सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, मुख्य सचिव को दिया आदेश:सरकार को निजी विश्वविद्यालय के 5 साल का देना होगा हिसाब




सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों की सरकारों से निजी विश्वविद्यालय के पिछले पांच साल के कार्यकलापों पर रिपोर्ट मांगी है। इसमें एडमिशन, फीस और वेतन आदि का हिसाब देना होगा। कोर्ट ने झारखंड के मुख्य सचिव को छह सप्ताह के भीतर सभी निजी विश्वविद्यालयों से जानकारी जुटाकर हलफनामा दायर करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोई भी निजी विश्वविद्यालय मुनाफा कमाने वाली संस्था के रूप में नहीं चल सकता। राज्य सरकारों को अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी विश्वविद्यालयों से पिछले पांच साल का ऑडिटेड वित्तीय ब्योरा लेना होगा। साथ ही चेताया है कि निजी विश्वविद्यालय अपनी ओर से जो जानकारी दे, सिर्फ उसी को आगे न बढ़ाएं। सरकार अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए पूरी जानकारी जुटाएं। जरूरत पड़े तो संबंधित संस्थानों के खिलाफ कड़े कदम भी उठाए जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद झारखंड सरकार ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है। उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग इसके लिए प्रारूप तैयार कर रहा है। प्रारूप तैयार होने के बाद सभी 19 निजी विश्वविद्यालयों से इसकी जानकारी मांगेगी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अब 11 नवंबर को सुनवाई होगी। मुख्य सचिव को छह सप्ताह में देना होगा हलफनाम, एडमिशन से परीक्षा तक हर प्रक्रिया की जानकारी देनी होगी सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ वित्तीय रिकॉर्ड ही नहीं, बल्कि एडमिशन और परीक्षा व्यवस्था का पूरा विवरण मांगा है। हर कोर्स में दाखिले की प्रक्रिया क्या है, एडमिशन की जिम्मेदारी किसकी है, प्रश्न पत्र कौन तैयार करता है, परीक्षा कौन संचालित करता है और कॉपियों का मूल्यांकन कैसे होता है, इन सबकी जानकारी देनी होगी। फंड के संचालन में मैनेजमेंट की भूमिका भी बतानी होगी। फीस का भी पूरा हिसाब देना होगा। एडमिशन के समय ली जाने वाली फीस, कोर्स के दौरान ली जाने वाली फीस, डेवलपमेंट फंड ​या किसी विशेष कार्यक्रम के नाम पर ली गई राशि का भी विवरण देना होगा। यह भी बताना होगा कि सरप्लस फंड का निवेश कहां हुआ, उससे जुड़ी वित्तीय व्यवस्था क्या रही। ​कर्मचारियों की भर्ती-वेतन और शिक्षकों की क्लास का भी देना होगा पूरा ब्योरा शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्ति कैसे हुई, उनका वेतन कितना है और भुगतान किस व्यवस्था से किया जाता है, इसका विस्तृत ब्योरा भी देना होगा। विश्वविद्यालय ने सेवा शर्तें अधिसूचित की हैं या नहीं, इसकी जानकारी भी मांगी गई है। जनवरी 2025 से शिक्षकों को आवंटित कक्षाओं और वास्तव में उनके द्वारा ली गई कक्षाओं का भी रिकॉर्ड देना होगा। अगर किसी शिक्षक ने निर्धारित कक्षाएं नहीं लीं तो छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था की गई, यह भी बताना होगा। शिकायतों का भी तीन साल का मांगा गया है रिकॉर्ड: यूनिवर्सिटियों को अपनी शिकायत निवारण व्यवस्था की जानकारी देनी होगी। कमेटी में कौन-कौन सदस्य हैं, उसके अधिकार क्या हैं, पिछले तीन वर्षों में कितनी शिकायतें मिलीं, इसका भी ब्योरा देना होगा। इसलिए पड़ी सख्ती की जरूरत पिछले साल निजी विश्वविद्यालय से जुड़ा एक विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। इसमें कहा गया था कि निजी विश्वविद्यालय छात्रों से मोटी फीस, डेवलपमेंट फंड और इन्फ्रास्ट्रक्चर फीस के नाम पर मोटी रकम वसूलते हैं। इसे शिक्षा के प्रसार में लगाने के बजाय ट्रस्टियों के निजी फायदे और प्रॉपर्टी खरीदने या गैर शैक्षणिक कार्य में इस्तेमाल होता है। इस पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसनुद्दीय अमानुल्लाह और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने निजी विश्वविद्यालयों की वित्तीय पारदर्शिता और शैक्षणिक व्यवस्था को लेकर ये महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं।



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