हिमाचल में टल सकते हैं 22 नगर निकायों के चुनाव:निर्वाचन आयुक्त का पद खाली; प्रोसेस शुरू नहीं हो रहा, दिसंबर में होने है इलेक्शन




हिमाचल प्रदेश की 22 लोकल अर्बन बॉडी (ULBs) के चुनाव लटक सकते हैं। स्टेट इलेक्शन कमिश्नर का पद खाली होने से चुनाव का प्रोसेस शुरू नहीं हो पा रहा। पूर्व निर्वाचन आयुक्त अनिल खाची पांच अगस्त को रिटायर हो गए हैं। दो महीने से अधिक समय बाद भी स्टेट इलेक्शन कमिश्नर की तैनाती नहीं हुई। इसमें ULBs के चुनाव तय समय पर करवाना चुनौतीपूर्ण दिख रहा है। प्रदेश में 16 नगर पंचायतों, 3 नगर निगम और 3 नगर परिषदों में 194 पार्षद पदों के लिए चुनाव होने हैं। इसके अलावा कुछ निकायों में दो से तीन सीटों पर उपचुनाव भी प्रस्तावित हैं। आमतौर पर चुनाव से पांच-छह पहले वोटर लिस्ट और वार्डबंदी जैसे काम शुरू हो जाते है। इन निकायों में दिसंबर 2026 में चुनाव प्रस्तावित है। मगर निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति नहीं होने से चुनाव की तैयारियों में देरी हो रही है। इन सब तैयारियों की शक्तियां स्टेट इलेक्शन कमिश्नर के पास है। ऐसे में आयोग के प्रमुख का पद खाली रहने से चुनाव कार्यक्रम तैयार करने में देरी हो रही है। इससे ULBs इलेक्शन भी पंचायतीराज चुनाव की तरह लटक सकते है। इससे पहले पंचायत और 52 ULBs चुनाव भी हाईकोर्ट के आदेशों पर लगभग चार महीने देरी से करवाया गया। मई में सरकार ने नहीं लगाया था आरक्षण रोस्टर स्टेट इलेक्शन कमीशन मई में भी इन निकायों के चुनाव की तैयारियां कर चुका था। मगर उस दौरान सरकार ने इन 22 निकायों में आरक्षण रोस्टर नहीं लगाया और नए गठित ULBs में दो साल के भीतर चुनाव कराने का प्रावधान किया। इसके लिए बकायदा कानून में बदला गया। इससे इन निकायों में मई में चुनाव नहीं हो पाए। तीन नगर निगम चुनाव पार्टी चिन्ह पर होंगे दिलचस्प चुनाव तीन नगर निगम का होना है, क्योंकि निगम चुनाव पार्टी चिन्ह पर होते है। ऐसे में दिसंबर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ कांग्रेस की इन चुनाव में परीक्षा होगी। एडमिन्स्ट्रेटर के सहारे चल रहे निकाय अभी इन निकायों का कामकाज एडमिन्स्ट्रेटर देख रहे हैं। यदि तय समय पर चुनाव नहीं होते हैं तो इन निकायों में एडमिन्स्ट्रेटर राज आगे भी जारी रह सकता है। इससे ULBs को सड़क, सफाई, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, पार्किंग, भवन नक्शे, स्थानीय विकास कार्यों और अन्य नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दे उठाने के लिए पार्षदों का लंबे समय तक इंतजार करना पड़ सकता है। तय समय पर चुनाव नहीं होने से क्या नुकसान? चुनाव में देरी का सबसे बड़ा असर स्थानीय लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर पड़ता है। वार्डों के मतदाताओं को अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए इंतजार करना पड़ सकता है। पार्षदों और नगर निकायों के अध्यक्षों के माध्यम से होने वाली स्थानीय जवाबदेही भी प्रभावित हो सकती है। विकास कार्यों और नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर निर्वाचित निकाय की प्राथमिकताओं के अनुसार निर्णय लेने की व्यवस्था देर से बहाल होगी। नियुक्ति के बाद ही आगे बढ़ेगी प्रक्रिया निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के बाद ही आयोग चुनाव की तैयारियों को आगे बढ़ा सकेगा। इसके तहत मतदाता सूचियों, वार्डों से संबंधित व्यवस्थाओं, चुनाव कार्यक्रम, मतदान केंद्रों और अन्य जरूरी तैयारियों को समयबद्ध तरीके से पूरा करना होगा। यदि प्रक्रिया शुरू होने में अधिक देरी होती है तो निर्धारित समय में सभी औपचारिकताएं पूरी करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अब सबकी निगाहें राज्य सरकार की ओर से नए निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति पर हैं। नियुक्ति में देरी जारी रहने पर 22 शहरी निकायों के चुनाव का कार्यक्रम प्रभावित होने की आशंका बनी रहेगी।



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