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स्वयं भू मोटी-माता के नौ रूपों के होंगे दर्शन:बड़वानी में 200 साल पुराना मंदिर; पांचवीं पीढ़ी कर रही सेवा, आंधी में बदला था सिंहासन




बड़वानी शहर के मुख्य मार्ग पर तिराहे-चौराहे के पास स्थित मां मोटी माता मंदिर नवरात्रि में आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मंदिर को रियासतकालीन बताया जाता है और यहां माता की स्वयंभू प्रतिमा विराजमान है। मान्यता है कि करीब 200 से 300 साल पहले यहां घने जंगल के बीच माता की प्रतिमा स्थापित थी। नवरात्रि में नौ दिनों तक माता का विशेष श्रृंगार किया जाता है। मंदिर के पास स्थित रियासतकालीन बावड़ी भी शहर के इतिहास और तत्कालीन जल व्यवस्था की कहानी बयां करती है। स्वप्न में मिला था मंदिर के जीर्णोद्धार का आदेश महात्मा गांधी मार्ग निवासी व्यापारी कुश कुमार गुप्ता के अनुसार, उनके पूर्वजों को स्वप्न में मां ने मंदिर के जीर्णोद्धार का आदेश दिया था। इसके बाद 17 दिसंबर 1942 को मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। वे बताते हैं कि रियासतकाल से लेकर अब तक परिवार की पांचवीं पीढ़ी माता की सेवा और आराधना कर रही है। जीर्णोद्धार के दौरान माता का सिंहासन उत्तर दिशा की ओर से दूसरी जगह स्थानांतरित करना चुनौती बना हुआ था। मान्यता है कि एक रात आई आंधी में सिंहासन अपने स्थान से हटकर दूसरी जगह चला गया। इसके बाद जीर्णोद्धार का काम पूरा किया गया। नवरात्रि में नौ दिन अलग-अलग स्वरूपों में श्रृंगार शारदीय नवरात्रि शुरू होते ही मंदिर में माता का विशेष श्रृंगार किया जाता है। नौ दिनों तक अलग-अलग स्वरूपों में सजावट होती है। इस दौरान आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में नौ दिनों तक प्रसाद के रूप में खिचड़ी वितरित की जाती है। अष्टमी पर विशेष पूजन, हवन और महाआरती होती है। पहले मंदिर परिसर में गरबा भी आयोजित किया जाता था, लेकिन मुख्य मार्ग पर आवागमन प्रभावित होने के कारण इसे बंद कर दिया गया। अब नवरात्रि में मंदिर को अलग-अलग रंगों की लाइटिंग से सजाया जाता है। मन्नत पूरी होने पर ढोल-बाजे के साथ आते थे श्रद्धालु मंदिर के श्रद्धालु और 80 वर्षीय शिक्षक सतीश कुमार बताते हैं कि उन्होंने बड़वानी के इतिहास पर शोध करने वाले इतिहासकारों के काम का अध्ययन किया, लेकिन उन्हें इस मंदिर का विस्तृत इतिहास लिखित रूप में नहीं मिला। उनसे अधिक उम्र के लोगों ने बताया था कि पहले मंदिर के आसपास घना जंगल था और एक पेड़ के नीचे चबूतरे पर देवी की प्रतिमा स्थापित थी। पुराने समय में लोग टाइफाइड जैसी गंभीर बीमारी से राहत पाने की मन्नत लेकर यहां आते थे। मन्नत पूरी होने पर ढोल-बाजे के साथ पहुंचकर माता का श्रृंगार कराते थे। बताया जाता है कि नगर के सेठ धन्नालाल ने उस समय 2,500 रुपए खर्च कर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। इसके बाद धीरे-धीरे मंदिर से लोगों की आस्था जुड़ती गई। मंदिर के पास शिवजी का मंदिर भी मोटी माता मंदिर के समीप शिवजी का मंदिर भी स्थित है। कुश कुमार गुप्ता के अनुसार, इसकी स्थापना भी उनके पूर्वजों ने कराई थी। मंदिर में मां पार्वती, गणेशजी और हनुमानजी की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। नवरात्रि के अलावा श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है। इन अवसरों पर मंदिर को भी रोशनी से सजाया जाता है। तस्वीरे देखिए… 35 हजार रुपए में बनवाई गई थी बावड़ी मोटी माता मंदिर से कुछ मीटर दूर स्थित रियासतकालीन बावड़ी भी ऐतिहासिक महत्व रखती है। व्यापारी और कृषक आनंद मारू के अनुसार, उनके पूर्वज भूरालालजी मारू ने करीब 200 साल पहले इस बावड़ी का निर्माण कराया था। धार जिले की कुक्षी तहसील के कारीगर शेख अली ने इसे बनाया था। उस समय इसके निर्माण पर 35 हजार रुपए खर्च हुए थे। बावड़ी का पानी नगरवासियों के साथ राजा-महाराजाओं के पीने के उपयोग में भी आता था। इसके शिलालेख के अनुसार, बावड़ी का निर्माण संवत 1935 यानी 1878 में कराया गया था। शिलालेख में 35 हजार रुपए की लागत और कारीगर शेख अली, कुक्षी का उल्लेख है। टूट-फूट के बाद संवत 2026 में हीरालालजी के पुत्र कालूराम ने इसका दोबारा निर्माण कराया था। बावड़ी में दो शिवलिंग, आज भी होती है पूजा बावड़ी में दो स्थानों पर शिवलिंग स्थापित हैं, जहां आज भी पूजा-अर्चना की जाती है। बावड़ी के पास रहने वाले 80 वर्षीय सेपु मोहम्मद बताते हैं कि नगर में राजा जसवंत सिंह और उनके भाई इंदर सिंह के शासन के दौरान साधु-संतों के कहने पर भूरा मारू सेठ ने बावड़ी बनवाई थी। उन्होंने बताया कि अपने जीवनकाल में उन्होंने साधु-संतों को बावड़ी के भीतर बैठकर भजन-कीर्तन और यज्ञ करते देखा है। सेठ भूरा मारू के वंशज आज भी यहां पूजा-अर्चना करते हैं।



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