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शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा दुनिया के कूटनीतिक रंगमंच की बड़ी घटना है। खुद ट्रम्प उन्हें निजी तौर पर रिसीव करने पहुंच सकते हैं, जो कि एक दुर्लभ बात होगी। लेकिन रेड कार्पेट, व्हाइट हाउस डिनर और सुनियोजित ढंग से हाथ मिलाने के दृश्यों के पीछे एक अजीब विरोधाभास भी छिपा है : दो महाशक्तियां- जो एक-दूसरे प्रतिद्वंद्विता में गहराई तक उलझी हुई हैं- घरेलू दबावों और बिखरती विश्व-व्यवस्था के बीच रास्ता तलाशते हुए स्थिरता का बाहरी आवरण पेश करने की कोशिश कर रही हैं। यह शिखर सम्मेलन अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति के एक निर्णायक मोड़ पर हो रहा है और इसमें बहुत कुछ दांव पर लगा है। हकीकत यह है कि आज का वैश्विक परिदृश्य सहयोग नहीं, गुटों और समूहों में ध्रुवीकरण से तय हो रहा है। कुछ ही सप्ताह पहले हुई ब्रिक्स समिट और उससे पहले शंघाई सहयोग संगठन की बैठकों में चीन ने सैन्य गठबंधनों के बिना आगे बढ़ने वाले दृष्टिकोण को सामने रखा था और अमेरिका पर परोक्ष हमले किए थे। लेकिन यह भी सच है कि बड़ी शक्तियों के बीच सहयोग के अभाव ने दुनिया भर में जारी संघर्षों को खतरनाक ढंग से अनियंत्रित छोड़ दिया है। ट्रम्प प्रशासन ईरान में महंगी साबित हो रही लड़ाई और होर्मुज में लगातार जारी व्यवधानों में बुरी तरह उलझा हुआ है। यह ऐसा भू-राजनीतिक दलदल है, जिसने ट्रम्प की अप्रूवल-रेटिंग को निचले स्तर तक पहुंचा दिया है। अमेरिका को लगता है कि चीन के पास तेहरान पर आर्थिक दबाव डालने की क्षमता है। लेकिन चीन ने अपने हितों की कीमत पर किसी की राह में रोड़ा बनने की बहुत कम इच्छा दिखाई है और प्रतिबंधों से बचने के उपायों के जरिए ईरान से अपने व्यापारिक संबंधों को भी लगातार मजबूत बनाए रखा है। ट्रम्प-शी मुलाकात का बुनियादी प्रयोजन लेन-देन पर आधारित व्यापार है। 10 नवंबर की वह डेडलाइन निकट आती जा रही है, जब अमेरिका-चीन टैरिफ “युद्धविराम’ की अवधि समाप्त होनी है। दक्षिण कोरिया के बुसान में हुए समझौते के तहत इस युद्धविराम ने चीनी वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ को 20 प्रतिशत पर सीमित रखने में सफलता हासिल की और उस आर्थिक तबाही को टाल दिया, जिसकी आशंका तब पैदा हो गई थी, जब जवाबी शुल्कों की होड़ के चलते टैरिफ के तीन अंकों तक पहुंचने का खतरा पैदा हो गया था। समिट से पहले न्यूयॉर्क में इस बात की बुनियाद तैयार कर दी गई है कि कम टैरिफ के दायरे में लाए जा सकने वाले गैर-रणनीतिक उपभोक्ता सामानों की पहचान की जा सके। लेकिन इसके बदले में ट्रम्प चीन से अमेरिकी कृषि उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीद और 500 तक बोइंग विमानों की खरीद की मांग कर रहे हैं। मुख्य टकराव के मुद्दे एआई और महत्वपूर्ण खनिज भी हैं। ट्रम्प ने साफ शब्दों में कहा है कि जो भी एआई की दौड़ जीतेगा, वही विजेता होगा। अमेरिका रेयर-अर्थ और महत्वपूर्ण खनिजों पर चीन के एकाधिकार को तोड़ने के लिए भी आक्रामक प्रयास कर रहा है। एक अन्य आयाम दोनों नेताओं की शारीरिक क्षमताओं का भी है। 12 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स के एक प्रमुख रात्रिभोज में शी जिनपिंग के शामिल न होने के बाद उनके स्वास्थ्य को लेकर अफवाहें चरम पर पहुंच गई थीं। हालांकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने इन अफवाहों को गलत करार दिया और बाद में सामने आए वीडियो में शी को बिना किसी की मदद के अपने विमान में सवार होते हुए देखा गया। 80 वर्षीय ट्रम्प की सेहत को लेकर भी चर्चाएं चलती रहती हैं। हाल के कई सर्वेक्षणों में अनेक मतदाताओं ने लम्बे समय तक काम कर पाने की ट्रम्प की क्षमता को लेकर सवाल उठाए हैं। वॉशिंगटन समिट की असली प्राथमिकता कोई बड़ा भू-राजनीतिक समझौता हासिल करना नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच बनी अनिश्चित स्थिति को मैनेज करना है। शी और ट्रम्प दोनों जानते हैं कि आपसी रिश्तों का पूरी तरह टूट जाना आर्थिक रूप से विनाशकारी होगा। आज की विभाजित विश्व-व्यवस्था में, अच्छी तरह से मैनेज किया गया वैसा कोई गतिरोध ही शायद इन दोनों महाशक्तियों के बीच शांति की सबसे करीबी स्थिति हो सकती हैं। वॉशिंगटन समिट की असली प्राथमिकता कोई बड़ा भू-राजनीतिक समझौता हासिल करना नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच बनी अनिश्चित स्थिति को मैनेज करना है। शी और ट्रम्प दोनों जानते हैं कि आपसी रिश्तों का पूरी तरह टूट जाना आर्थिक रूप से विनाशकारी होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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सैयद अता हसनैन का कॉलम:ट्रम्प और शी की मुलाकात में बहुत कुछ दांव पर लगा है
