाजे बंद कर दिए तो उन्होंने किराए के मकान में राजस्थान की पहली दलित पाठशाला खोल दी। छोटे भाई को नौकरी छुड़वाकर पढ़ाने का जिम्मा सौंप दिया। यही पाठशाला आगे चलकर स्कूल बनी और आज उसी अंग्रेज अफसरों के बंगले में सीनियर हायर सेकेंडरी स्कूल चल रहा है। अंग्रेजों से लड़ाई के साथ छुआछूत के खिलाफ भी मोर्चा खोलने वाले स्वतंत्रता सेनानी रामप्रताप शर्मा की कहानी जानने भास्कर टीम उनके गांव पहुंची। पढ़िए ये खास रिपोर्ट…. 12 की उम्र में माता-पिता का साया उठा पाली से करीब 20 किलोमीटर दूर है गुंदोज गांव। यहां ब्रह्मपुरी इलाके में स्वतंत्रता सेनानी रामप्रताप शर्मा और उनके छोटे भाई मगराज के पुश्तैनी मकान है। हम घर में दाखिल हुए तो उनके पोते और छोटे भाई मगराज के बेटे ने उस दौर की कहानी बयां की। पोते महेश जोशी बताते हैं- दादा रामप्रताप शर्मा जब 12 साल के थे, तब सिर से माता-पिता साया उठ गया। सामंती प्रथा होने के चलते जागीरदारों ने पैतृक जमीन पर कब्जा कर लिया था। ऐसे में उन्हें अपने ननिहाल बगड़ी में शरण लेनी पड़ी। ननिहाल की जमीन भी पहले से सामंतों के कब्जे में थी। कमजोर तबके से मारपीट की घटना ने झकझोरा साल 1934 में ननिहाल बगड़ी में खुला दरबार लगा था। वहां खुलेआम नामी सेठ-साहूकारों और कमजोर तबके के लोगों को बेरहमी से पीटा गया। इस घटना ने रामप्रताप को अंदर तक झकझोर दिया। तभी उन्होंने अपनी और नाना की जमीन सामंतों से आजाद करवाने की ठानी। शर्मा भारतीय सेना में शामिल होकर ताकतवर पद पर पहुंचना चाहते थे। लेकिन उस समय भारतीय-ब्रिटिश सेना में ब्राह्मणों (पुस्तक वंदे मातरम् के अनुसार) को भर्ती नहीं किया जाता था। ऐसे में रामप्रताप शर्मा पुलिस में बतौर हेड कॉन्स्टेबल भर्ती हुए थे। जोधपुर में ‘नेताजी’ का भाषण सुन नौकरी छोड़ी साल 1938 में विलायत से लौटे नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जोधपुर में एक आम सभा रखी थी। उस आमसभा में लॉ एंड आर्डर संभालने का जिम्मा हेड कॉन्स्टेबल रामप्रताप शर्मा के पास ही था। बोस का भाषण सुनकर शर्मा उनकी राष्ट्र भावना से बेहद प्रेरित हुए। अगले ही साल 1939 में रामप्रताप शर्मा ने पुलिस की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। अपने पैतृक गांव गुंदोज लौटकर जागीरदार और सामंती प्रथा के खिलाफ आवाज उठाना शुरू किया। उसी साल रामप्रताप शर्मा मारवाड़ लोक परिषद के सदस्य बन गए। सत्याग्रह आंदोलन में गए जेल जमनालाल बजाज और हीरालाल शास्त्री के मार्गदर्शन में सत्याग्रह आंदोलन जोरों पर था। आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने पर अंग्रेजी हुकूमत ने रामप्रसाद शर्मा को 1943 में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। उन पर लूट और अन्य कई धाराओं में केस दर्ज किए। 2 साल जेल में बिताने के बाद 1945 में हाकिम रूपसिंह राठौड़ और गोरधन सिंह भंडारी ने उनको बरी कर दिया। जोधपुर जेल से रिहा होकर शर्मा अपने गांव लौटे और फिर से किसान आंदोलन में जुट गए। अंग्रेजी हुकूमत-जागीरदार प्रथा के विरोध में वे कई बार मारपीट के भी शिकार हुए। किराए के मकान में खोली राजस्थान की पहली दलित पाठशाला पुस्तक वंदे मातरम् में छपी उनकी जीवनी के अनुसार रामप्रताप शर्मा विनोबा भावे के दलित आंदोलन के बड़े समर्थक थे। यही वजह थी कि वे छुआछूत के प्रबल विरोधी थे। उस दौर में गुंदोज की पाठशाला में दलित या अनुसूचित जाति के बच्चों को प्रवेश नहीं मिलता था। ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए शर्मा ने सत्याग्रह में साथ निभाने वाले सेठ पुखराज जैन का मकान किराए पर लिया। साल 1945 में एक शिक्षा समिति गठित कर पहली दलित पाठशाला की स्थापना की। पढ़ाने का जिम्मा अपने छोटे भाई मगराज को दिया। उन बच्चों को स्कूल की दहलीज तक पहुंचाया, जिनके लिए पढ़ाई करना किसी सपने से कम नहीं था। उस समय गांव के बस स्टैंड पर ही अंग्रेज अफसरों के लिए छोटे-छोटे बंगले बने हुए थे। देश की आजादी के बाद 1955 में शर्मा ने पाठशाला को उन बंगलों में शिफ्ट कर दिया। आज वही दलित पाठशाला, राजकीय उच्च माध्यमिक स्कूल गुंदोज के नाम से जानी जाती है। दलित लड़की को बेटी बनाया और शादी कराई स्वतंत्रता सेनानी रामप्रताप शर्मा के भतीजे ब्रदीलाल जोशी (73) बताते हैं कि जयनारायण व्यास, मथुरादास माथुर के मार्गदर्शन में छूआछूत निवारण अभियान चलाया। वे पाली जिले के कई गांवों में पैदल जाकर जन जागरूकता करते। बद्रीलाल जोशी बताता हैं- आजादी से पहले प्रदेश की पहली दलित पाठशाला उनके ताऊजी रामप्रताप शर्मा ने ही खोली थी। मेरे पिता तब सरकारी शिक्षक थे, उन्होंने नौकरी छोड़कर उस पाठशाला में शिक्षण कार्य कराया। गांव के पहले सरपंच बने स्वतंत्रता सेनानी रामप्रताप के पोते महेश जोशी बताते हैं- दादाजी गरीब और वंचितों की आवाज थे। देश आजादी के बाद दलित पाठशाला पर तिरंगा फहराया और जब वे गांव के पहले सरपंच बने । महेश जोशी ने बताया- मेरे दादा रामप्रताप जी 1954 में कांग्रेस के पहले जिलाध्यक्ष बने थे। उन्होंने गांव में दलित वर्ग की बेटी का लालन-पालन अपने परिवार की तरह किया। उन्हें बेटी की तरह पाला और शिक्षित कर शादी भी कराई थी। उस परिवार में आज भी आना जाना और मान-सम्मान है।



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