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सिर से जुड़ीं दो बहनें अब अलग नहीं होना चाहतीं:सलमान खान ने बहन बनाया, इलाज का वादा किया, अब फोन तक नहीं उठाते




ये हैं सबा और फरहा। उम्र 24 साल। दोनों का जन्म एक दिन, एक समय और एक ही मां की कोख से हुआ, सो ये जुड़वां कहलाती हैं। लेकिन… इनके जिस्म अलग-अलग नहीं, सिर से आपस में जुड़े हैं। वो भी इस तरह कि दोनों एक दूसरे को देख नहीं सकतीं। आईने में भी नहीं, अगर एक का रुख आईने की तरफ होता है तो दूसरी का उसके उलट। सबा और फरहा की कहानी लिखने में ‘लेकिन’ शब्द जल्द खत्म नहीं होते… इनके सिर जुड़े हुए हैं, लेकिन ये दोनों अलग-अलग शख्सियतें हैं।
इनके दिमाग अलग-अलग हैं, लेकिन उन तक खून पहुंचाने वाली नस एक ही है।
इनके सिर को छोड़कर बाकी जिस्म अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों के पास किडनी सिर्फ एक जोड़ी हैं।
दोनों सोचती अलग-अलग हैं, लेकिन ज्यादातर काम एक साथ करने होते हैं। फिर चाहे चलना-फिरना हो या सोना-जागना। दोनों के नर्वस सिस्टम अलग-अलग हैं, लेकिन कभी सबा के शरीर को फरहा कंट्रोल करती है तो कभी फरहा के शरीर को सबा। ये दो जिस्म एक जान हैं या दो जान एक जिस्म या फिर दो जिस्म दो जान, कहना मुश्किल है। खैर… मैं नीरज झा दुर्लभ बीमारियों की सीरीज ‘ऐ जिंदगी’ में इस बार इन्हीं दो बहनों की कहानी लाया हूं… दोपहर के करीब 1 बज रहे हैं। पटना के समनपुरा इलाके की मदरसा रोड। यहां एक चार मंजिला मकान है। दस्तक देने पर एक बुजुर्ग महिला ने दरवाजा खोला। बिना कुछ कहे वो मुझे पहली मंजिल पर बने एक कमरे की ओर ले गईं। पूछने पर उन्होंने अपना नाम- रबिया खातून बताया। मुझे सोफे पर बैठने का इशारा करते हुए बोली- यहीं बैठिए, मैं बेटियों को बुलाती हूं। उन्होंने सीढ़ियों पर खड़े होकर आवाज लगाई- ‘सबा… फरहा…’ करीब 5 मिनट के बाद, दो लड़कियां सीढ़ियों की रैलिंग के सहारे लड़खड़ाते, डगमगाते कदमों से आईं। छोटे-छोटे बाल। आंखों के नीचे काले घेरे। पैर की उंगलियां भी तिरछी। कदम बढ़ाते या उठते-बैठते, हर वक्त दोनों इस बात का ध्यान रख रही हैं कि एक-दूसरे का सिर न खिंचे। एक का सिर जरा सा ज्यादा हिलने पर दूसरी कराह उठती है। जैसे-तैसे दोनों सामने वाले सोफे पर आकर बैठीं। थोड़ी देर बाद, एक ने ऊपर की तरफ देखकर कहा- मैं सबा हूं और ये फरहा। सबा कहती हैं- जब आप आए, तब मैं खाना खा रही थी। फरहा को न चाहते हुए भी मेरे साथ बैठना पड़ा… क्या करे, मुझसे चिपकी हुई जो है। 24 सालों में हम दोनों में से कोई भी करवट लेकर सो नहीं सका है। मैं बीमार पडूं या फरहा… अस्पताल दोनों को जाना पड़ता है। अब तो जिंदगी से कोई शिकायत नहीं। अलग हुए तो शायद जिंदा न बचें। जब तक सांसें चल रही हैं, ऐसे ही हम साथ रहेंगी। तभी फरहा कहती हैं- जब छोटे थे, तो आस थी कि डॉक्टर ऑपरेशन करके हमको अलग-अलग कर देंगे। हम एक-दूसरे के गले लग सकेंगे। आमने-सामने बैठकर बातें करेंगे, लेकिन ये सब सपना ही रहा। अब तो हम ऐसे ही रहना चाहते हैं। मैं डॉक्टर बनना चाहती थी और सबा टीचर। जब हम 7-8 साल की हुईं, तो अम्मी-अब्बू स्कूल लेकर गए। टीचर कहने लगीं- ऐसे बच्चों को हम कैसे पढ़ाएंगे। इन्हें कौन संभालेगा। बच्चे इन्हें देखकर डर जाएंगे। बस, उनके शब्दों ने हमारे लिए स्कूल के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए। फरहा कहती हैं- उम्र के साथ हमारा थायराइड बढ़ गया और गठिया भी हो गया। पूरे जिस्म में हर वक्त दर्द रहता है। हम दोनों दिन-रात कराहती रहती हैं। जब भी आसपास के लोगों को हंसते-खेलते देखती हूं, तो खुदा से मन ही मन पूछती हूं- हम बहनों को किस बात की सजा दी। कुछ पल खामोश रहने के बाद फरहा कहती हैं- दर्द कितना भी हो, हम एक-दूसरे से अलग रहने के बारे में सोच नहीं सकतीं। मन करता है कि अम्मी-अब्बू के साथ हज पर जाएं, खुली हवा में सांस लें, दुनिया देखें और बाकी लड़कियों की तरह खुलकर अपनी जिंदगी जीएं, लेकिन मजबूरी है। इस चारदीवारी के बाहर कदम रखने से पहले हमें कई बार सोचना पड़ता है। इसी बीच, सबा कहती हैं- मेरी तो अब एक ही ख्वाहिश है- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और मुकेश अंकल से मिलना है। जब मिलूंगी, तो मन की बात कहूंगी। सबा यहां उद्योगपति मुकेश अंबानी को मुकेश अंकल कहती है। मैंने पूछा- उनसे क्या कहना चाहती हो? वो राज की बात है। आपको नहीं बता सकती। बस कोई हमें उनसे मिलवा दे। इसी बीच, एक शख्स कमरे में आता है। सबा बताती हैं- ये हमारे बड़े भाई मोहम्मद तमन्ना हैं। यही हमारी देखरेख करते हैं। फिर कहती हैं- हमारे लिए सजने-संवरने का कोई मतलब नहीं है। हम खुद कोई काम नहीं कर पातीं। ब्रश कराने और खाना खिलाने से लेकर नहाने और वॉशरुम ले जाने तक, सब कुछ घरवाले करते हैं। इसी बीच, भाई तमन्ना बोला- ये दोनों ज्यादा बात नहीं कर पातीं। ज्यादा देर तक बैठ भी नहीं सकतीं, दर्द होता है। तमन्ना के इतना कहते ही सबा और फरहा उठती हैं और लड़खड़ाते हुए उसी सीढ़ी के सहारे नीचे चली जाती हैं। तमन्ना बताते हैं- हम 8 भाई-बहन हैं। ये दोनों चौथे और पांचवें नंबर की है। मैं इनसे 13 साल बड़ा हूं। इनकी हर तकलीफ का गवाह हूं। अम्मी-अब्बू पढ़े-लिखे नहीं हैं, इसलिए मदद मांगने में हमेशा झिझकते हैं। नतीजा- पिछले 24 सालों से दोनों घर में कैद हैं। जब ये छोटी थीं, तो हम इन्हें पैदल या ऑटो से कभी-कभार मार्केट ले जाते थे, लेकिन ये जहां भी जातीं, लोग तमाशा बना देते। उल्टे-सीधे सवाल पूछते। तरह-तरह की बातें करते, इसीलिए हमने इन्हें बाहर ले जाना छोड़ दिया। 2002 की बात है। अम्मी पेट से थीं। तब हमारे यहां अल्ट्रासाउंड या एडवांस टेस्ट नहीं होते थे। जब घर पर डिलीवरी की कोशिश नाकाम हो गई। अम्मी की हालत बिगड़ने लगी, तो अब्बू आनन-फानन में उन्हें पटना के त्रिपोलिया हॉस्पिटल लेकर भागे। वहां डॉक्टरों ने बताया- पेट में जुड़वां बच्चे हैं, इसलिए नॉर्मल डिलीवरी मुमकिन नहीं। तुरंत बड़ा ऑपरेशन करना पड़ेगा। जैसे ही इन दोनों का जन्म हुआ, अस्पताल में सन्नाटा छा गया। दोनों के हाथ-पैर और जिस्म तो अलग-अलग थे, लेकिन सिर आपस में जुड़े थे। डॉक्टर से पूछा, क्या इनके सिर अलग हो सकते हैं? उन्होंने कहा- जब दोनों बड़ी होंगी, तो सर्जरी से अलग हो जाएंगे। अम्मी-अब्बू इन्हें लेकर गांव लौट आए। पूरे इलाके में बातें होने लगीं मोहम्मद शकील के घर सिर जुड़ी दो लड़कियां पैदा हुई हैं। तमन्ना कहते हैं कि- बहनों के घर आते ही सर्कस, तमाशे जैसी भीड़ हमारे घर के बाहर लगने लगी। लोग-रिश्तेदार सब इन्हें देखने के लिए आने लगे। कई लोग तो अम्मी-अब्बू को ये सलाह भी दे जाते थे कि ऐसी बेटियों को क्यों पाल रहे हो, कहीं छोड़ आओ। तब मेरे अब्बू ने हिम्मत दिखाई, कहा- जैसी भी हैं, मेरी बेटियां हैं। जब तक जिंदा हैं, देखभाल करेंगे। फिर वे सभी को लेकर पटना आ गए। यहां चाय का ठेला लगाकर गुजारा करने लगे। दरअसल, हम लोगों को लग रहा था कि जब ये बड़ी होंगी, तो सर्जरी करा देंगे। इनके शरीर अलग हो जाएंगे। फिर जैसे बाकी बहनें हैं, वैसे ये दोनों भी हो जाएंगी। इतने पैसे ही नहीं थे कि बड़े डॉक्टर से सलाह ले पाते। इनके जन्म के वक्त डॉक्टर ने जो बता दिया, वही अब्बू ने सच मान लिया। 2005 में उत्तरप्रदेश के किसी शहर से एक शख्स घर आया। उसने बताया कि अबूधाबी के प्रिंस शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने सबा-फरहा के बारे में मीडिया में देखा-सुना है। वो हमारी मदद करना चाहते हैं। उसने प्रिंस से हमारी बात कराई। प्रिंस ने वादा किया था कि वह सबा-फरहा के ऑपरेशन का पूरा खर्च उठाएंगे। उनकी पहल पर अमेरिका के मशहूर न्यूरोसर्जन डॉ. बेंजामिन कार्सन भारत आए। उन्होंने दिल्ली के अपोलो अस्पताल में सबा-फरहा की एंजियोग्राफी और कई जटिल जांचें कीं। तब डॉ. कार्सन ने बताया था कि दोनों को अलग करना संभव है, लेकिन ऑपरेशन जोखिम भरा है। जान भी जा सकती है। इसी डर से अम्मी-अब्बू ने सर्जरी कराने से इनकार कर दिया। इसके बाद से प्रिंस की ओर से बातचीत भी बंद हो गई। मो. तमन्ना बताते हैं- साल 2009 में, मीडिया के जरिए अभिनेता सलमान खान को पता चला कि सबा-फरहा उनकी फैन हैं। राखी बांधना चाहती हैं, तो उन्होंने खुद पूरे परिवार के लिए फ्लाइट की टिकटें भेजीं। मुंबई में अपने घर बुलाया और सबा-फरहा से राखी बंधवाई। खूब बातें कीं। सलमान ने वादा किया था दोनों को गोद लेंगे। मदद करेंगे। इलाज कराएंगे। हालांकि, बाद में कोई पूछने नहीं आया। जो शख्स उनसे बात करवाता था, अब वो फोन भी नहीं उठाता। इसके बाद, 2012 में इनके इलाज का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली एम्स के डॉक्टरों की टीम बनी। टीम पटना आई। डॉक्टरों ने दोनों की MRI, एंजियोग्राफी समेत तमाम जांचें करवाई। रिपोर्ट देखने के बात डॉक्टरों ने कहा-सबा-फरहा का सिर्फ सिर ही नहीं, बल्कि सिर से गुजरने वाली खून की नली और नसें भी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में अगर इन्हें सर्जरी के जरिए अलग करने की कोशिश की गई, तो दोनों या फिर किसी एक की जान जाना तय है। सबा के शरीर में किडनी नहीं है। अलग करने के बाद सबा को तुरंत किडनी की जरूरत होगी, जो इस खतरे को कई गुना और बढ़ा देगी। यह सुनते ही अम्मी-अब्बू ने सर्जरी से इनकार कर दिया। इसके बाद, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को आदेश दिया कि दोनों के इलाज और दवाइयों का पूरा खर्च उठाएं। परिवार की आर्थिक सहायता भी करें। पटना के सिविल सर्जन को आदेश दिया कि हर तीन महीने में दोनों की जांच करें। रिपोर्ट दिल्ली एम्स भेजें, लेकिन चार-पांच साल से कोई पूछने तक नहीं आया। दोनों के लिवर में सूजन है। जोड़ों में दर्द रहता है। आपने तो देख लिया होगा कि दोनों कितनी कमजोर हो गई हैं। जब मैं इन्हें देखता हूं, तो दुख होता है। दूसरी ओर, समाज के ताने रोज हमारी रूह छीलते हैं। कहते हैं- बेटियों के इलाज के नाम पर हमें सलमान खान और अबू धाबी के प्रिंस से करोड़ों रुपये मिले हैं। मीडिया वालों से भी इंटरव्यू और वीडियो बनाने के बदले पैसे वसूलते हो। तुम्हें क्या फिक्र, तुम्हें तो बेटियां कमा कर दे रही हैं। मैं किस-किस का मुंह बंद करूं, किस-किस को सफाई दूं। लोग बस तमाशा देखते हैं। उंगलियां उठाते हैं, लेकिन हमारा दर्द, हम ही जानते हैं। बाकी बहनों की शादी हुई, तो अम्मी कहने लगीं- काश ! सबा-फरहा भी अच्छी होती, तो इनकी भी शादी होती, लेकिन क्या करें। मैं फूड स्टॉल लगाकर बमुश्किल 500-600 रुपए कमाता हूं। जैसे-तैसे इनकी देखभाल करता हूं। इनका आगे क्या होगा, अल्लाह ही जाने। ये कहकर तमन्ना एक गहरी सांस लेते हैं। इसके बाद, मैं सबा-फरहा की अम्मी रबिया खातून से बेटियों के बारे में कुछ पूछने की कोशिश करता हूं। तमन्ना फौरन इनकार कर देते हैं। तस्वीर भी नहीं खींचने देते। कहते हैं- इतनी बातचीत बहुत है। अब आप जाइए। मुझे दुकान के लिए निकलना है। अब एक सेकेंड भी बात नहीं कर सकता। सबा-फरहा की जिंदगी को करीब से देखने के बाद बतौर रिपोर्टर मेरे मन में कई सवाल उठ रहे हैं। इनका जवाब जानने के लिए मैं पटना के इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (IGIMS) पहुंचा। जहां मेरी मुलाकात न्यूरो सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. समरेंद्र कुमार से हुई। सबा-फरहा की जांच के लिए AIIMS दिल्ली से जो टीम आई थी, डॉ. समरेंद्र उस टीम का हिस्सा थे। वो बताते हैं- सबा-फरहा को कोई बीमारी नहीं है, यह एक जैविक चूक है। इसे क्रेनियोपैगस कहते हैं। गर्भधारण के पहले दिन, महिला का अंडाणु और पुरुष का शुक्राणु मिलकर एक जायगोट (एकल कोशिका) बनाते हैं। सामान्यतः इससे एक ही बच्चा विकसित होता है। जब यह एक जायगोट गर्भ में विकसित होना शुरू होता है, तो एक समान जुड़वां बच्चे बनने के लिए इस जायगोट को दो अलग-अलग हिस्सों में बंटना पड़ता है। शुरुआती दो हफ्तों के भीतर, कोशिकाएं बंटकर दो अलग-अलग बच्चों का रूप ले रही होती हैं। लेकिन किसी जैविक चूक के कारण, बंटवारे की यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती। यह प्रक्रिया जहां रुकती है, शरीर का वह हिस्सा आपस में जुड़ा रह जाता है। सबा और फराह के मामले में यह रुकावट सिर के हिस्से पर हुई। सबा-फरहा का जुड़ाव सिर्फ ऊपरी चमड़ी या हड्डी तक सीमित नहीं है। अगर ऐसा होता, तो सर्जरी आसान होती। उनके दिमाग में ब्लड सप्लाई करने वाली मुख्य नस भी आपस में गुथी हुई है। यही कारण है कि ऑपरेशन करने पर किसी एक या दोनों की जान जाने का खतरा है। दोनों बहनों का नर्वस सिस्टम एक ही जगह से जुड़ा होने के कारण सबा के दिमाग से निकला सिग्नल कभी-कभी फरहा के अंगों तक पहुंच जाता है और फरहा का सिग्नल सबा तक। इससे दोनों के दिमागी सिग्नलों में टकराव हो जाता है। ऐसे समझें- जब फरहा सोती है, तो सबा जाग सकती है क्योंकि सोने और जागने को नियंत्रित करने वाला दिमाग का केंद्र दोनों का अपना-अपना है। अगर सबा कुछ खाती है, तो उसका स्वाद सिर्फ सबा को ही आता है, फरहा को नहीं, क्योंकि दोनों की स्वाद ग्रंथियां और दिमागी सिग्नल अलग हैं। लेकिन जब सबा अपने पैर को आगे बढ़ाने का फैसला करती है, तो उसके दिमाग से निकला सिग्नल उस साझा नस से होकर गुजरता है जो फरहा से भी जुड़ी है। नतीजा-वह सिग्नल आधा सबा के पैर में जाता है और आधा फरहा के। इससे कई बार भ्रम की स्थिति बन जाती है। ऐसे बच्चों की सर्जरी जन्म के कुछ साल बाद ही हो जानी चाहिए, लेकिन सबा-फरहा के मामले में यह कभी मुमकिन नहीं था। उम्र बढ़ने के साथ इनका शरीर कमजोर होता जाएगा। ऐसे बच्चे अधिकतम 30 से 40 वर्ष ही जी पाते हैं। डॉ. समरेंद्र से मिलने के बाद मैं IGIMS के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. विनीत ठाकुर से मिला। उन्हें सबा और फरहा की तस्वीर दिखाई। वे कहते हैं- ऐसे मरीजों का दिमाग दो हिस्सों में विकसित होने के बावजूद आपस में इस कदर घुला-मिला है कि इसे सर्जरी से अलग करना असंभव है। यदि दोनों शरीर लिवर साझा कर रहे होते, तो उसे काटना मुमकिन था, क्योंकि लिवर दोबारा बढ़ जाता है। लेकिन दिमाग का जो हिस्सा एक बार कट गया, वह कभी दोबारा नहीं बढ़ता। सिर की मुख्य नसों के साझा होने के कारण यह सर्जरी जानलेवा है। सामान्य जुड़वां बच्चे 3 साल की उम्र तक अपनी अलग पसंद-नापसंद बना लेते हैं। लेकिन सबा-फरहा के मामले में ऐसा नहीं हो सका। वे एक जैसा ही सोच पाती हैं। चूंकि दोनों के शरीर की ‘सप्लाई चेन’ एक है, इसलिए एक की बीमारी दोनों को प्रभावित करती है। उनकी सबसे बड़ी पीड़ा उनका रोज का तालमेल है। जहां एक बहन सोना चाहती है तो दूसरी जागना, एक बैठना चाहती है तो दूसरी चलना। एक की शारीरिक जरूरत, दूसरी की मजबूरी है। ————————————- ऐ जिंदगी सीरीज की यह खबर भी पढ़ें… 1- चेहरे पर मांस के लोथड़े देख लोग कहते हैं भूत:शक्ल देखकर 5 लोग गड्ढे में जा गिरे, मां बोली-मरेगा तभी बला टलेगी
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