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एक शब्द है- ‘रीयलपोलिटिक’। यह उस शैली की राजनीति को कहते हैं, जिसमें राष्ट्रीय हित नैतिक आदर्शों के बजाय व्यावहारिक लक्ष्यों के आधार पर तय किए जाते हों। हाल ही में अमेरिका में ट्रम्प और शी जिनपिंग के बीच हुई समिट इसका बेहतरीन उदाहरण था। इसने फिर दिखाया कि आज वैश्विक शासन-व्यवस्था क्यों लेन-देन पर आधारित हो चुकी है। अच्छी तरह से तैयार किए गए कार्यक्रम के बावजूद शी की यात्रा से अमेरिका को बहुत कम हासिल हुआ। लेकिन आजादी के बाद से ही रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देने वाले भारत के लिए इसका संदेश स्पष्ट है : स्थायी गठबंधनों का दौर खत्म हो गया है। उसकी जगह हाइपर-ट्रांजेक्शन पर आधारित ‘शीत समझौता’ ले रहा है, जिसमें भारत को अपने रणनीतिक लक्ष्यों को बेहद व्यावहारिक नजरिए से साधना होगा। शिखर सम्मेलन के बाद अमेरिका के बयान अच्छे पीआर की तरह ही थे। उन्होंने ट्रेड सीजफायर को दो महीने और बढ़ाने की पुष्टि की, जिससे टैरिफ बढ़ाने का खतरा जनवरी 2027 तक टल गया। जवाब में बीजिंग ने भी आठ बिंदुओं वाली सहमति की घोषणा की, जिसमें 30 अरब डॉलर की टैरिफ-कमी और एआई पर औपचारिक बातचीत शुरू करना शामिल था। लेकिन जानकार विश्लेषकों ने तुरंत इन बयानों के पीछे की तस्वीर पढ़ ली। औद्योगिक सब्सिडी, सेमीकंडक्टर के निर्यात पर नियंत्रण, दक्षिण चीन सागर में टकराव और गहरे वैचारिक अविश्वास जैसे बड़े मतभेद अब भी अनसुलझे हैं। वॉशिंगटन समिट रणनीतिक रिश्तों में कोई नया मोड़ नहीं थी; यह सिर्फ एक सामरिक विराम भर थी। शी जिनपिंग और ट्रम्प ने फिलहाल तो आर्थिक नुकसान को टाल दिया है और एक-दूसरे पर अपनी निर्भरता बनाए रखी है, वहीं दोनों अपनी-अपनी घरेलू सामर्थ्य को बढ़ाने में भी लगे हुए हैं। अमेरिका और चीन के रिश्तों में और बिगाड़ का असर वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ता और भारत की घरेलू आर्थिक गति के लिए भी खतरा पैदा होता। ट्रम्प के अस्थिर बयानों ने भारत के साथ विश्वास के अभाव का संकट रचा है। अमेरिका अभी तक यह तय नहीं कर पाया है कि हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन के मुकाबले भारत को लोकतांत्रिक संतुलन के रूप में विकसित करना है या नहीं। अमेरिका-भारत व्यापार समझौता (बीटीए) अभी भी अधूरा है। अंतरिम ढांचा तैयार हो जाने के बावजूद इसे अंतिम रूप देने से जुड़ी कुछ समस्याएं बनी हुई हैं। इसी बीच, भारत ने चीन से लगी सीमा पर गश्त से जुड़े समझौतों और सीमा-निर्धारण वार्ताओं को लेकर भी कुछ कदम उठाए हैं। इनसे भारत को बीजिंग के साथ सोच-समझकर, धीरे-धीरे सामान्य होते संबंधों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की गुंजाइश मिलती है। अमेरिका और चीन के बीच बनी तात्कालिक आपसी समझ से भारत को तीन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नीतियों को तेजी से लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। पहला है सेमीकंडक्टर, जिसमें अमेरिका के कड़े निर्यात प्रतिबंधों के कारण वैश्विक टेक कंपनियां चीन के अलावा दूसरे विकल्प तलाशने को मजबूर हो रही हैं। दूसरा है, रक्षा साझेदारियां। और तीसरा है, दवा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता। हमने एआई के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन अभी चीन और अमेरिका से काफी पीछे हैं। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अमेजन अत्याधुनिक क्लोज्ड सिस्टम पर हावी हैं और भारत में क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर में अनुमानित 70 अरब डॉलर का निवेश कर चुके हैं। भारत इसमें केवल एक निष्क्रिय उपभोक्ता भर नहीं बना रह सकता। अच्छे समय में अमेरिका क्वाड और वैश्विक टेक सप्लाई चेन में भारत की भूमिका को महत्व देता है, लेकिन हमें अमेरिका के साथ ‘भरोसा करो, लेकिन परखते रहो’ वाला रवैया अपनाने की भी जरूरत है। हम न तो अमेरिकी सद्भावना पर निर्भर रह सकते हैं और न ही चीन के संयम पर। अमेरिका-चीन में मौजूदा करार को स्थायी शांति मानने के बजाय इसे आर्थिक मजबूती और तकनीकी सम्प्रभुता हासिल करने के लिए मिल रहे सीमित समय के रूप में देखना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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सचिन कलबाग का कॉलम:यूएस और चीन के मेलजोल का हम समय रहते फायदा उठाएं
