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‘मेरे सपने बहुत बड़े हैं,लेकिन अब कुछ भी संभव नहीं दिख रहा है… कभी इस तरह की स्थिति की मैंने कल्पना भी नहीं की थी, ऐसी स्थिति में पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा। जिस घर में रहकर पढ़ाई की, जहां बैठकर अफसर बनने का सपना देखा, अब उस घर का आधा हिस्सा गंगा में समा चुका है, पूरा कब समा जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता।’ भोजपुर के बड़हरा प्रखंड के पिपरपांती गांव की एक Gen-Z ने दैनिक भास्कर से बातचीत में ये बातें कही। पिपरपांती में गंगा की धार तेज हो गई है। तेज धार की वजह से गंगा अब कटाव पर अमादा है। 24 घंटे में करीब 5 घर गंगा में समा चुके हैं। अब गंगा किनारे बसे करीब 100 से अधिक घरों पर खतरा मंडराने लगा है। प्रशासन ने एहतियात के तौर पर कई घरों को खाली करा दिया गया है। इन घरों की दीवारों से खिड़की, दरवाजे निकाल लिए गए हैं। जरूरी सामान को सरकारी स्कूल में रख दिया गया है। कुछ परिवारों ने अपने बच्चों और बेटी-बहूओं को रिश्तेदारों के घर पहुंचा दिया है। भोजपुर के बड़हरा प्रखंड में बाढ़ के बाद कटाव की क्या कहानी है? कटाव को लेकर पिपरपांती गांव के लोगों का क्या कहना है? प्रशासन ने प्रभावितों के लिए क्या इंतजाम किए हैं? पढ़िए पूरी रिपोर्ट। सबसे पहले पिपरपांती गांव की तीन तस्वीरें देखिए अब पढ़िए, पिपरपांती की रहने वाली Gen-Z आयुषी ने क्या बताया? हाल ही में 12वीं उत्तीर्ण कर कॉलेज में कदम रखने वाली छात्रा आयुषी पांडे ने बाढ़ के बाद हो रहे कटाव को लेकर सरकार को खूब कोसा। कहती हैं कि ये कटाव आज अचानक नहीं हो रहा है, इसके लिए पहले व्यवस्था की जा सकती थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। आयुषी का आधा घर गंगा नदी के कटाव में पहले ही विलीन हो चुका है और बचा हुआ हिस्सा भी कभी भी ज़मींदोज़ हो सकता है। आयुषी ने बताया कि अभी 12वीं पूरी हुई है और ग्रेजुएशन में एडमिशन लिया है। जिस स्थिति की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, वैसा जीवन बन गया है। यहां रहना बहुत मुश्किल हो गया है। मैं रात-रात सो नहीं पाती हूं, उठ-उठकर देखना पड़ता है कि कहीं गंगा जी के कटाव में हमारा बचा हुआ घर न चला जाए। आयुषी ने कहा कि सरकार बोलती है कि हम ये कर रहे हैं, वो कर रहे हैं… लेकिन जो लोग आपदा से पीड़ित हैं, उनके लिए सरकार कहां है, हम लोगों को देखने वाली सरकार का कुछ नहीं पता। अगर आप वास्तव में एक शिक्षित और अच्छा समाज बनाना चाहते हैं, तो पहले आपदा पीड़ितों की समस्या हल कीजिए। ये तो वही हुआ कि आप आपदा में अवसर तलाश रहे हैं। ‘बाढ़ प्रभावितों को रहने की अच्छी जगह नहीं, अधिकारी चैन की नींद सो रहे हैं’ जेन-जी आयुषी कहती हैं कि जो बड़े-बड़े अधिकारी हैं, जो खुद व्यवस्थित तरीके से हैं, उन्हें इसका बहुत लाभ मिल रहा है। और जो पीड़ित हैं, उन्हें न रहने को सही घर मिल पा रहा है, न वे चैन से सो पा रहे हैं। वे कहती हैं कि रोटी, कपड़ा और मकान हमारी मूल आवश्यकतां हैं, पर यहां हमारा मकान ही सुरक्षित नहीं है। पढ़ाई तो जारी रखनी ही पड़ेगी, क्योंकि यहां से निकलने का पढ़ाई ही एकमात्र साधन है। लेकिन ऐसे माहौल में पढ़ाई कैसे हो सकती है, जब आंखों के सामने घर गंगा में समा रहा हो। वे कहती हैं कि कमी व्यवस्था में है। शासन की योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुंच रहा, जिन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। आयुषी ने बताया कि इस व्यवस्था को बदलने के लिए खुद को योग्य बनाना होगा ताकि बड़े स्तर पर हमारी बात सुनी जा सके, क्योंकि यहां से सरकार तक आवाज़ पहुंचना नामुमकिन है। ‘आठ पीढ़ियों का घर गंगा में समा गया, अब परिवार के 18 लोग कहां जाएं’ पिपरपांती के राम पुकार पांडेय कहते हैं कि मेरा आठ पीढ़ियों का घर गंगा में चला गया, अब समझ नहीं आ रहा 18 लोग कहां जाएंगे। वे बताते हैं कि हमारे पूर्वजों के समय से हमारा परिवार इसी जगह पर बसा हुआ है। यह सिर्फ हमारा घर नहीं था, इसमें हमारी आठ पीढ़ियों की यादें, मेहनत और पूरा जीवन बसा हुआ था। लेकिन आज गंगा के कटाव ने हमारा आधे से ज्यादा घर अपने अंदर समा लिया है। हमने अपने हाथों से इस घर को बनाया था। इसे बनाने में कितनी मेहनत लगी, कितना पैसा लगा और कितनी यादें जुड़ी हैं, यह वही समझ सकता है जिसने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा एक घर को खड़ा करने में लगा दिया हो। आज उसी घर को अपनी आंखों के सामने नदी में जाते देखता हूं तो आंखों में आंसू आ जाते हैं। ‘14 की शाम को हम लोग बैठे थे, कटाव की खबर आई’ राम पुकार पांडेय बताते हैं कि हम चार भाई हैं और पूरा परिवार संयुक्त है। करीब 18 से 20 लोग इसी घर में रहते थे। चारों भाइयों के बच्चों को मिलाकर सात लड़के और सात लड़कियां हैं। मेरे अपने तीन बेटे और एक बेटी है। बच्चे पढ़ते-लिखते हैं और हम लोग खेती-किसानी करके परिवार चलाते हैं। 14 तारीख की शाम करीब सात बजे मैं गांव में दूसरी जगह बैठा था। अचानक घर से खबर आई कि घर कटने लगा है। हम लोग दौड़कर पहुंचे। जो सामान जितनी जल्दी निकाल सकते थे, निकालने लगे। लेकिन इतना बड़ा परिवार है, सब कुछ एक साथ कैसे निकाल लेते? अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम जाएं तो जाएं कहां? हमारे पास इतना पैसा नहीं है कि आरा में फ्लैट खरीद लें। किराए पर भी कितने कमरे लेंगे? 18-20 लोगों के रहने के लिए अलग जगह चाहिए, बच्चों के लिए जगह चाहिए और इतने सालों का सामान रखने के लिए भी जगह चाहिए। सरकारी मदद की बात करें तो अभी तक हमें कोई मदद नहीं मिली है। हम किसी के सामने हाथ फैलाकर मदद लेने वाले लोग नहीं हैं। लेकिन सच यह है कि परिवार को एक जगह से दूसरी जगह बसाना आसान नहीं है। इसमें बहुत समय लगेगा और बहुत पैसे की जरूरत पड़ेगी। चार भाइयों के परिवार के रहने के लिए कमरे चाहिए, बच्चों के लिए जगह चाहिए और सामान रखने की भी व्यवस्था चाहिए। अब घर तो नहीं बचा, बस यही उम्मीद है कि हमारा परिवार सुरक्षित रहे और सरकार हमें इतनी मदद दे कि हम अपने बच्चों के साथ कहीं दोबारा जिंदगी शुरू कर सकें। ‘अधिकारियों के सामने हाथ जोड़ते रहे, लेकिन हमारी आवाज नहीं सुनी गई’ कटाव पीड़ित गुड्डू ने बताया कि पिछले करीब 15 दिनों से हमारे गांव की स्थिति बहुत खराब है। एक सितंबर को पहली बार तेज कटाव हुआ था और देखते ही देखते चार-पांच घर गंगा में विलीन हो गए। उस दिन से हम लगातार अधिकारियों को बता रहे थे कि कटाव बहुत तेजी से बढ़ रहा है और अब हमारे घरों के पीछे भी खतरा है। हमने सीओ से भी कहा था कि समय रहते अगर कटाव रोकने का इंतजाम नहीं किया गया तो कई घर गंगा में चले जाएंगे। हम लोग अधिकारियों के सामने हाथ जोड़कर कहते रहे कि हमारे घरों के पीछे कटाव होने वाला है, लेकिन हमारी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया। अगर उसी दिन हमारी बात सुन ली जाती और समय पर काम शुरू कर दिया जाता, तो शायद आज हमारा घर बच जाता। हम अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने के लिए बार-बार गए। ऐसा लगता था जैसे हम अपनी आवाज पूरी ताकत से उन तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हमारी आवाज उनके कानों तक पहुंच ही नहीं रही थी। हमें सिर्फ भरोसा दिलाया जाता रहा कि आपका घर नहीं कटेगा। लेकिन उसके बाद आज तक वही अधिकारी हमें दिखाई नहीं दिए। ‘तीन दिनों से हाथी पांव वाले पिलर रखे रह गए, काम समय पर नहीं हुआ’ गुड्डू ने कहा कि तीन दिनों से हाथी पांव वाले पिलर रखे हुए थे। अगर उन्हें समय रहते कटाव वाले स्थान पर डाल दिया जाता तो शायद स्थिति कुछ अलग होती। लेकिन काम समय पर नहीं हुआ। अधिकारी अपनी तरफ से काम कर रहे हैं, लेकिन जिस परिवार का घर गंगा में जा रहा है, उसका दर्द वही परिवार समझ सकता है। अब हालात यह हैं कि मंगलवार की देर शाम हमारे घर की एक दीवार गंगा में समा गई। इसके बाद से हम लोग रातभर जागकर घर की रखवाली कर रहे हैं। हर वक्त डर लगा रहता है कि पता नहीं अगला हिस्सा कब गंगा में चला जाए और कहीं कोई बड़ी अनहोनी न हो जाए। हमारी मांग सिर्फ इतनी है कि अब तो हमारी बात सुन ली जाए। जिन घरों पर कटाव का खतरा है, उन्हें बचाने के लिए तत्काल काम कराया जाए। हमने समय रहते अधिकारियों को चेतावनी दी थी। अगर उस समय हमारी बात सुन ली जाती, तो आज हमें अपने घर को अपनी आंखों के सामने गंगा में जाते देखने की नौबत नहीं आती। ‘105 साल पुराना घर नहीं, हमारी पीढ़ियों की पहचान गंगा में विलीन हो रही है’ कृष्ण कुमार पाण्डेय ने बताया कि ये घर सिर्फ हमारा मकान नहीं था, बल्कि हमारे पूरे परिवार के बहुत बड़े सपनों की निशानी था। करीब 105 साल पहले हमारे पूर्वजों ने अपने खून पसीनो के पैसों से इस घर का निर्माण कराया था। तब से लेकर आज तक हमारी कई पीढ़ियां इसी घर में पली-बढ़ीं। इस घर की हर दीवार और हर आंगन में हमारे परिवार की यादें जुड़ी हुई हैं। वे कहते हैं कि सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि बाढ़ आने के बाद जब घर पर खतरा बढ़ने लगा, तब भी कोई अधिकारी यहां देखने तक नहीं आया। हमने कई बार शिकायत की, अधिकारियों को स्थिति के बारे में बताया, लेकिन इसके बावजूद हमारे घर को बचाने के लिए समय पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। कृष्ण कुमार पांडेय के मुताबिक, ये घर सिर्फ हमारे परिवार का सपना नहीं था। गांव के गरीब और पिछड़े लोगों का भी इस घर से भावनात्मक जुड़ाव रहा है। इस घर के आंगन से गांव की कई बेटियों की शादियां हुई हैं। जिन गरीब परिवारों के पास शादी समारोह के लिए जगह नहीं होती थी, वे हमारे इसी घर के आंगन में कार्यक्रम करते थे। यह घर हमेशा गांव के लोगों के लिए खुला रहा। आज वही घर गंगा में विलीन हो रहा है। ‘24 घंटे में 6-7 घर गंगा में समा गए, फिर भी हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं’ धन बिहारी पांडेय ने बताया 14 सितंबर की देर शाम से एक बार फिर हमारे गांव में कटाव शुरू हो गया। देर रात तक इतनी तेजी से कटाव हुआ कि हम लोग डर के मारे घर में बैठ भी नहीं पा रहे थे। हालत यह है कि न ठीक से खाना खा पा रहे हैं और न चैन की नींद सो पा रहे हैं। पूरी रात यही डर लगा रहता है कि पता नहीं अगला घर किसका गंगा में चला जाएगा। इससे पहले भी एक सितंबर को इसी तरह भीषण कटाव हुआ था। उस समय करीब दस दिनों तक हम लोग ठीक से सो नहीं पाए थे। बड़ी मुश्किल से स्थिति थोड़ी संभली थी, लेकिन अब दोबारा कटाव शुरू हो गया है। पिछले 24 घंटे में ही करीब 6-7 घर गंगा में विलीन हो चुके हैं। इतने घर उजड़ गए, लेकिन इसके बावजूद अब तक कोई सरकारी राहत हम लोगों तक नहीं पहुंची है। न राहत सामग्री मिल रही है और न ही हमारे रहने की कोई व्यवस्था की गई है। जिन लोगों के घर चले गए, वे अपना सामान लेकर इधर-उधर भटक रहे हैं। जिनके घर अभी बचे हुए हैं, वे भी चैन से नहीं रह पा रहे हैं। हर परिवार को डर है कि अगली बारी कहीं उसके घर की न हो। वे बताते हैं कि एक बार सांसद पप्पू यादव गांव में आए थे और उन्होंने कुछ आर्थिक मदद भी की थी। लेकिन इतने बड़े संकट में इतनी मदद से पूरे गांव की समस्या खत्म नहीं हो सकती। हमें स्थायी समाधान चाहिए, ताकि हर साल बाढ़ और कटाव के समय हमें अपना घर बचाने के लिए इस तरह संघर्ष न करना पड़े। सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि न विधायक दिखाई दे रहे हैं, न मंत्री। चुनाव के समय यही नेता हाथ जोड़कर वोट मांगने हमारे दरवाजे तक आते हैं। लेकिन आज जब ग्रामीणों के घर गंगा में समा रहे हैं, लोग बेघर हो रहे हैं और रात-रात भर जागकर अपनी जान और घर की रखवाली कर रहे हैं, तब पूछने वाला कोई नहीं है। गंगा किनारे बने घरों को बचाने के लिए देसी जुगाड़ अपना रहे प्रभावित बाढ़ के बाद कटाव की जद में आए पिपरपांती के लोग अपने घर बचाने के लिए देसी जुगाड़ लगा रहे हैं। पेड़ों को काटकर गंगा के किनारे ठोकर बनाई जा रही है, ताकि नदी की तेज धार को किसी तरह रोका जा सके। लेकिन अगर गंगा की धार इसी तरह तेज रही तो जो घर अभी बचे हुए हैं, वे भी ज्यादा दिनों तक नहीं बच पाएंगे। भोजपुर में बाढ़ से अलग-अलग प्रखंड के करीब 200 से अधिक गांव बाढ़ से प्रभावित हैं। बाढ़ की चपेट में अब तक करीब 5 लाख लोग आए हैं। भोजपुर के डीएम मनेश कुमार मीणा के निर्देशानुसार प्रभावित क्षेत्रों में 78 कम्यूनिटी किचन का संचालन किया जा रहा है। वहीं, बाढ़ प्रभावित इलाकों में सुरक्षित आवागमन, राहत कार्यों के लिए 243 निजी नाव, SDRF की 6 मोटर बोट और 4 एंबुलेंस बोट एक्टिव है। जिले के बाढ़ प्रभावित प्रखंडों में 25 स्वास्थ्य शिविरों लगाए गए हैं, जहां अब तक 10,000 से अधिक लोगों का इलाज कराया जा चुका है। वहीं, प्रभावितों को 5,933 हैलोजन टैबलेट्स वितरित किए गए, 22 स्थानों पर ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव कराया गया। प्रभावित परिवारों के बीच अब तक 13,321 पॉलिथीन शीट्स का वितरण किया जा चुका है। आखिर में पिपरपांती गांव की कुछ तस्वीरें देखिए
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‘सपने बहुत थे… अब कुछ भी संभव नहीं दिख रहा’:आंखों के सामने गंगा में समा रहे घर, भोजपुर में गंगा के कटाव पीड़ितों की आपबीती
