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देश के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं के प्रदर्शनों के बाद उभरते हुए ‘युवा वोट बैंक’ की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है। सवाल उठ रहे हैं कि आगामी चुनावों में युवा क्या भूमिका निभा सकते हैं? क्या वे चुनावी नतीजे तय करने में निर्णायक भूमिका निभाने जा रहे हैं? यह चर्चा इसलिए भी अहम है, क्योंकि अगले वर्ष महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इनमें से भाजपा यूपी में बीते दस वर्षों से और गुजरात में तो तीन दशकों से सत्ता में है। यह तो निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि भाजपा ने युवा वोटरों का कितना समर्थन खोया है, लेकिन इस वक्त देश के युवाओं में एक बेचैनी जरूर दिखाई दे रही है। युवा वोटरों के मन को पढ़ना मुश्किल हो सकता है, लेकिन लोकनीति-सीएसडीएस के सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बड़ी संख्या में युवाओं ने भागीदारी नहीं निभाई थी। राज्यों के हिसाब से स्थिति अलग-अलग भी हो सकती है। इस चुनाव में सबसे कम उम्र वाले 18-21 वर्ष के वोटरों का मतदान प्रतिशत औसत मतदान से 6% कम रहा। 22-25 आयु वर्ग के 68% वोटरों ने वोट दिया, जो औसत वोटिंग से अधिक था। बिहार में 18-21 वर्ष वाले केवल 41% युवाओं ने मतदान किया, जबकि राज्य में कुल 67.3% वोटिंग रही थी। यूपी में सबसे कम उम्र के वोटरों का मतदान प्रतिशत 51% था, जबकि राज्य का औसत मतदान 61.1% रहा। कई अन्य राज्यों में तस्वीर उलट भी रही। मध्य प्रदेश में 18-21 वर्ष के वोटरों का मतदान 89% रहा, जो कुल 75.6% मतदान से काफी ज्यादा था। पंजाब में यह 77% और गुजरात में 78% रहा, जो सबसे कम उम्र के वोटरों की बड़ी भागीदारी को दर्शाता है। बंगाल और तमिलनाडु में तो युवा वोटरों की भागीदारी विशेष रूप से बहुत ज्यादा रही। 18-21 वर्ष के मतदाताओं ने बंगाल में 93% और तमिलनाडु में 90% मतदान किया। बंगाल और असम में 22-25 वर्ष आयु वर्ग के वोटरों का मतदान 95% तक पहुंच गया। ये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय राजनीति में कोई एक समान ‘यूथ वोट’ नहीं है। बंगाल एक अहम उदाहरण पेश करता है कि चुनाव-दर-चुनाव युवाओं की पसंद कितनी तेजी से बदल सकती है। 2021 से 2026 के बीच युवा वोटर उल्लेखनीय रूप से तृणमूल से भाजपा की ओर खिसकते दिखाई दिए। यूपी एक अलग तस्वीर दिखाता है। 2022 में भाजपा ने सपा को हराकर स्पष्ट जीत दर्ज की थी, लेकिन युवा वोटरों के बीच सपा भाजपा से बहुत पीछे नहीं थी। 18-21 वर्ष और 22-25 वर्ष, दोनों आयु-वर्गों में भाजपा गठबंधन ने 44% और सपा गठबंधन ने 38% और 39% वोट बटोरे थे। ये उदाहरण दिखाते हैं कि युवा वोटरों की पसंद अलग-अलग चुनावों में काफी बदल सकती है। यह भी जरूरी नहीं कि युवा वोटर हमेशा जीतने वाली पार्टी या गठबंधन को ही वोट दें। वे हारने वाले दल का समर्थन भी कर सकते हैं, जैसा हमने उत्तराखंड और बिहार में देखा। उत्तराखंड में 2022 के विधानसभा चुनाव में 18-21 वर्ष के 48% वोटरों ने कांग्रेस को वोट दिया, जबकि भाजपा को महज 33% युवाओं के वोट मिले। लेकिन चुनाव भाजपा ने जीता। बिहार में 2020 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन चुनाव हार गया, लेकिन एनडीए की तुलना में उसे युवा वोटरों का अधिक समर्थन मिला। 18-21 वर्ष के वोटरों ने महागठबंधन को 39% और एनडीए को 24% वोट दिए थे। हालांकि 2025 में युवाओं की पसंद बदल गई और 18-21 वर्ष के वोटरों के 50% वोट एनडीए को मिले, जबकि महागठबंधन को 40% ने वोट दिया। लेकिन कुछ मौकों पर युवा वोटरों ने राजनीतिक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है। 2026 में तमिलनाडु, 2015 व 2020 में दिल्ली और 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में यह नजर भी आया है। पंजाब में आम आदमी पार्टी युवा वोटरों की सबसे पसंदीदा पार्टी बनकर उभरी थी और उसे खासकर सबसे कम उम्र वाले वोटरों का मजबूत समर्थन मिला था। दिल्ली में 2015 और 2020 के चुनावों में आम आदमी पार्टी के समर्थन में पड़ा युवाओं का वोट उसके औसत वोट शेयर से भी करीब 10% अधिक रहा। पंजाब में 2022 में 18-21 वर्ष के 47% मतदाताओं ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया, जबकि कांग्रेस को 24% और भाजपा को केवल 6% वोट मिले। कुल मिलाकर युवा वोटर भारतीय चुनावी परिदृश्य का एक ऐसा हिस्सा हैं, जो लगातार बदलते रहते हैं। इसलिए आने वाले विधानसभा चुनावों में युवा वोटर राजनीतिक तौर पर कैसा व्यवहार करते हैं, इसको लेकर कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। युवा वोटर भारतीय चुनावी परिदृश्य का ऐसा हिस्सा हैं, जो लगातार बदलते रहते हैं। इसलिए आने वाले विधानसभा चुनावों में युवा वोटर राजनीतिक तौर पर कैसा व्यवहार करते हैं, इसको लेकर कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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संजय कुमार का कॉलम:भारत की राजनीति में कोई एक समान ‘यूथ वोट’ नहीं है
