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नक्सल मामलों में वर्षों से जेल में बंद बताए जा रहे निर्दोष आदिवासियों की रिहाई की मांग अब तेज होती जा रही है। इसी क्रम में कांग्रेस जिलाध्यक्ष हरीश कवासी ने तिम्मापुरम सहित प्रभावित गांवों के परिवारों से मुलाकात की। मुलाकात के दौरान कई परिवारों ने अपनी व्यथा साझा की। तिम्मापुरम की सोनमती यादव ने बताया कि उनके पति पिछले साढ़े तीन वर्षों से जेल में बंद हैं। दो छोटे बच्चों की जिम्मेदारी अब अकेले उनके कंधों पर है। उन्होंने पति की पैरवी के लिए गाय-बकरियां बेचकर 25 हजार रुपये वकील को दिए, लेकिन आज भी न्याय की उम्मीद अधूरी है। पिता दो साल से जेल में बंद इसी गांव के माड़वी दिनेश ने बताया कि उनके पिता माड़वी हूंगा दो वर्षों से जेल में हैं। उनका कहना है कि उनके पिता स्वयं सरेंडर करने पहुंचे थे, लेकिन उन्हें चिंतलनार ले जाकर जेल भेज दिया गया। वहीं वेट्टी हूँगी ने बताया कि तीन वर्ष पहले उनके पति वेट्टी लखमा और बेटे वेट्टी रेनू को एक साथ घर से ले जाया गया था। धान बेचकर अब तक 40 हजार रुपये वकीलों को दिए जा चुके हैं, लेकिन परिवार को कोई राहत नहीं मिली। बेटे की शादी के महज दस दिन बाद ही उसे ले जाया गया, जिसके बाद नई बहू आज भी उसके लौटने का इंतजार कर रही है। निष्पक्ष जांच होनी चाहिए: हरीश कवासी हरीश कवासी ने कहा कि जिन आदिवासियों के बारे में यह दावा किया जा रहा है कि वे निर्दोष हैं, उनके मामलों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए और उन्हें शीघ्र न्याय मिलना चाहिए। उन्होंने परिजनों की बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी से भी फोन पर बात कराई। विधायक ने आश्वस्त किया कि मामलों को गंभीरता से उठाकर न्याय दिलाने का हरसंभव कोशिश करेंगे। परिजनों ने भी मांग की कि पर्याप्त साक्ष्य नहीं होने वाले मामलों की शीघ्र समीक्षा कर निर्दोष लोगों को रिहा किया जाए, ताकि वर्षों से पीड़ा झेल रहे परिवारों को राहत मिल सके।
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सुकमा में लखमा आदिवासी परिवारों से मिले:बोले- निर्दोष आदिवासियों की रिहाई जल्द होनी चाहिए, सरकार से मांग करेंगे
