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शिव-पार्वती से क्यों नाराज हुए कार्तिकेय स्वामी:रिश्तों में गुस्से के पीछे निराशा, उपेक्षा, असुरक्षा या बात न सुने जाने की भावना हो सकती है, इसे समझेंगे, तो रिश्ते सुधरेंगे




रिश्तों में कभी-कभी गुस्सा और मनमुटाव होना स्वाभाविक है। जब किसी अपने को लगता है कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ या उसकी भावनाओं को समझा नहीं गया, तो वह खुद को सबसे दूर कर सकता है। ऐसे समय में अक्सर लोग सोचते हैं कि सामने वाला जब शांत होगा, तब खुद ही वापस आ जाएगा, लेकिन हर नाराजगी को समय के भरोसे छोड़ देना सही नहीं होता। कई बार उस व्यक्ति को सबसे ज्यादा जरूरत इसी बात की होती है कि कोई उसके दुख को समझे और उसे यह भरोसा दिलाए कि वह अकेला नहीं है। भगवान शिव, माता पार्वती और कार्तिकेय स्वामी से जुड़ी एक पौराणिक कथा रिश्तों को संभालने की इसी बात को समझाती है। पढ़िए यह कथा… पौराणिक कथा के अनुसार, एक दिन शिव जी और माता पार्वती ने विचार किया कि अब गणेश-कार्तिकेय का विवाह कर देना चाहिए। उन्होंने दोनों से कहा कि जो पूरे संसार की परिक्रमा करके पहले वापस आएगा, उसका विवाह पहले किया जाएगा। यह सुनते ही कार्तिकेय स्वामी अपने वाहन मोर पर सवार होकर संसार की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। वे पूरी दुनिया का चक्कर लगाने के लिए आगे बढ़ गए। दूसरी ओर, गणेश जी ने अपने माता-पिता की परिक्रमा की और कहा कि उनके लिए माता-पिता ही पूरा संसार हैं। गणेश जी की यह भावना देखकर भगवान शिव और माता पार्वती प्रसन्न हुए और उनका विवाह कर दिया गया। जब कार्तिकेय स्वामी संसार की परिक्रमा पूरी करके वापस लौटे, तब तक गणेश जी का विवाह हो चुका था। पूरी बात जानकर कार्तिकेय स्वामी को बहुत दुख हुआ। उन्हें लगा कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ और उनकी मेहनत का उचित सम्मान नहीं मिला। इसी भाव के कारण वे क्रोधित होकर दक्षिण दिशा में क्रौंच पर्वत चले गए। शिव जी और माता पार्वती ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन कार्तिकेय स्वामी का गुस्सा शांत नहीं हुआ। तब शिव-पार्वती यह नहीं सोचा कि कार्तिकेय नाराज हैं, तो कुछ समय अकेले रहने देते हैं, इसके बजाय माता-पिता ने स्वयं उनके पास जाने का निर्णय लिया। मान्यता है कि शिव जी अमावस्या और माता पार्वती पूर्णिमा के दिन कार्तिकेय स्वामी से मिलने श्रीपर्वत जाते हैं। इसी क्षेत्र में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग स्थित है। कथा की सीख घर-परिवार में हर बार गुस्सा केवल गुस्सा नहीं होता। उसके पीछे चोट, निराशा, उपेक्षा, असुरक्षा या अपनी बात न सुने जाने की भावना हो सकती है। इसलिए सामने वाले के व्यवहार पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय यह समझने की कोशिश करें कि उसे वास्तव में दुख किस बात से हुआ है। नाराज व्यक्ति को सबसे पहले यह महसूस होना चाहिए कि उसकी बात सुनी जा रही है। उसकी बात पूरी होने से पहले अपनी सफाई देना या अपनी गलती साबित न होने की दलील देना स्थिति को और बिगाड़ सकता है। कई बार ध्यान से सुन लेना ही आधी समस्या हल कर देता है। माफी मांगना हार नहीं है। अगर आपकी गलती है, तो उसे स्वीकार करने में देर न करें। एक माफी रिश्ते में जमा हुई नाराजगी को कम कर सकती है। रिश्ते में यह साबित करना जरूरी नहीं कि कौन सही है; जरूरी यह है कि दोनों के बीच भरोसा बना रहे। कई रिश्तों में असली समस्या घटना से ज्यादा उसकी गलत व्याख्या होती है। इसलिए अनुमान लगाने के बजाय सामने वाले से शांत होकर बात करें। प्यार और धैर्य के साथ पूछें कि उसे किस बात से चोट पहुंची, इसके बाद उसकी गलतफहमी दूर करें। किसी को थोड़ा समय देना और उसे पूरी तरह अकेला छोड़ देना, दोनों अलग बातें हैं। अगर सामने वाला अभी बात नहीं करना चाहता, तो उसे समय दें, लेकिन यह एहसास जरूर दिलाएं कि जरूरत पड़ने पर आप उसके साथ हैं। हर बहस में अपनी बात मनवा लेना सफलता नहीं है। कई बार रिश्ते को बचाना अपनी बात साबित करने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। अगर अहंकार कम करके एक कदम पीछे हटने से किसी अपने का मन हल्का हो सकता है, तो ऐसा करना रिश्ते की मजबूती का संकेत है।



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