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भारत में फीमेल लेबर-फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (एफएलपीआर) 35% है, जो बांग्लादेश (42%) और फिलीपींस (50%) जैसे देशों से भी काफी कम है। हालांकि यह दर 2017-18 के 21% से अधिक है, लेकिन गौर से देखें तो पता चलता है कि इस वृद्धि में 70% से अधिक योगदान कृषि और निर्वाह-आधारित क्षेत्रों (सब्सिस्टेंस सेक्टर्स) का है, जिसमें बड़े पैमाने पर छिपी हुई बेरोजगारी भी शामिल है। विकसित देशों की तुलना में हमारे एफएलपीआर के अंतर को पाटना महज लैंगिक समानता के लिए ही अहम नहीं है। इससे आर्थिक विकास में भी काफी फायदा मिल सकता है। इससे भारत अपनी जीडीपी में 700 अरब से 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक की अतिरिक्त वृद्धि कर सकता है। लेकिन भारत में इतनी कम महिलाएं क्यों काम करती हैं? इसे लेकर हुए अध्ययनों में आपूर्ति पक्ष की बाधाओं पर फोकस किया गया है, खासकर सामाजिक नियम- जिनमें अनपेड केयर वर्क्स का असमान वितरण, आवागमन व शिक्षा पर लगी पाबंदियां, कमजोर कानूनी सुरक्षा तथा बाल विवाह जैसी प्रथाएं शामिल हैं। मौजूद साक्ष्य इसकी पुष्टि भी करते हैं। यूएन वुमन की एक तकनीकी रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय महिलाएं दिन का 22% समय अनपेड केयर वर्क्स में बिताती हैं, जबकि पुरुषों के लिए यह आंकड़ा दिन का करीब 6.4% ही है। नतीजतन, नीतियों का बड़ा हिस्सा पहले से मौजूद नौकरियों में ही महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने पर केंद्रित रहा है। बीते कुछ दशकों में कई बाधाएं हटने के बावजूद गैर-कृषि लेबर फोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी में भी बदलाव नहीं हुआ है। भारत में आमतौर पर महिलाओं की कम एफएलपीआर के लिए शिक्षा को भी कारण बताया जाता है। लेकिन अब हर स्तर पर महिलाओं के नामांकन की दर पुरुषों के बराबर या उससे अधिक हो चुकी है। 2005-06 के बाद से बाल विवाह भी लगभग आधे हो गए हैं। महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी भी बढ़ी है। 1996 में महिलाओं का मतदान पुरुषों की तुलना में करीब 9% कम था, लेकिन 2024 तक यह पुरुषों से भी आगे निकल गया। ऐसे में अगर केवल सामाजिक नियम ही बाधा होते तो फिर प्रोडक्टिव एम्प्लॉयमेंट में महिलाओं की स्थिति में स्पष्ट बदलाव दिखना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बीते दो दशकों में गैर-कृषि रोजगारों में महिलाओं का अनुपात 5% ही बढ़ा है। यह विरोधाभास बताता है कि महिलाओं की एफएलपीआर कम होने का एक कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में कुल श्रम मांग की कमी भी है। इसे समझने का एक तरीका है- लेबर इंटेंसिटी यानी उत्पादन के अनुपात में लगाए गए श्रमिकों की संख्या। कई समान अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत की लेबर इंटेंसिटी काफी कम है। मसलन, बांग्लादेश, फिलीपींस और वियतनाम में जीडीपी के 10 लाख डॉलर उत्पादित करने के लिए करीब 40-50 श्रमिक काम करते हैं, जबकि भारत में 35 श्रमिक ही लगते हैं। अगर भारत में बांग्लादेश जितनी लेबर इंटेंसिटी होती तो महिला एफएलपीआर करीब 50% होती। भारत में मजदूरी और बेरोजगारी के आंकड़ों में भी श्रम की कमजोर मांग की स्थिति नजर आती है। 15-25 वर्ष की आयु के युवा ग्रेजुएट्स में करीब 40% बेरोजगारी है। इससे पता चलता है कि श्रम की मांग इतनी नहीं है कि इन ग्रेजुएट्स को काम करने के लिए प्रेरित करने वाली पर्याप्त तनख्वाह मिल सके। बांग्लादेश की रेडीमेड गारमेंट इंडस्ट्री का अनुभव बताता है कि श्रम की मांग एफएलपीआर को कैसे प्रभावित कर सकती है। 1983 में बांग्लादेश के कुल निर्यात में इस इंडस्ट्री की हिस्सेदारी 4% थी, लेकिन 2021 तक यह 81% हो गई। इस लेबर-इंटेंसिव निर्यात सेक्टर के तेजी से हुए विस्तार ने महिलाओं के लिए लाखों रोजगार अवसर पैदा किए। भारत में श्रम की मांग इतनी कम क्यों है? इसका एक कारण श्रमिकों को रोजगार देने से जुड़ी लागत और जटिलताएं हैं। करीब 15% भारतीय कंपनियां श्रम नियमों को बाधा मानती हैं। नियमों के पालन संबंधी आवश्यकताएं और कर्मचारियों को नियुक्त करने और हटाने से जुड़ी पाबंदियां श्रमिकों को रोजगार देने की लागत को बढ़ाती हैं। ऐसे में कंपनियां श्रम की जगह पूंजी में निवेश के लिए प्रेरित होती हैं। भारत में महिलाओं की एफएलपीआर दो माध्यमों से बढ़ सकती है- तेज जीडीपी ग्रोथ और रोजगारों में बढ़ोतरी। तेज ग्रोथ से पूंजी और श्रम की मांग बढ़ेगी। वहीं लेबर-इंटेंसिव ग्रोथ मॉडल सुनिश्चित करेगा कि बढ़ी हुई मांग का अधिकतर हिस्सा रोजगारों में बदले। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट। लेख की सहलेखिका आल्हा सभरवाल हैं)
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शिशिर गुप्ता का कॉलम:भारत में महिलाएं इतनी कम तादाद में क्यों काम करती हैं?
