![]()
बिलकुल सामान्य समय में भी पंजाब में कोई यह मानने को तैयार नहीं होगा कि ओटीटी फिल्म ‘सतलुज’ को रिलीज होने के बाद जिस तरह अचानक वापस ले लिया गया, उसके पीछे राजनीति नहीं होगी। फिल्म को 48 घंटे के अंदर वापस क्यों ले लिया गया? हर किसी को पता होना चाहिए कि एक बार जब वह डिजिटल फॉर्म में बन गई तो व्यापक रूप से प्रदर्शित हो जाएगी। पंजाब में अटकलें लगाई जा रही हैं कि वहां अगले वर्ष के शुरू में ही चुनाव करवाए जा सकते हैं। तो इस विवाद से किसे सबसे ज्यादा फायदा होने वाला है? और इससे किसको सबसे ज्यादा नुकसान होने वाला है? पहली बात यह कि उग्रवाद का दौर शुरू होने के बाद ‘नकली एनकाउंटर्स’ की जांच करने वाले व्यक्ति पर केंद्रित यह फिल्म एक पुरानी शिकायत को नया जीवन दे सकती है। फिल्म उस आक्रोश को फिर से भड़का सकती है। दूसरे, इसमें उग्रवादियों को हीरो बनाने की जो कोशिश की गई है, वह छिपती नहीं है। 31 अगस्त 1995 को मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या की वारदात को फिल्म में जिस तरह पेश किया गया है, उस पर गौर कीजिए। इस सीन में वह दोहा गाया जा रहा होता है, जो युद्ध में शहादत के मौके के लिए लिखा गया है। तीसरे, यह फिल्म उन युवकों में गुस्सा पैदा करेगी, जिन्हें आतंकवाद के उस बीते दशक का कोई अनुभव नहीं है, और खास तौर से धार्मिक और रूढ़िवादी समूहों को प्रभावित करेगी। और चौथे, फिल्म देखकर लगता है परदे पर उग्रवादियों और पुलिस के बीच कोई निजी लड़ाई चल रही है। मतदाताओं का बड़ा समूह मुख्यधारा के राजनीतिक नेताओं, खासकर अकालियों से पहले ही नाराज है। अब ‘सतलुज’ फिल्म देखने के बाद और ज्यादा नाराज हुए ये मतदाता अकाली दल की ओर लौटने से तो रहे। ज्यादा संभावना यही है कि वे उग्रपंथियों का समर्थन करेंगे। यह रूढ़िवादी समूह कांग्रेस या ‘आप’ पार्टी की ओर निश्चित ही नहीं जाएगा। इसलिए फायदा एक ही पार्टी को मिलने वाला है। पंजाब में सत्ता बारी-बारी से कांग्रेस, अकाली दल और ‘आप’ को ही मिलती रही है। चौथी ताकत उग्रपंथी हैं, बेशक वे सीमित हैं। वे किसी गठबंधन का हिस्सा तभी बन सकते हैं, जब अकाली कुल सीटों में से एक तिहाई सीटें जीतें, जो कि असंभव दिखता है। अकालियों के वोट बंट चुके हैं, सो उन्हें और हाशिये पर धकेला जा सकता है। ‘आप’ को अपनी सरकार के खिलाफ असंतोष से निबटना है। कांग्रेस आंतरिक कलह में उलझी है। इस उथलपुथल में हिंदू वोट एकजुट होते हैं तो इससे केवल भाजपा को फायदा होगा। पंजाब की सियासत को उसकी जनसंख्या के स्वरूपों के मद्देनजर देखना होगा। पंजाब में सिखों की आबादी 58 फीसदी है और वे बेशक बहुसंख्यक हैं, लेकिन 40 फीसदी हिंदू आबादी भी महत्व रखती है। अगर सिख वोट बंटता है और हिंदू वोट एकजुट हो जाता है तो यह राज्य अकल्पनीय करवट ले सकता है। हम इन समूहों के और टुकड़े कर सकते हैं। सिखों में 60 फीसदी आबादी जट्टों की है, जो राज्य की कुल आबादी के करीब 25 प्रतिशत हैं। इनके वोट अकालियों, उग्रपंथियों और कांग्रेस विरोधी खेमों में बंटे हैं। अगर उनके ज्यादा वोट उग्रपंथियों की ओर जाते हैं तो अकाली दल साफ हो जाएगा और फायदा ‘आप’ या कांग्रेस को मिलेगा। इसलिए भाजपा हिंदू वोट को एकजुट करना चाहती है, जैसा उसने बंगाल और असम में किया। अगर उसे 70 फीसदी हिंदू वोट मिल जाते हैं, तब वह वोटों के पांच हिस्सों में बंटने से बनी स्थिति में फायदे में होगी। लेकिन पंजाब में दलित वोट एक ऐसी ताकत है, जिसका सही आकलन नहीं किया गया है। व्यापक अनुमान यह है कि यहां दलित वोट करीब 33 फीसदी है, जिनमें सिख और हिंदू दोनों शामिल हैं। सिखों में यह वोट करीब 35 फीसदी है। दलित वोट पर पारम्परिक रूप से कांग्रेस की मजबूत पकड़ रही है, लेकिन ‘आप’ ने इसमें सेंध लगाई है। इस वोट बैंक पर कई बाबाओं और डेरों का जो प्रभाव है, वह भी एक अहम पहलू है। भाजपा इस वोट बैंक को मजबूत करने में लंबे समय से जुटी है। प्रधानमंत्री पंजाब का दौरा करने वाले हैं। वे जालंधर के नए रेलवे स्टेशन का उद्घाटन करेंगे, लेकिन उल्लेखनीय राजनीतिक कदम होगा संत निरंजन दास जी की ‘कुर्सी’ डेरा सचखंड बल्लां का संभावित दौरा। संत निरंजन दास जी रविदासी दलित समुदाय के आध्यात्मिक गुरु माने जाते हैं। हिंदी पट्टी में जिसे जाटव समुदाय कहा जाता है, पंजाब के दलितों में उस समुदाय का अनुपात करीब 50 फीसदी है। इस बार गणतंत्र दिवस पर संत निरंजन दास जी का नाम पद्मश्री से सम्मानित किए जाने वालों में शामिल था। तो आप हिसाब लगा सकते हैं। अगला कदम मतदाता सूची तक पहुंचता है। कृषि कानूनों पर अकाली दल से अलगाव के बाद भाजपा ने पंजाब में अकेले चलने का फैसला किया। यह आत्मघाती कदम था। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मात्र 6.6 फीसदी वोट मिले। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका वोट प्रतिशत 18.65 हो गया। यह इसलिए भी प्रभावशाली दिखता है, क्योंकि कांग्रेस और ‘आप’ को 26-26 फीसदी और अकाली दल को 13.48 फीसदी वोट मिले, जबकि रूढ़िवादी सिख वोट उग्रपंथियों की झोली में चले गए। अब वे सीधे मुकाबले की मुद्रा में हैं। आप समझ सकते हैं कि वे हर गांव में ‘सतलुज’ फिल्म का प्रदर्शन क्यों करवा रहे हैं। भाजपा को लग रहा है कि अगर वह 30 फीसदी वोट हासिल कर ले, हिंदुओं की प्रमुखता वाले 55 चुनाव क्षेत्रों में अधिकतम वोट जुटा ले और डेराओं की मदद से दलितों का समर्थन पा ले तो राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है। यह गणित आसान लगता है, और इसलिए कुछ समय के लिए उसे उग्रपंथ के नए उभार का जोखिम भी उठाना फायदे का सौदा लग सकता है। वह यह भी विश्वास कर सकती है कि वह इस उभार को जल्द ही दबा देगी। हमें गौर करना चाहिए कि अकाली ‘सतलुज’ का स्वागत कर रहे हैं, दूसरे लोग खामोश हैं, जबकि केवल भाजपा के रवनीत सिंह बिट्टू उसकी आलोचना कर रहे हैं। आप कह सकते हैं कि वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि वे पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते हैं। लेकिन अगर आप यह सोच रहे हों कि भाजपा का कोई नेता पार्टी की सहमति के बिना अलग सुर में बोल सकता है, तो आप बेशक बहुत नादान हैं। राजनीतिक करवट सम्भव है
पंजाब की सियासत को उसकी जनसंख्या के स्वरूपों के मद्देनजर देखना होगा। पंजाब में सिखों की आबादी 58 फीसदी है और वे बेशक बहुसंख्यक हैं, लेकिन 40 फीसदी हिंदू आबादी भी महत्व रखती है। अगर सिख वोट बंटता है और हिंदू वोट एकजुट हो जाता है तो यह राज्य अकल्पनीय करवट ले सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
Source link
शेखर गुप्ता का कॉलम:पंजाब की सियासत में पेचीदगियां कम नहीं
